भारतीय उद्योग जगत के अनुसंधान एवं विकास की चुनौती: आर्थिक उदारीकरण से वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता तक

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • हाल के कॉरपोरेट अनुसंधान एवं विकास (R&D) संबंधी आँकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय कंपनियाँ नवाचार पर अपने व्यय में वृद्धि कर रही हैं, लेकिन निवेश की मात्रा अभी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के समकक्ष पहुँचने और सतत तकनीकी प्रतिस्पर्धात्मकता विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

भारत में अनुसंधान एवं विकास की वर्तमान स्थिति

  • कॉरपोरेट क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। R&D पर व्यय वित्त वर्ष 1999 में लगभग 150 से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 471 हो गया है।
  • कुल R&D व्यय वित्त वर्ष 1999 में ₹957.8 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में ₹63,529.2 करोड़ हो गया, जो 16.8% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्शाता है। यह शुद्ध बिक्री में 12.9% की CAGR से अधिक है।
  • हालाँकि, R&D की तीव्रता अभी भी सीमित है। वित्त वर्ष 2026 में संयुक्त शुद्ध बिक्री में R&D का हिस्सा 0.91% रहा, जबकि वित्त वर्ष 1999 में यह 0.36% और वित्त वर्ष 2017 में ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक 1.15% था।
    • R&D की सूचना देने वाली 471 कंपनियों में से केवल लगभग आधी कंपनियों ने अपनी बिक्री का कम-से-कम 1% R&D पर व्यय किया।

1991 के बाद के सुधार: R&D की ओर परिवर्तन

  • 1991 का भुगतान संतुलन (BoP) संकट भारत की विदेशी मुद्रा आय और व्यय के बीच असंतुलन को दर्शाता था। इस संकट ने भारत की कमजोर निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को उजागर किया।
  • सुधारों से पहले भारतीय उद्यम मुख्यतः घरेलू बाजार पर केंद्रित थे और निर्यात तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देते थे।
  • उदारीकरण का उद्देश्य दक्षता, प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण में सुधार करना था।
  • प्रारंभिक दौर में, 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के दशक के प्रारंभ में कॉरपोरेट R&D का प्रमुख ध्यान आयातित प्रौद्योगिकियों को आत्मसात करने पर था।
  • इसके बाद कंपनियों ने स्वदेशी उत्पादों और समाधानों के विकास की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाया।

R&D में वृद्धि अभी भी अपर्याप्त क्यों है?

  • कम R&D तीव्रता: समग्र रूप से कंपनियों द्वारा किया जाने वाला R&D व्यय अभी भी तकनीकी नेतृत्व के लिए आवश्यक स्तर से कम है।
  • क्षेत्रीय संकेंद्रण: ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल क्षेत्र प्रमुख हैं, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और उन्नत कंप्यूटिंग जैसे उभरते वैश्विक R&D क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
  • अल्पकालिक वाणिज्यिक दृष्टिकोण: R&D का संबंध लाभप्रदता से जुड़ा हुआ है। तीन वर्ष में औसत परिचालन लाभ में वृद्धि का R&D वृद्धि के साथ 70% सहसंबंध है।
  • नवाचार का सीमित पैमाना: WIPO के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, TVS Motors ने 2022-24 के दौरान 283 पेटेंट दाखिल किए, जबकि Huawei ने इसी अवधि में 20,783 पेटेंट दाखिल किए।
  • IT क्षेत्र की संवेदनशीलता: वित्त वर्ष 2026 में प्रमुख भारतीय IT कंपनियों का R&D व्यय बिक्री का केवल 0.58% रहा, जबकि AI विभिन्न पारंपरिक सेवाओं के स्वचालन के लिए चुनौती उत्पन्न कर रहा है।

