वुम्मिडी एथिराज
पाठ्यक्रम: GS1 / इतिहास एवं संस्कृति
संदर्भ
- चेन्नई स्थित प्रसिद्ध आभूषण निर्माता वुम्मिडी एथिराज का निधन हो गया। उन्होंने वर्ष 1947 में जवाहरलाल नेहरू को प्रस्तुत किए गए सेंगोल के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वुम्मिडी एथिराज के बारे में
- उनका जन्म 25 नवंबर, 1926 को हुआ था। वे दक्षिण भारत के आभूषण उद्योग की एक प्रमुख हस्ती थे।
- उन्होंने सेंगोल के निर्माण में योगदान दिया, जिससे उनके परिवार की पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। विशेष रूप से वर्ष 2023 में नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना के बाद यह पहचान और अधिक व्यापक हुई।
सेंगोल क्या है?
- विशेषताएँ: यह पाँच फुट लंबा, स्वर्ण-मढ़ित चाँदी का राजदंड है, जिसके शीर्ष पर नंदी की आकृति बनी हुई है। इसे तमिलनाडु के तिरुवावडुथुराई अधीनम द्वारा बनवाया गया था।
- ऐतिहासिक महत्त्व: स्वतंत्रता प्राप्ति की पूर्व संध्या पर वर्ष 1947 में अधीनम के प्रतिनिधियों द्वारा इसे जवाहरलाल नेहरू को प्रस्तुत किया गया था। यह सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक था।
- सांस्कृतिक महत्त्व: सेंगोल शब्द तमिल शब्द ‘सेम्मै’ से संबंधित है, जिसका अर्थ धार्मिकता, नैतिकता और न्यायपरायणता है। सेंगोल न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष शासन का प्रतीक है तथा तमिल राजसत्ता की परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

स्रोत: IE
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)
पाठ्यक्रम: GS2 / अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि चीनी जनमुक्ति सेना (PLA) के गश्त संबंधी व्यवहार के कारण वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की स्थिति प्रभावित हुई है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)
- वास्तविक नियंत्रण रेखा वह सीमांकन रेखा है, जो भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्र को चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र से अलग करती है।
- भारत के अनुसार, LAC की लंबाई 3,488 किलोमीटर है, जबकि चीन इसे लगभग 2,000 किलोमीटर लंबा मानता है।
- इसे तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- पूर्वी क्षेत्र: अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में विस्तृत।
- मध्य क्षेत्र: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में स्थित।
- पश्चिमी क्षेत्र: लद्दाख में स्थित।
मैकमोहन रेखा क्या है?
- मैकमोहन रेखा पूर्वी क्षेत्र में भारत और चीन के बीच वास्तविक सीमा के रूप में कार्य करती है। यह विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत के बीच की सीमा को दर्शाती है, जो पश्चिम में भूटान से लेकर पूर्व में म्याँमार तक विस्तृत है।
- चीन ऐतिहासिक रूप से इस सीमा को विवादित मानता रहा है और अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) का हिस्सा बताता है।
- मैकमोहन रेखा का निर्धारण वर्ष 1914 के शिमला सम्मेलन के दौरान किया गया था। इस सम्मेलन को आधिकारिक रूप से ‘ग्रेट ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के बीच सम्मेलन’ कहा गया था।
- चीन मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करता तथा अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा प्रस्तुत करते हुए इसे ‘जांगनान’ अथवा ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है। इसके विपरीत, भारत का स्पष्ट मत है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है।

LAC, पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (LoC) से किस प्रकार भिन्न है?
