पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत द्वारा किए गए प्रमुख अंतरिक्ष क्षेत्रीय सुधारों ने निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार किया है तथा उन्नत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के विकास को सक्षम बनाया है।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रमुख सुधार
- IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र, 2020) की स्थापना: यह निजी कंपनियों के लिए एकल-खिड़की नियामक एवं सुविधा प्रदाता के रूप में कार्य करता है तथा अंतरिक्ष गतिविधियों में उनकी भागीदारी को अधिकृत और प्रोत्साहित करता है।
- न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (2019) के माध्यम से निगमितकरण: इसे ISRO की वाणिज्यिक शाखा के रूप में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना, उद्योग के माध्यम से उपग्रहों/प्रक्षेपण यानों का निर्माण कराना तथा वाणिज्यिक उपग्रह सेवाएँ उपलब्ध कराना है।
- निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए IN-SPACe द्वारा योजनाएँ: सीड फंड योजना, मूल्य निर्धारण सहायता नीति, मेंटरशिप सहायता, गैर-सरकारी संस्थाओं (NGEs) के लिए डिजाइन लैब, अंतरिक्ष क्षेत्र में कौशल विकास, ISRO की सुविधाओं के उपयोग में सहायता तथा गैर-सरकारी संस्थाओं (NGEs) को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसी योजनाएँ लागू की गई हैं।
- IN-SPACe के अंतर्गत ₹1,000 करोड़ का वेंचर कैपिटल (VC) फंड अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को गति देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
- IN-SPACe ने ₹500 करोड़ का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड (TAF) भी शुरू किया है।
- अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए उदारीकृत FDI नीति: संशोधित नीति के अंतर्गत उपग्रह निर्माण एवं संचालन में 74% तक, प्रक्षेपण यानों एवं स्पेसपोर्ट में 49% तक तथा उपग्रह घटकों और उप-प्रणालियों के निर्माण में 100% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को स्वचालित मार्ग के अंतर्गत अनुमति दी गई है।
- स्पेसटेक इनोवेशन नेटवर्क(SpIN): SpIN अंतरिक्ष उद्योग में स्टार्टअप और लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए अपनी तरह का एक विशिष्ट सार्वजनिक-निजी सहयोग मंच है।

भारत का उभरता निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र
- भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वर्तमान में 8.4 अरब डॉलर की है, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग 2–3% है। वर्ष 2030 तक इसके 40–45 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
- भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने भारत में निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए अंतरिक्ष-संबंधी गतिविधियों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया।
- पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियाँ अंतरिक्ष क्षेत्र के एक नए युग की अग्रणी कंपनियों के रूप में उभरी हैं।
- स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की प्रथम स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी बनी। इसके विक्रम-1 ने सफलतापूर्वक निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में पेलोड स्थापित करके निजी तौर पर विकसित भारत के पहले ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट के रूप में उपलब्धि हासिल की।
- पिक्सेल स्पेस हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह विकसित कर रही है, जो भारत, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में वाणिज्यिक ग्राहकों तथा सरकारी एजेंसियों को पृथ्वी अवलोकन संबंधी डेटा उपलब्ध कराते हैं।

आत्मनिर्भर अंतरिक्ष परिवहन
- भारत ने चार स्वदेशी प्रक्षेपण यानों को परिचालन में ला दिया है:
- ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV),
- भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV),
- भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान मार्क III (GSLV Mk III), और
- लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV)।
- ये प्रक्षेपण यान पृथ्वी अवलोकन, संचार, नौवहन, अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं में भी सहयोग प्रदान करते हैं।
- वर्ष 2023 से 2026 के बीच भारत ने 12 प्रक्षेपण यान मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिनमें 11 राष्ट्रीय उपग्रह और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए नौ उपग्रह प्रक्षेपित किए गए।
भारत की प्रमुख अंतरिक्ष उपलब्धियाँ
- चंद्रयान-3 (2023) ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला प्रथम देश तथा चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना दिया।
- मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन) को वर्ष 2014 में मंगल की कक्षा में स्थापित किया गया, जिससे यह भारत का प्रथम अंतरग्रहीय मिशन बना।
- AstroSat भारत का पहला समर्पित खगोलीय मिशन है, जिसका उद्देश्य एक्स-रे, ऑप्टिकल और पराबैंगनी (UV) स्पेक्ट्रल बैंड में आकाशीय पिंडों का एक साथ अध्ययन करना है।
- आदित्य-L1 (2023) सूर्य के अध्ययन के लिए भारत का प्रथम अंतरिक्ष-आधारित मिशन है। इसे सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु पर पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर स्थापित किया गया है।
- स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SPADEX), 2025 के माध्यम से भारत स्वायत्त अंतरिक्ष डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला विश्व का चौथा देश बन गया।
- भारतीय नक्षत्र-समूह के साथ नेविगेशन (NavIC) भारत तथा इसकी सीमा से 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में स्थिति निर्धारण, नौवहन और समय संबंधी सेवाएँ प्रदान करता है।
चुनौतियाँ
- महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता: भारत को अभी भी उन्नत प्रणोदन प्रणाली, उच्च क्षमता वाले सेंसर, अंतरिक्ष-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत सामग्रियों और सेमीकंडक्टर घटकों जैसे क्षेत्रों में प्रौद्योगिकीय कमियों का सामना करना पड़ रहा है।
- बुनियादी ढाँचे की सीमाएँ: विशेषीकृत परीक्षण सुविधाओं, प्रक्षेपण अवसंरचना और अन्य अंतरिक्ष-ग्रेड सुविधाओं तक सीमित पहुँच से प्रौद्योगिकी विकास में लगने वाला समय एवं लागत बढ़ सकती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारतीय कंपनियों को ऐसी स्थापित अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, जिन्हें पूंजी तक अधिक पहुँच, परिपक्व आपूर्ति शृंखलाओं और उन्नत प्रौद्योगिकियों का लाभ प्राप्त है।
- निजी क्षेत्र का सीमित पैमाना: अधिकांश भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप अभी भी प्रारंभिक चरण में हैं और प्रोटोटाइप से व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रणालियों तक प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर विकसित करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
आगे की राह
- भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों ने इस क्षेत्र को मुख्यतः सरकार-प्रेरित क्षेत्र से विकसित होते सार्वजनिक-निजी पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित कर दिया है।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकियों, निजी नवाचार, कुशल मानव संसाधन और सक्षम नियामक व्यवस्था में निरंतर निवेश से भारत को आत्मनिर्भर, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी एवं सतत अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायता मिल सकती है।
स्रोत: AIR
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