संबंधित प्रयास एवं पहल

  • सुधारों के बाद की अर्थव्यवस्था में कंपनियों ने समर्पित R&D सुविधाएँ स्थापित की हैं और R&D को रणनीतिक निवेश के रूप में अधिकाधिक महत्व देना शुरू किया है।
    • नीतिगत प्राथमिकता प्रौद्योगिकी के आत्मसातीकरण से आगे बढ़कर स्वदेशी उत्पादों के विकास, तकनीकी नेतृत्व और नवाचार की ओर परिवर्तित हो रही है। यह अनुसंधान में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के समग्र प्रयासों में भी परिलक्षित होता है।
  • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): इसका गठन ANRF अधिनियम, 2023 के अंतर्गत भारत के अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने तथा शिक्षा जगत, सरकार और उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है।
    • इसका उद्देश्य अंतर्विषयक अनुसंधान को प्रोत्साहित करना तथा अनुसंधान के नवाचार और आर्थिक अनुप्रयोगों में रूपांतरण को बढ़ाना है।
  • अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) सहायता: हाल की सरकारी पहलों का ध्यान निजी क्षेत्र में R&D को प्रोत्साहित करने पर बढ़ता जा रहा है, विशेष रूप से डीप-टेक और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में।
    • इसका उद्देश्य उद्योग को अधिक जोखिमपूर्ण और दीर्घकालिक R&D में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करके सार्वजनिक अनुसंधान और वाणिज्यिक नवाचार के बीच के अंतर को कम करना है।
  • उद्योग-नेतृत्व वाली R&D अवसंरचना: भारतीय कंपनियाँ तीव्रता से समर्पित R&D केंद्र, प्रौद्योगिकी परिसर और उत्पाद-विकास सुविधाएँ स्थापित कर रही हैं।
    • यह केवल आयातित प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने से आगे बढ़कर स्वदेशी उत्पादों और समाधानों के विकास की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
  • स्टार्ट-अप और डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र: भारत का विस्तारित स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र अनुसंधान को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रौद्योगिकियों में रूपांतरित करने का एक माध्यम प्रदान करता है।
    • स्टार्ट-अप, स्थापित कंपनियों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के बीच अधिक सहयोग से आविष्कार एवं उसके व्यावसायीकरण के बीच पारंपरिक अंतर को कम करने में सहायता मिल सकती है।
  • क्षेत्र-विशिष्ट नवाचार को बढ़ावा: नवाचार को रणनीतिक क्षेत्रों के साथ तीव्रता से जोड़ा जा रहा है, जैसे:
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उन्नत कंप्यूटिंग;
    • रक्षा और एयरोस्पेस;
    • इलेक्ट्रिक वाहन और वैकल्पिक ईंधन प्रौद्योगिकियाँ;
    • फार्मास्यूटिकल्स और जैव-प्रौद्योगिकी;
    • सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स; तथा
    • क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ।
  • शिक्षा जगत–उद्योग संबंध: एक सुदृढ़ नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को कंपनियों के साथ संयुक्त R&D, ज्ञान हस्तांतरण, पेटेंट और उत्पाद विकास के क्षेत्र में सहयोग करने की आवश्यकता है।
    • इससे शैक्षणिक अनुसंधान को उद्योग और समाज की आवश्यकताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

आगे की राह

  • फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल से आगे बढ़कर विशेष रूप से निजी क्षेत्र में R&D की तीव्रता बढ़ाई जाए।
  • उद्योग–विश्वविद्यालय–सरकार के बीच सहयोग तथा अनुसंधान के व्यावसायीकरण को बढ़ावा दिया जाए।
  • स्थिर नीतिगत समर्थन और जोखिम-साझाकरण तंत्रों के माध्यम से दीर्घकालिक R&D को प्रोत्साहित किया जाए।
  • पेटेंट निर्माण तथा बौद्धिक संपदा संबंधी क्षमताओं को सुदृढ़ किया जाए।
  • भारतीय IT कंपनियों को AI, उन्नत कंप्यूटिंग और उभरती प्रौद्योगिकियों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  • R&D को निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ा जाए, ताकि नवाचार वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादों में परिवर्तित हो सके।

निष्कर्ष

  • भारत संरक्षित बाजार मॉडल से आगे बढ़कर अधिक तकनीकी महत्वाकांक्षा की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
  • हालाँकि, केंद्रीय चुनौती बढ़ते R&D व्यय को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी पेटेंट, उत्पादों और प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित करने की है। इसके लिए भारत को निर्णायक रूप से ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘भारत में परिकल्पित और नवाचारित’ की दिशा में अग्रसर होना होगा।

स्रोत: BS

 

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