वैश्विक तापन की सीमा के उल्लंघन के प्रबंधन हेतु संयुक्त राष्ट्र द्वारा कार्ययोजना निर्धारित

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण और पारिस्थितिकी

संदर्भ

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने ‘लिमिटिंग ओवरशूट’ रिपोर्ट जारी की है। इसमें पेरिस समझौते द्वारा निर्धारित 1.5°C वैश्विक तापन सीमा के संभावित अस्थायी उल्लंघन से निपटने के लिए “अधिक्रमण, चरम एवं गिरावट” मार्ग की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।

“अधिक्रमण, चरम एवं गिरावट”मार्ग क्या है?

  • अधिक्रमण (Overshoot): वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में अस्थायी रूप से 1.5°C से अधिक हो जाता है।
  • चरम (Peak): तापमान में वृद्धि को यथासंभव न्यूनतम स्तर पर सीमित रखा जाना चाहिए तथा 1.5°C से अधिक तापमान की अवधि को न्यूनतम किया जाना चाहिए।
  • गिरावट (Decline): उत्सर्जन में व्यापक एवं गंभीर कटौती तथा बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन के माध्यम से इस शताब्दी के अंत तक वैश्विक तापमान को पुनः 1.5°C से नीचे लाया जाना चाहिए।
    • UNEP के अनुसार यह कोई स्वीकार्य या वांछनीय मार्ग नहीं है, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में उपलब्ध “सर्वोत्तम शेष विकल्प” है।

1.5°C की सीमा का अधिक्रमण क्यों संभावित होता जा रहा है?

  • UNEP के अनुमान के अनुसार वैश्विक तापन आगामी कुछ वर्षों में 1.5°C की सीमा को पार कर सकता है।
  • यदि सभी देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) तथा नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू भी कर दें, तब भी चरम वैश्विक तापन लगभग 1.8°C तक पहुँच सकता है।
  • वर्तमान नीतियों के जारी रहने की स्थिति में वर्ष 2100 तक लगभग 2.6°C तापमान वृद्धि हो सकती है, जिसकी अनुमानित सीमा 1.9°C–3.6°C है।
  • वैश्विक कार्बन बजट के शेष हिस्से का तीव्रता से क्षय होने के कारण तापमान की अस्थायी अधिक्रमण स्थिति से बचने की संभावना कम होती जा रही है।

अधिक्रमण की चुनौती को अंतरराष्ट्रीय मान्यता

  • इस अवधारणा को राजनयिक आधार 2025 में ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित 30वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP30) में मिला। वहाँ सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए “ग्लोबल मुतिराओ” निर्णय में प्रथम बार किसी COP दस्तावेज़ ने यह स्वीकार किया कि 1.5°C की सीमा का अस्थायी अधिक्रमण तेजी से संभावित होता जा रहा है।
  • देशों ने निम्नलिखित के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की:
    • अधिक्रमण की तीव्रता और अवधि को सीमित करना।
    • उत्सर्जन में गहरी एवं सतत कटौती को तीव्र करना।
    • मौजूदा अनुकूलन संबंधी अंतरालों को कम करना।
    • वनीकरण सहित प्रकृति-आधारित कार्बन निष्कासन को बड़े पैमाने पर बढ़ाना।

अधिक्रमण की अवधि क्यों महत्वपूर्ण है?

  • UNEP की रिपोर्ट के अनुसार 1.5°C से ऊपर तापमान के बने रहने की अवधि बढ़ने से कई संचयी एवं गंभीर प्रभाव उत्पन्न होते हैं। इनमें समुद्र-स्तर में तीव्रता से वृद्धि, प्रवाल भित्तियों का क्षय, वर्ष 2100 तक वैश्विक हिमनद द्रव्यमान के एक-चौथाई से अधिक का क्षरण तथा वर्ष 2050 तक वैश्विक खाद्य उत्पादन में 14% तक की कमी शामिल है।
  • उच्च उत्सर्जन की प्रत्येक अतिरिक्त पाँच वर्ष की अवधि चरम वैश्विक तापन में लगभग 0.1°C की वृद्धि कर सकती है।
  • प्रभावी अनुकूलन उपायों के अभाव में पश्चिमी अंटार्कटिक एवं ग्रीनलैंड की हिम चादरों, अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) तथा अमेज़न क्षेत्र में अपरिवर्तनीय टिपिंग पॉइंट्स का जोखिम बढ़ जाता है।

कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन (CDR) की भूमिका

  • कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन उत्सर्जन में कटौती का विकल्प नहीं हो सकता; इसके लिए उत्सर्जन में गंभीर कटौती के अतिरिक्त CDR की आवश्यकता होगी।
  • इसके संभावित उपायों में शामिल हैं:
    • वनीकरण एवं पुनर्वनीकरण।
    • पारिस्थितिकी तंत्र एवं मृदा का पुनर्स्थापन।
    • अन्य तकनीकी एवं इंजीनियर्ड कार्बन निष्कासन विधियाँ।
  • UNEP इस बात पर बल देता है कि तापमान को विश्वसनीय रूप से पुनः 1.5°C के आसपास लाना तभी संभव है, जब चरम वैश्विक तापन 2°C से काफी नीचे बना रहे।
  • मीथेन संबंधी लक्ष्य: रिपोर्ट में मीथेन पर विशेष बल दिया गया है। वर्तमान में मीथेन लगभग 0.5°C तापमान वृद्धि में योगदान देता है। इसके उत्सर्जन में कमी को निकट अवधि में वैश्विक तापन की गति को धीमा करने का सबसे प्रभावी उपाय बताया गया है।
    • 155 से अधिक देश ग्लोबल मीथेन प्लेज में शामिल हो चुके हैं, जिसके अंतर्गत वर्ष 2030 तक मानवजनित मीथेन उत्सर्जन को वर्ष 2020 के स्तर से कम-से-कम 30% कम करने का लक्ष्य है।

आगे की राह

  • UNEP द्वारा प्रस्तुत मार्ग केवल 1.5°C की सीमा को पार होने से रोकने की रणनीति तक सीमित रहने के बजाय, संभावित अस्थायी अधिक्रमण का प्रबंधन करने तथा इससे कहीं अधिक खतरनाक तापमान वृद्धि की दिशा को रोकने की ओर रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है।
  • विश्व जितने अधिक समय तक और जितने अधिक स्तर पर 1.5°C से ऊपर रहेगा, अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक एवं आर्थिक क्षति का जोखिम उतना ही बढ़ेगा और तापमान को पुनः कम करना उतना ही कठिन होता जाएगा।
  • अतः सबसे प्रभावी रणनीति “महत्त्वाकांक्षा का अधिक्रमण” होनी चाहिए, जिसमें उत्सर्जन में तीव्र कटौती के साथ मीथेन उत्सर्जन में कमी, जलवायु अनुकूलन तथा सुविचारित एवं चरणबद्ध कार्बन निष्कासन को सम्मिलित किया जाए।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा प्रस्तुत देश-विशिष्ट जलवायु कार्रवाई योजनाएँ हैं।
  • इनमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन से संबंधित लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।
  • NDCs को समय-समय पर संशोधित किया जाता है, ताकि जलवायु कार्रवाई की महत्त्वाकांक्षा को और बढ़ाया जा सके।

भारत के NDC के मार्गदर्शक सिद्धांत

  • भारत का NDC साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित है। यह दृष्टिकोण समानता एवं जलवायु न्याय पर बल देता है।
  • भारत का NDC विकास संबंधी आवश्यकताओं, ऊर्जा सुरक्षा तथा जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।

NDC 3.0 (2031–2035) के प्रमुख लक्ष्य

  • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता (GDP की प्रति इकाई CO₂ उत्सर्जन) को 47% तक कम करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
    • भारत वर्ष 2005 से 2020 के बीच अपनी उत्सर्जन तीव्रता में लगभग 36% की कमी पहले ही प्राप्त कर चुका है।
  • गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता का विस्तार: भारत ने वर्ष 2035 तक अपनी स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
    • भारत वर्ष 2026 तक अपनी स्थापित विद्युत क्षमता में 52% से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता पहले ही प्राप्त कर चुका है, जो उसके पूर्व निर्धारित लक्ष्य से आगे है।
  • कार्बन सिंक का निर्माण: भारत ने वर्ष 2035 तक वन एवं वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समतुल्य का कार्बन सिंक विकसित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

Source: TH

 

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