- नियंत्रण रेखा (LoC): इसकी उत्पत्ति वर्ष 1948 में कश्मीर युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से निर्धारित युद्धविराम रेखा से हुई थी।
- वर्ष 1972 में दोनों देशों के बीच शिमला समझौते के बाद इसे नियंत्रण रेखा (LoC) नाम दिया गया।
- इसे दोनों देशों की सेनाओं के सैन्य संचालन महानिदेशकों (DGMOs) द्वारा हस्ताक्षरित मानचित्र पर दर्शाया गया है। इसे दोनों देशों के बीच हुए समझौते के अंतर्गत औपचारिक मान्यता प्राप्त है।
- वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC): यह केवल एक अवधारणा है, जिस पर भारत और चीन के बीच सहमति नहीं है। इसे न तो किसी साझा मानचित्र पर स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है और न ही धरातल पर संयुक्त रूप से सीमांकित किया गया है।
स्रोत: TH
कृषि-फोटोवोल्टाइक्स
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
समाचारों में
- नई दिल्ली में ‘वैश्विक दक्षिण को ऊर्जा प्रदान करना’ विषयवस्तु के अंतर्गत सातवाँ एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन आयोजित किया गया।
कृषि-फोटोवोल्टाइक्स
- इसे एग्रीसोलर अथवा दोहरे उपयोग वाली सौर ऊर्जा प्रणाली भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य भूमि उपयोग की दक्षता को अधिकतम करना है।
- यह फसलों को छाया प्रदान करती है तथा किसानों के लिए अतिरिक्त लाभ उत्पन्न करती है।
- इस प्रणाली में स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुरूप कृषि अवसंरचना को सौर ऊर्जा संयंत्रों के साथ एकीकृत किया जाता है।
प्रमुख घटक
- ऊँची सौर संरचनाएँ: सौर पैनलों को सीधे भूमि पर लगाने के बजाय पर्याप्त ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है, ताकि उनके नीचे उगाई जाने वाली फसलों तक सूर्य का प्रकाश और वर्षा का जल पहुँच सके।
- कृषि के लिए उपयोग की जाने वाली ये ऊँची सौर संरचनाएँ किसानों को उनके नीचे कृषि उपकरणों के साथ आसानी से कार्य करने की सुविधा भी प्रदान करती हैं।
- आंशिक छायांकन: सौर पैनल फसलों को छाया प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाने और मृदा से जल के वाष्पीकरण को कम करने में सहायता मिलती है।
- इससे पौधों के विकास के लिए अपेक्षाकृत ठंडा और स्थिर वातावरण तैयार होता है, विशेषकर उष्ण तथा शुष्क क्षेत्रों में।
- भूमि की दोहरी उत्पादकता: कृषि-फोटोवोल्टाइक्स फसल उत्पादन अथवा पशुपालन के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को एकीकृत करके भूमि के उपयोग को अनुकूलित करता है। इससे कृषि गतिविधियों के लिए विद्युत उपलब्ध होती है तथा अतिरिक्त विद्युत को विद्युत ग्रिड में बेचकर किसानों को आय का एक अतिरिक्त स्रोत प्राप्त होता है।

भारत में कृषि-फोटोवोल्टाइक्स का विकास
- अगस्त 2025 तक भारत में 37.54 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाली 36 कृषि-फोटोवोल्टाइक्स परियोजनाएँ संचालित थीं, जबकि 10 प्रायोगिक परियोजनाएँ विकासाधीन थीं।
- राज्यवार पहलें:
- महाराष्ट्र: मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0 के अंतर्गत किसानों को विद्युत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 16,000 मेगावाट की सौर परियोजनाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- गुजरात: किसान सूर्योदय योजना किसानों को दिन के समय कृषि कार्यों के लिए विद्युत उपलब्ध कराती है।
- कर्नाटक: सूर्य रायता योजना सौर सिंचाई पंपों को प्रोत्साहित करती है तथा किसानों को अतिरिक्त विद्युत बेचकर आय अर्जित करने का अवसर प्रदान करती है। इससे ईंधन की खपत भी कम होती है।

भारत में कृषि-फोटोवोल्टाइक्स की संभावनाएँ
- भारत में कृषि-फोटोवोल्टाइक्स के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं।
- अनुमानों के अनुसार, देश में इसकी संभावित क्षमता 3,000 गीगावाट से लेकर लगभग 14,000 गीगावाट तक हो सकती है। यह कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा के संगम पर उपलब्ध व्यापक अवसरों को दर्शाता है।
- कृषि-फोटोवोल्टाइक्स प्रणालियाँ किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाने में भी सहायक हो सकती हैं।
- कुछ परिस्थितियों में किसानों की वार्षिक आय लगभग ₹60,000 प्रति एकड़ से बढ़कर ₹1 लाख प्रति एकड़ से अधिक हो सकती है।
- उच्च संभावनाओं वाले राज्य: महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में कृषि-फोटोवोल्टाइक्स की व्यापक संभावनाएँ हैं। ये राज्य सामूहिक रूप से भारत की अनुमानित कृषि-फोटोवोल्टाइक्स विद्युत उत्पादन क्षमता के लगभग 50% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसका प्रमुख कारण कृषि भूमि की उपलब्धता, पर्याप्त सौर संसाधन और अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियों का संयोजन है।
