पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा बुनियादी ढांचा
संदर्भ
- हाल ही में, भारत ने 300 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता का आँकड़ा पार कर लिया है, जो कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का 54% से अधिक है। किंतु तीव्र गति से बढ़ रही परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा को विद्युत प्रणाली में समाहित करना वितरण क्षेत्र के लिए एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।
DISCOMs के बारे में
- ये उपभोक्ताओं तक विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाली अंतिम चरण की संस्थाएँ हैं।
- वे विद्युत उत्पादकों से विद्युत की खरीद करती हैं, वितरण नेटवर्क के माध्यम से उसका संचार करती हैं, फीडरों और ट्रांसफॉर्मरों का प्रबंधन करती हैं, उपभोक्ताओं की मीटरिंग करती हैं, राजस्व एकत्र करती हैं तथा विद्युत आपूर्ति की विश्वसनीयता बनाए रखती हैं।
- चूँकि विद्युत एक समवर्ती विषय है, इसलिए उपभोक्ताओं को विद्युत वितरण, जिसमें वितरण कंपनियों (DISCOMs) का संचालन और उसका डिजिटलीकरण भी शामिल है, संबंधित वितरण उपयोगिता के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह उपयोगिता संबंधित राज्य सरकार और राज्य विद्युत नियामक आयोग के मार्गदर्शन में कार्य करती है।
- भारत की विद्युत मूल्य शृंखला में DISCOMs सबसे कमजोर वित्तीय एवं परिचालन कड़ी हैं, जिसके प्रमुख कारण हैं:
- राजनीतिक कारणों से बाधित तथा प्रायः लागत-परिलक्षित न होने वाले विद्युत टैरिफ।
- उच्च सकल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (AT&C) हानियाँ।
- सब्सिडी के भुगतान में विलंब तथा कमजोर राजस्व संग्रह।
- पुराना वितरण अवसंरचना तंत्र तथा अपर्याप्त नेटवर्क दृश्यता।
विद्युत प्रणाली में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का एकीकरण
- भारत में नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार उल्लेखनीय रहा है:
- सौर ऊर्जा क्षमता वर्ष 2014 के 2.8 GW से बढ़कर लगभग 165 GW हो गई है।
- भारत ने विगत वित्तीय वर्ष में रिकॉर्ड 55.29 GW गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी।
- वितरण क्षेत्र में सुधारों के लिए ₹3 लाख करोड़ से अधिक की राशि प्रतिबद्ध की गई है।
- अब चुनौती क्षमता निर्माण से हटकर क्षमता के उपयोग एवं एकीकरण की ओर स्थानांतरित हो रही है।
- पारंपरिक विद्युत उत्पादन के विपरीत, सौर एवं पवन ऊर्जा परिवर्तनशील तथा स्थान-निर्भर होती हैं।
- इनकी बढ़ती हिस्सेदारी के कारण DISCOMs को माँग का पूर्वानुमान लगाने, भीड़भाड़ का प्रबंधन करने, आपूर्ति एवं माँग में संतुलन स्थापित करने तथा ऊर्जा भंडारण और विद्युत खरीद का समन्वय करने की आवश्यकता है।
वितरण क्षेत्र में चुनौतियाँ एवं मुद्दे
- उच्च AT&C हानियाँ: तकनीकी कारणों अथवा विद्युत चोरी, दोषपूर्ण मीटरिंग और भुगतान न किए जाने के कारण ऊर्जा की हानि होती है।
- कमजोर नेटवर्क दृश्यता: अनेक विद्युत उपयोगिताओं के पास अपनी परिसंपत्तियों और विद्युत प्रवाह की व्यापक एवं वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
- नवीकरणीय ऊर्जा की अनिरंतरता: परिवर्तनशील विद्युत उत्पादन के कारण पूर्वानुमान एवं ग्रिड संतुलन अधिक जटिल हो जाता है।
