पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य; GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अनुकूलित किया जा सकता है। इसके माध्यम से उपचार में होने वाली देरी को कम किया जा सकता है, चिकित्सक अधिक सूचित एवं बेहतर निर्णय ले सकते हैं तथा अधिक रोगियों को उपयुक्त स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
परिचय
- वर्ष 2025 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित 1,000 से अधिक चिकित्सा उपकरणों को स्वीकृति प्रदान की। इनमें विकिरण-विज्ञान, हृदय-विज्ञान तथा रोगों की पहचान से संबंधित अन्य क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले उपकरण शामिल हैं।
- यूनाइटेड किंगडम में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) ने वर्ष 2025 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पृष्ठभूमि चिकित्सकीय लेखन के उपयोग के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
- वर्ष 2026 तक, वहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम विकसित किया जा रहा था।
- ये प्रयास स्वास्थ्य सेवाओं में हो रहे व्यापक परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल नवाचार से जुड़ी टीमों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि चिकित्सकीय परामर्श, रोगों की पहचान से संबंधित कार्यप्रणालियों तथा अस्पतालों के संचालन में भी इसका उपयोग बढ़ रहा है।
भारत का स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र
- भारत की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को मुख्यतः दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जाता है—सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र।
- सार्वजनिक क्षेत्र: इसमें प्रमुख शहरों में सीमित संख्या में द्वितीयक और तृतीयक चिकित्सा संस्थान शामिल हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- निजी क्षेत्र: निजी क्षेत्र में द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थक चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने वाले अधिकांश संस्थान शामिल हैं। इनकी प्रमुख एकाग्रता महानगरों तथा प्रथम और द्वितीय श्रेणी के शहरों में है।
- चिकित्सा पर्यटन: वर्ष 2020–2021 के चिकित्सा पर्यटन सूचकांक में भारत विश्व के 46 गंतव्यों में 10वें स्थान पर रहा।
- विश्व के 20 प्रमुख स्वास्थ्य एवं कल्याण पर्यटन बाजारों में भारत 12वें स्थान पर रहा।
- एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 10 प्रमुख स्वास्थ्य एवं कल्याण पर्यटन स्थलों में भारत 5वें स्थान पर रहा।
- भारत में कुल 69,364 अस्पताल हैं, जिनमें 43,486 निजी अस्पताल और 25,778 सार्वजनिक अस्पताल शामिल हैं। देश में लगभग 12 लाख पंजीकृत चिकित्सक हैं, जिससे चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित स्तर तक पहुँच गया है।
- भविष्य का अनुमान: भारत के अस्पताल क्षेत्र का राजस्व वर्ष 2020–21 में 7,940.87 अरब रुपये था और वर्ष 2027 तक इसके बढ़कर 18,348.78 अरब रुपये होने का अनुमान है। इस अवधि में इसके 18.24 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ने की संभावना है।
भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- बुनियादी ढाँचे की कमी: भारत अपर्याप्त स्वास्थ्य अवसंरचना की समस्या का सामना कर रहा है। देश में अनेक चिकित्सा संस्थानों में आवश्यक एवं पर्याप्त सुविधाओं का अभाव है।
- सरकार ने निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए कम-से-कम पाँच एकड़ भूमि पर निर्माण करना अनिवार्य किया था। इसके परिणामस्वरूप कई महाविद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किए गए, जहाँ जीवन-यापन की परिस्थितियों तथा कम वेतनमान के कारण पर्याप्त रूप से योग्य और पूर्णकालिक चिकित्सकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
- कुशल एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी: देश में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की गंभीर कमी है। इनमें चिकित्सक, नर्स, सहायक चिकित्सा कर्मी तथा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा कर्मी शामिल हैं।
- चिकित्सक-रोगी अनुपात अभी भी कम है। भारत में प्रति 1,000 लोगों पर केवल 0.7 चिकित्सक हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का औसत 2.5 चिकित्सक प्रति 1,000 व्यक्ति है।
- जनसंख्या घनत्व एवं जनसांख्यिकीय विविधता: भारत की विशाल एवं विविधतापूर्ण जनसंख्या सभी नागरिकों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने में विशिष्ट चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।