- मध्यम संभावनाओं वाले राज्य: ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल में मध्यम स्तर की संभावनाएँ देखी जाती हैं।
- दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य भारत के क्षेत्रों में सौर विकिरण, भूमि की उपलब्धता तथा बागवानी की सघनता का अपेक्षाकृत अनुकूल संयोजन पाया जाता है, जो बड़े पैमाने पर इस प्रणाली को अपनाने के लिए उपयुक्त है।
कृषि-फोटोवोल्टाइक्स के विकास हेतु सरकारी पहलें
- प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM): फरवरी 2019 में प्रारंभ की गई यह योजना कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करती है। इसका उद्देश्य डीजल पर निर्भरता कम करना तथा किसानों के लिए आय के विविध स्रोत विकसित करना है।
- यह योजना विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि पंपों के सौरकरण को भी बढ़ावा देती है, जिससे कृषि गतिविधियों के साथ सौर ऊर्जा के एकीकरण के अवसर उत्पन्न होते हैं।
- कृषि-फोटोवोल्टाइक्स उत्कृष्टता केंद्र : राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के सहयोग से कृषि-फोटोवोल्टाइक्स संबंधी अनुसंधान, प्रदर्शन और क्षमता निर्माण के लिए एक उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया है।
- इंडिया एग्रीवोल्टाइक्स एलायंस (IAA): वर्ष 2023 में प्रारंभ किया गया यह गठबंधन राष्ट्रीय सौर ऊर्जा महासंघ (NSEFI) के नेतृत्व में संचालित होता है।
- यह एक बहु-हितधारक मंच है, जो सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि के लिए भूमि के दोहरे उपयोग को बढ़ावा देता है।
स्रोत: PIB
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय का हानि एवं क्षति कोष
पाठ्यक्रम: GS3 / पर्यावरण
संदर्भ
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय के हानि एवं क्षति कोष ने भोटेकोशी क्षेत्र में आई बाढ़ से हुई हानि से निपटने के लिए नेपाल हेतु 21.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि निर्धारित की है।
परिचय
- अगस्त 2026 में मानव गतिविधियों के कारण तीव्र हुई वैश्विक तापन प्रक्रिया और जलवायु परिवर्तन से संबंधित बर्फ एवं चट्टानों के हिमस्खलन ने भोटेकोशी–त्रिशूली–नारायणी नदी तंत्र में बाढ़ उत्पन्न कर दी।
- नेपाल के अनुमान के अनुसार, इस आपदा से कम-से-कम 2.69 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक हानि हुई है तथा पुनर्प्राप्ति और पुनर्वास के लिए कम-से-कम 4.71 बिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है।
- यह प्रथम बार है जब इस कोष ने किसी विशिष्ट देश के लिए धनराशि निर्धारित की है।
हानि एवं क्षति कोष के बारे में
- यह कोष संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) की वित्तीय व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करता है।
- सरकारों ने वर्ष 2022 में COP27 के दौरान इस कोष की स्थापना पर सहमति व्यक्त की थी। इसके संचालन संबंधी मार्गदर्शक दस्तावेज को वर्ष 2023 में COP28 के दौरान अपनाया गया।
- इस कोष की स्थापना विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील विकासशील देशों को आर्थिक एवं गैर-आर्थिक हानियों से निपटने में सहायता प्रदान करने के लिए की गई है। इसमें चरम मौसमी घटनाओं तथा धीरे-धीरे विकसित होने वाली जलवायु संबंधी घटनाओं से होने वाली क्षति शामिल है।
- लाभार्थी: वे विकासशील देश जो जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इसमें उन देशों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिनकी संस्थागत एवं कार्यान्वयन क्षमता सीमित है।
स्रोत: TH
नागरिक सुरक्षा नेटवर्क
पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
समाचार में
- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिक सुरक्षा की तैयारियों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक अद्वितीय प्रायोगिक पहल शुरू करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत भारतीय सेना द्वारा नागरिक सुरक्षा के मास्टर प्रशिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
नागरिक सुरक्षा
- भारत में नागरिक सुरक्षा की स्थापना सर्वप्रथम वर्ष 1941 में की गई थी।
- मई 1968 में संसद द्वारा नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1968 (अधिनियम संख्या 27, 1968) पारित किया गया।
- इसका उद्देश्य आपातकालीन परिस्थितियों में जनजीवन की रक्षा करना, संपत्ति को होने वाली क्षति को न्यूनतम करना, आवश्यक सेवाओं एवं उत्पादन को बनाए रखना तथा जनमानस का मनोबल बढ़ाना है।
- प्रारंभ में इसका मुख्य ध्यान शत्रु के हमलों से सुरक्षा प्रदान करने पर था। हालाँकि, वर्ष 1962 में चीन के आक्रमण और वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद इसके दायरे का विस्तार किया गया।