- वित्तीय दबाव: राजस्व में कमी आधुनिकरण में निवेश को सीमित करती है।
- सुधारों के प्रदर्शन में असमानता: राष्ट्रीय औसत विभिन्न राज्यों के बीच उपस्थित महत्वपूर्ण अंतरों को छिपा देते हैं।
- उपभोक्ता-केंद्रित मापदंडों का सीमित उपयोग: आपूर्ति की विश्वसनीयता, विद्युत आपूर्ति बहाली में लगने वाला समय तथा बिलिंग की सटीकता जैसे मापदंडों का पर्याप्त रूप से आकलन नहीं किया जाता है।
- कौशल की कमी: डिजिटल प्रणालियों के लिए ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, जो आँकड़ों का विश्लेषण करने और उसके आधार पर कार्रवाई करने में सक्षम हों।
विद्युत वितरण से संबंधित प्रमुख प्रयास एवं पहल
- पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): इसका उद्देश्य अवसंरचना के आधुनिकीकरण, हानि में कमी तथा बेहतर मीटरिंग के माध्यम से DISCOMs की परिचालन एवं वित्तीय स्थिरता में सुधार करना है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित उपायों को समर्थन दिया जाता है:
- सबस्टेशनों एवं वितरण ट्रांसफॉर्मरों का उन्नयन।
- फीडरों का पृथक्करण।
- स्मार्ट मीटरिंग एवं आधुनिक वितरण अवसंरचना।
- मापनीय प्रदर्शन परिणामों के माध्यम से अधिक जवाबदेही।
- नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण हेतु नीतिगत समर्थन: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने घरेलू सौर विनिर्माण को सुदृढ़ किया है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार को समर्थन मिला है।
- बोली एवं नियामक सुधार: प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया, बेहतर टैरिफ निर्धारण प्रक्रियाओं तथा अधिक वित्तीय अनुशासन ने अधिक पूर्वानुमेय निवेश वातावरण निर्मित करने में सहायता की है।
डिजिटलीकरण: DISCOMs में छूटी हुई महत्वपूर्ण कड़ी
- डिजिटलीकरण DISCOMs को प्रतिक्रियात्मक उपयोगिताओं से पूर्वानुमान-आधारित संगठनों में परिवर्तित कर सकता है। इसे तीन परस्पर संबद्ध स्तरों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है:
- डिजिटल मानचित्रण: प्रत्येक ट्रांसफॉर्मर, फीडर, सबस्टेशन और विद्युत खंभे का भौगोलिक स्थान निर्धारित कर उसका डिजिटल मानचित्र तैयार किया जाना चाहिए। इससे विद्युत उपयोगिताओं को यह जानकारी प्राप्त होगी कि उनके पास कौन-कौन सी परिसंपत्तियाँ हैं और वे कहाँ स्थित हैं।
- वास्तविक समय नेटवर्क दृश्यता: लाइव डेटा यह प्रदर्शित कर सकता है कि विद्युत किस प्रकार प्रवाहित हो रही है, कहाँ हानियाँ हो रही हैं तथा कहाँ भीड़भाड़ या खराबियाँ उत्पन्न हो रही हैं। स्मार्ट मीटर, सेंसर एवं स्वचालित प्रणालियाँ यह परिचालन संबंधी जानकारी उपलब्ध करा सकती हैं।
- पूर्वानुमान एवं पूर्वानुमान-आधारित प्रबंधन: परिसंपत्तियों एवं विद्युत प्रवाह की जानकारी उपलब्ध होने के बाद उपयोगिताएँ क्षेत्रवार एवं घंटेवार विद्युत माँग का पूर्वानुमान लगा सकती हैं, विद्युत खरीद को अनुकूलित कर सकती हैं, रखरखाव का समय निर्धारित कर सकती हैं तथा उपकरणों की संभावित विफलताओं का पूर्वानुमान लगा सकती हैं।
केस स्टडी: राजस्थान से प्राप्त साक्ष्य
- राजस्थान ने जनवरी से अप्रैल के बीच लगभग 11.5 GW पवन एवं सौर ऊर्जा का उपयोग कम किया, जो नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और ग्रिड की उसे अवशोषित करने की क्षमता के बीच विद्यमान अंतर को दर्शाता है।
- जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) का अनुभव डिजिटलीकरण की संभावनाओं को स्पष्ट करता है।
- इसकी डिजिटल ट्विन पहल के अंतर्गत लगभग 40 लाख परिसंपत्तियों का डिजिटलीकरण किया गया है तथा प्रतिदिन लगभग 12 करोड़ रिकॉर्ड संसाधित किए जाते हैं।
- इस पहल से प्रतिवर्ष लगभग ₹200 करोड़ की बचत होने का अनुमान है।
- ऐसे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं कि डिजिटल अवसंरचना आँकड़ों को परिचालन एवं वित्तीय लाभ में परिवर्तित कर सकती है।
प्रौद्योगिकी से आगे: मानव एवं उपभोक्ता-केंद्रित सुधार
- केवल डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है। DISCOM कर्मचारियों को डेटा विश्लेषण, पूर्वानुमान, परिसंपत्ति प्रबंधन एवं डिजिटल निर्णय-निर्माण में प्रशिक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है।
- स्मार्ट-ग्रिड के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा एवं डेटा प्रशासन को भी समान रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- इसी प्रकार, उपभोक्ता-केंद्रित प्रदर्शन संकेतकों की ओर परिवर्तन भी महत्वपूर्ण है।
- उपयोगिताओं का मूल्यांकन केवल स्थापित क्षमता और वित्तीय प्रदर्शन के आधार पर नहीं, बल्कि निम्नलिखित आधारों पर भी किया जाना चाहिए:
- बिना बाधा विद्युत आपूर्ति के घंटे;
- खराबी की स्थिति में विद्युत आपूर्ति पुनर्स्थापित करने का समय;
- बिलिंग की सटीकता;
- फीडर-स्तरीय विश्वसनीयता;
- उपभोक्ता शिकायतों का समाधान।
- ऐसे मापदंड विद्युत वितरण को एक मापनीय सार्वजनिक सेवा परिणाम के रूप में स्थापित करने में सहायता करेंगे।
आगे की राह
- भारत ने पहले ही वितरण क्षेत्र के सुधारों के लिए ₹3 लाख करोड़ से अधिक की राशि प्रतिबद्ध की है।
- आगामी चरण में इस व्यय के साथ डिजिटलीकरण को अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। इसके लिए विद्युत उपयोगिताओं को:
- नेटवर्क मानचित्रण और फीडर-स्तरीय डेटा को भविष्य के वितरण वित्तपोषण की एक शर्त बनाना चाहिए।
- सत्यापित हानि-कमी और विश्वसनीयता में सुधार के आधार पर उपयोगिताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।
- स्मार्ट मीटर, SCADA, GIS, डिजिटल ट्विन तथा AI-सक्षम पूर्वानुमान का व्यापक विस्तार करना चाहिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ बैटरी भंडारण, माँग प्रतिक्रिया तथा लचीले विद्युत उत्पादन को एकीकृत करना चाहिए।
- DISCOMs के अंदर विशिष्ट डिजिटल एवं डेटा-विश्लेषण कौशल विकसित करने चाहिए।
- आपूर्ति के घंटे, विद्युत कटौती की अवधि और बिलिंग की सटीकता जैसे उपभोक्ता-केंद्रित संकेतक लागू करने चाहिए।
- कमजोर उपभोक्ताओं को लक्षित सब्सिडी के माध्यम से संरक्षण प्रदान करते हुए लागत-परिलक्षित टैरिफ को सुदृढ़ करना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन एवं क्षमता निर्माण के लिए सरकार–DISCOM–निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: DISCOMs की वित्तीय स्थिरता में सुधार करने तथा भारत की विद्युत प्रणाली में नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में डिजिटलीकरण के महत्व की चर्चा कीजिए। |
स्रोत: HT