स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण हेतु सुदृढ़ बैटरी पारितंत्र 

पाठ्यक्रम: GS3/ बुनियादी ढांचा/ऊर्जा

संदर्भ

  • भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार और विद्युत वाहनों को तीव्रता से अपनाए जाने के साथ, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ (BESS) एक विश्वसनीय एवं लचीले स्वच्छ ऊर्जा पारितंत्र के महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में उभर रही हैं।

भारत की ऊर्जा भंडारण संबंधी आवश्यकताएँ

  • वर्ष 2030 तक भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता लगभग 486 गीगावाट तक पहुँचने की संभावना है, जिसमें प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत की वृद्धि होगी।
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2031–32 तक भारत को लगभग 47.24 गीगावाट/236 गीगावाट-घंटा क्षमता वाली बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त, 26.69 गीगावाट/175 गीगावाट-घंटा क्षमता वाली पंपित जल भंडारण प्रणालियों की भी आवश्यकता होगी।
  • विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भारत को बैटरी भंडारण और विद्युत ग्रिड के बुनियादी ढाँचे में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।

बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ (BESS)

  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ ऐसी व्यवस्थाएँ हैं, जिनमें बैटरियों का उपयोग—व्यक्तिगत रूप से या अधिकतर समूहों में—विद्युत उत्पादन केंद्रों द्वारा उत्पन्न विद्युत को संग्रहित करने और आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
    • बैटरी इकाइयाँ: विद्युत ऊर्जा का भंडारण करती हैं।
    • विद्युत परिवर्तक (इन्वर्टर): बैटरियों से प्राप्त दिष्ट धारा को विद्युत ग्रिड की प्रत्यावर्ती धारा में परिवर्तित करता है तथा आवश्यकता के अनुसार इसके विपरीत रूपांतरण भी करता है।
    • परिवर्तित्र (ट्रांसफॉर्मर): प्रणाली के वोल्टेज को विद्युत ग्रिड के वोल्टेज के अनुरूप बनाता है।
    • सहायक प्रणालियाँ: प्रणाली के सुरक्षित एवं प्रभावी संचालन में सहायता करती हैं।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण तकनीक मुख्यतः विद्युत-रासायनिक बैटरियों के उपयोग पर आधारित है। ये बैटरियाँ नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों से उत्पन्न ऊर्जा को संग्रहित कर सकती हैं।

बैटरियों के प्रकार

  • लिथियम-आयन बैटरियाँ: इन बैटरियों में सामान्यतः लिथियम के साथ अन्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों में लिथियम, लोहा और फॉस्फेट का उपयोग होता है।
  • ठोस-अवस्था बैटरियाँ: पारंपरिक बैटरियों तथा प्रवाह बैटरियों में सामान्यतः द्रव विद्युत-अपघट्य का उपयोग होता है, जबकि ठोस-अवस्था बैटरियों में ठोस विद्युत-अपघट्य प्रयुक्त होता है। इसके लिए सिरेमिक अथवा कृत्रिम पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है।

बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का महत्त्व

  • नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण: सौर और पवन ऊर्जा का अतिरिक्त उत्पादन संग्रहित करके उस समय उपयोग किया जा सकता है, जब इन स्रोतों से विद्युत का उत्पादन कम हो।
  • विद्युत ग्रिड की स्थिरता: विद्युत आपूर्ति और माँग में होने वाले उतार-चढ़ाव को संतुलित करने में सहायता मिलती है।
  • अधिकतम माँग का प्रबंधन: विद्युत की अधिक माँग वाले समय में संग्रहित ऊर्जा उपलब्ध कराकर ग्रिड पर दबाव कम किया जा सकता है।
  • जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में कमी: अल्पकालिक माँग में उतार-चढ़ाव को पूरा करने के लिए केवल कोयला और गैस आधारित विद्युत संयंत्रों के संचालन की आवश्यकता कम हो सकती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: यह अधिक विश्वसनीय विद्युत प्रणाली विकसित करने तथा देश में उत्पादित नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग में सहायता करती है।

सुदृढ़ बैटरी ऊर्जा भंडारण पारितंत्र के विकास में चुनौतियाँ

  • उच्च प्रारंभिक लागत: बैटरी भंडारण प्रणालियों की स्थापना में अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
  • आयात पर निर्भरता: आयातित बैटरी सेल, महत्त्वपूर्ण खनिजों और प्रसंस्करण तकनीकों पर निर्भरता आपूर्ति शृंखला को जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • घरेलू विनिर्माण की सीमाएँ: भारत को बैटरी सेल के घरेलू उत्पादन का विस्तार करने तथा बैटरी की संपूर्ण मूल्य शृंखला में क्षमताएँ विकसित करने की आवश्यकता है।
  • पुनर्चक्रण एवं पर्यावरण संबंधी चिंताएँ: बैटरियों के निपटान, खनिजों के निष्कर्षण और पुनर्चक्रण के लिए प्रभावी विनियमन तथा पर्याप्त बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता है।
  • वित्तपोषण एवं परियोजनाओं की व्यवहार्यता: निवेश आकर्षित करने के लिए दीर्घकालिक राजस्व की निश्चितता तथा उपयुक्त बाजार व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं।

भारत द्वारा उठाए गए कदम

  • उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरियों के लिए उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना: इस योजना का उद्देश्य देश में 50 गीगावाट-घंटा की बैटरी विनिर्माण क्षमता स्थापित करना है। इसमें से 10 गीगावाट-घंटा क्षमता ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण के लिए निर्धारित है।
  • व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) योजना: यह बड़े पैमाने की बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • इन दोनों योजनाओं के माध्यम से लगभग 43.8 गीगावाट-घंटा बैटरी भंडारण क्षमता को समर्थन मिलता है। इसमें 30 गीगावाट-घंटा भंडारण क्षमता के लिए विद्युत प्रणाली विकास निधि से 5,400 करोड़ रुपये का प्रावधान भी शामिल है।
  • हरित ऊर्जा गलियारा (GEC): यह पारेषण अवसंरचना के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड से जोड़ने में सहायता करता है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों में उत्पादित बिजली को अन्य क्षेत्रों तक पहुँचाना संभव होता है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की खरीद एवं उपयोग संबंधी दिशा-निर्देश: विद्युत मंत्रालय ने विद्युत उत्पादन, पारेषण और वितरण परिसंपत्तियों के साथ-साथ ग्रिड की सहायक सेवाओं में बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की खरीद और उपयोग के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

आगे की राह

  • बैटरियों के संग्रहण, उनमें प्रयुक्त सामग्रियों की पुनर्प्राप्ति तथा सुरक्षित निपटान के लिए प्रभावी समाधान विकसित किए जाने चाहिए।
  • नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पारेषण अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के क्रियान्वयन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए।
  • भारत और ऑस्ट्रेलिया के पास वैश्विक ऊर्जा संक्रमण को गति देने का महत्त्वपूर्ण अवसर है। ऑस्ट्रेलिया की तकनीकी दक्षता और महत्त्वपूर्ण खनिज संसाधनों को भारत की औद्योगिक क्षमता तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में उसकी भागीदारी के साथ जोड़कर इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की जा सकती है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत के विद्युत ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण के लिए बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ (BESS) अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में इनके महत्त्व की चर्चा कीजिए तथा इनके क्रियान्वयन से संबंधित चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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