पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम, 2023 तथा डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण नियमावली, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। संघ का तर्क है कि ये प्रावधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकते हैं।
याचिका में उठाई गई चिंताएँ
- पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों को छूट का अभाव: कानून में पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों के लिए अलग से छूट का प्रावधान नहीं है। इसके कारण समाचार प्रकाशकों और संवाददाताओं को सूचना देने, सहमति प्राप्त करने तथा व्यक्तिगत आँकड़ों को मिटाने जैसी आवश्यकताओं का सामना करना पड़ सकता है।
- व्यक्तिगत आँकड़ों तक सरकार की पहुँच: डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम की धारा 36 तथा डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण नियमावली के नियम 23 और सातवीं अनुसूची को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इनके माध्यम से केंद्र सरकार को पर्याप्त न्यायिक निगरानी एवं सुरक्षा उपायों के अभाव में व्यापक स्तर पर सूचनाएँ माँगने की शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
- सूचना का अधिकार अधिनियम पर प्रभाव: डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम की धारा 44(3), सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन करती है, जो व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से संबंधित है।
- डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ का तर्क है कि यह संशोधन सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास उपलब्ध सूचनाओं तक पहुँच को अत्यधिक सीमित कर सकता है।
- पत्रकारिता के स्रोतों की सुरक्षा: याचिका में आशंका व्यक्त की गई है कि इन शक्तियों के कारण सूचना देने वाले गोपनीय स्रोतों, जिनमें भ्रष्टाचार उजागर करने वाले व्यक्ति तथा सूचना का अधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं, की पहचान उजागर हो सकती है। इससे खोजी पत्रकारिता हतोत्साहित हो सकती है।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता तथा कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यही संवैधानिक प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता का आधार है।
- अनुच्छेद 19(2): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जा सकने वाले युक्तियुक्त प्रतिबंधों का प्रावधान करता है।
न्यायिक निर्णय एवं समिति की सिफारिशें
- न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ, 2017: सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार घोषित किया।
- निजता के अधिकार पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए । इनमें विधिसम्मत आधार, राज्य का वैध उद्देश्य तथा आनुपातिकता का सिद्धांत शामिल हैं।
- आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य, 1994 — ऑटो शंकर मामला: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्थापित अपवादों के अधीन रहते हुए मीडिया किसी व्यक्ति की सहमति के बिना सार्वजनिक अभिलेखों में उपलब्ध सामग्री, जिसमें न्यायालयीन दस्तावेज भी शामिल हैं, प्रकाशित कर सकता है।
- हालाँकि, सार्वजनिक अभिलेखों से परे किसी व्यक्ति की निजी जानकारी प्रकाशित करना उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
- निजता संबंधी विशेषज्ञ समूह, 2012: योजना आयोग के अंतर्गत न्यायमूर्ति ए. पी. शाह की अध्यक्षता में इस विशेषज्ञ समूह का गठन किया गया था।
- समिति ने सिफारिश की कि निजता से संबंधित किसी भी कानून के कारण सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान कमजोर या सीमित नहीं होने चाहिए।
- समिति ने इस बात पर बल दिया कि पारदर्शिता और निजता को एक-दूसरे के विरोधी के बजाय परस्पर पूरक होना चाहिए।
आगे की राह
- आनुपातिक कानूनी उपाय: गलत समाचारों के प्रकाशन से संबंधित मामलों में ऐसे आनुपातिक कानूनी उपाय अपनाए जाने चाहिए, जो सत्यापन और प्रकटीकरण से पहले प्रकाशन में बाधा डालने वाली व्यापक एवं कठोर शर्तें अधिरोपित के बजाय त्रुटियों का समाधान करें।
- पत्रकारिता के लिए सीमित एवं स्पष्ट छूट: जनहित में की जाने वाली वास्तविक पत्रकारिता को स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमित छूट प्रदान की जानी चाहिए। साथ ही, निजता के अधिकार के उल्लंघन को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
- जनहितकारी पत्रकारिता का संरक्षण: भ्रष्टाचार, लोक अधिकारियों के आचरण तथा कंपनियों की अनियमितताओं से संबंधित वैध पत्रकारिता को संरक्षण देने के लिए स्पष्ट मानदंड निर्धारित किए जाने चाहिए। इसके साथ ही, व्यक्तिगत आँकड़ों के अनावश्यक प्रकटीकरण को रोका जाना चाहिए।
स्रोत: TH
Previous article
सर्पदंश एवं सर्पविषरोधी औषधियाँ