- वर्ष 2009 में संशोधित नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1968 के अंतर्गत नागरिक सुरक्षा दल की स्थापना को अधिकृत किया गया। साथ ही, प्राकृतिक एवं मानव-जनित आपदाओं से पहले, उनके दौरान और उनके बाद आपदा प्रबंधन में इसकी जिम्मेदारियों का विस्तार किया गया।
- नागरिक सुरक्षा के अंतर्गत परमाणु, जैविक एवं रासायनिक हमलों से उत्पन्न खतरों से सुरक्षा भी शामिल है।
स्रोत: PIB
पेंगुइन की बीट से अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की गति बढ़ने की आशंका
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- एक हालिया अध्ययन के अनुसार, पेंगुइन की बीट अंटार्कटिका में बर्फ के पिघलने की गति को बढ़ा सकती है।
परिचय
- शैवाल का उर्वरीकरण: पेंगुइन मछलियों और अन्य छोटे समुद्री जीवों को खाते हैं। इस भोजन से प्राप्त पोषक तत्त्व उनके शरीर से होकर गुजरते हैं और उनकी बीट के माध्यम से भूमि तथा बर्फ पर जमा हो जाते हैं।
- इस प्रक्रिया में पेंगुइन अनजाने में बर्फ पर उगने वाले शैवाल को पोषक तत्त्व प्रदान करते हैं, जिससे उनकी वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
- हरे शैवाल : अनुकूल परिस्थितियों में क्लोरोफिल जैसे हरे वर्णक सक्रिय रहते हैं। शैवाल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से भोजन का निर्माण करते हैं और तीव्रता से वृद्धि करते हैं।
- लाल शैवाल : जब पोषक तत्त्वों की उपलब्धता कम हो जाती है या परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाती हैं, तो शैवाल सुरक्षा के लिए लाल वर्णक उत्पन्न कर सकते हैं। ये वर्णक उनकी कोशिकाओं को तीव्र सूर्यप्रकाश से बचाने में सहायता करते हैं।
- बर्फ की परावर्तन क्षमता में कमी: रंगीन शैवाल के फैलाव से बर्फ की सूर्यप्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप, बर्फ अधिक सौर ऊर्जा अवशोषित करती है, जिससे स्थानीय स्तर पर बर्फ पिघलने की गति बढ़ सकती है।
पेंगुइन
- पेंगुइन पक्षियों का एक समूह है, जिसमें 17 से 19 प्रजातियाँ शामिल हैं। ये मुख्यतः दक्षिणी गोलार्ध में, विशेषकर अंटार्कटिका में पाए जाते हैं।
- ये उड़ने में असमर्थ जलीय पक्षी हैं और उत्कृष्ट तैराक होते हैं।
- इनका मुख्य भोजन मछलियाँ, क्रिल तथा स्क्विड हैं।
- पेंगुइन की विभिन्न प्रजातियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में निवास करती हैं। उदाहरण के लिए, एम्परर पेंगुइन और एडेली पेंगुइन अंटार्कटिका में पाए जाते हैं, जबकि गैलापागोस पेंगुइन भूमध्य रेखा के उत्तर में पाए जाने वाले पेंगुइन की एकमात्र प्रजाति है।
- एम्परर पेंगुइन और गैलापागोस पेंगुइन, दोनों को IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में आधिकारिक रूप से ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
स्रोत: DTE
ऑस्कर क्लाइन पदक
पाठ्यक्रम: विविध
संदर्भ
- प्रख्यात भारतीय सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर अशोक सेन को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ऑस्कर क्लाइन पदक से सम्मानित किया गया है। वे यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने वाले पहले भारतीय भौतिक विज्ञानी बन गए हैं।
परिचय
- अशोक सेन को स्ट्रिंग सिद्धांत , ब्लैक होल की एंट्रॉपी तथा स्ट्रिंग फील्ड सिद्धांत में उनके अग्रणी योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।
- स्ट्रिंग सिद्धांत ब्रह्मांड की मूलभूत प्रकृति को समझाने का प्रयास करता है। उनके योगदान ने आधुनिक सैद्धांतिक भौतिकी को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किया है।
- वे कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।
- उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, डिराक पदक, बोल्ट्ज़मान पदक तथा मौलिक भौतिकी में ब्रेकथ्रू पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
ऑस्कर क्लाइन पदक
- इस पदक की स्थापना वर्ष 1988 में की गई थी। यह भौतिकी के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाता है।
- इसका नाम स्वीडन के सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी ऑस्कर क्लाइन के नाम पर रखा गया है।
- यह पदक स्वीडन में स्टॉकहोम विश्वविद्यालय और रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज़ की नोबेल भौतिकी समिति द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है।
- इसके पूर्व प्राप्तकर्ताओं में नोबेल पुरस्कार विजेता स्टीफन हॉकिंग, पीटर हिग्स, चेन-निंग यांग, स्टीवन वाइनबर्ग और हांस बेथे शामिल हैं। यह इस पुरस्कार की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को रेखांकित करता है।
स्रोत: AIR
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संक्षिप्त समाचार 24-10-2026