- वृद्ध होती जनसंख्या तथा उससे संबंधित दीर्घकालिक रोगों में वृद्धि स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त भार डाल रही है।
- स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक व्यक्तिगत व्यय: यद्यपि सार्वजनिक अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन इन संस्थानों में पर्याप्त कर्मचारियों की कमी, सीमित सुविधाएँ तथा उनका मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में स्थित होना एक गंभीर समस्या है। इसके कारण लोगों को निजी चिकित्सा संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है और स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यक्तिगत व्यय बढ़ जाता है।
- रोगों का बढ़ता भार: तपेदिक जैसे संक्रामक रोगों का उच्च प्रसार तथा मधुमेह और हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोगों का बढ़ता बोझ भारत के सामने दोहरी चुनौती प्रस्तुत करता है।
- प्रति वर्ष लगभग 58 लाख भारतीय हृदय एवं फेफड़ों से संबंधित रोगों, मस्तिष्काघात, कैंसर और मधुमेह के कारण मृत्यु का शिकार होते हैं।
- नैदानिक सेवाओं की कमी: भारत में रोगों की जाँच एवं पहचान से संबंधित सेवाएँ मुख्यतः महानगरों और बड़े शहरों तक ही केंद्रित हैं।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी से संबंधित समस्याएँ: स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच प्रभावी सहयोग स्थापित करना एक प्रमुख चुनौती है।
- इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र व्यापक जनस्वास्थ्य उद्देश्यों की पूर्ति में प्रभावी योगदान दे।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित समाधान
- दक्षता बढ़ाना: ऐसा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण, जो किसी विकिरण-जाँच को प्राथमिकता देने, रोगी की स्थिति बिगड़ने पर चिकित्सा दल को सचेत करने अथवा किसी छोटे शहर में जटिल मामले का उपचार कर रहे चिकित्सक की सहायता करने में सक्षम हो, उपलब्ध स्वास्थ्य संसाधनों और क्षमता का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित कर सकता है।
- कुछ कार्यों का स्वचालन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियुक्ति निर्धारित करने, चिकित्सकीय दस्तावेज तैयार करने, दावों के निपटान, सामग्री की योजना बनाने तथा रोगी को अस्पताल से छुट्टी देने की प्रक्रिया जैसे कार्यों में सहायता कर सकती है। यदि इन कार्यों का उचित प्रबंधन न किया जाए, तो इनमें लगने वाला समय रोगी की देखभाल से ध्यान और संसाधन हटा सकता है।
- वित्तीय लाभ: जनवरी 2026 में मैकिन्से द्वारा किए गए एक विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित आय-वसूली प्रक्रियाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से वसूली की लागत में 30 से 60 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है।
- अस्पतालों के लिए इस प्रकार की बचत से चिकित्सा दलों, उपकरणों और स्वास्थ्य सेवा क्षमता के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं।
- इसके अतिरिक्त, प्रशासनिक कार्यों का भार कम होने से स्वास्थ्यकर्मियों में होने वाली थकान और कार्य-संबंधी दबाव को भी कम किया जा सकता है।
- दूरस्थ निगरानी: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से की जाने वाली दूरस्थ निगरानी से रोगी को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता बनाए रखी जा सकती है।
- जोखिम आधारित निवारक कार्यक्रम उन लोगों की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं जिन्हें रोग के लक्षण गंभीर होने से पहले चिकित्सकीय ध्यान की आवश्यकता है।
- दूरस्थ विशेषज्ञ सहायता के माध्यम से छोटे अस्पतालों को अन्य स्थानों पर उपलब्ध विशेषज्ञ चिकित्सकीय ज्ञान से जोड़ा जा सकता है।
- रोगों की जाँच एवं पहचान से संबंधित सेवाओं को समुदायों के निकट पहुँचाया जा सकता है, जबकि अस्पताल मधुमेह, हृदय रोग या कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे रोगियों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रख सकते हैं।
निष्कर्ष
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक परिवर्तन ला सकती है। यह गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय विशेषज्ञता को अधिक लोगों तक पहुँचाने, रोगों की प्रारंभिक पहचान करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की दक्षता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
- चूँकि स्वास्थ्य सेवाएँ भारत की जनसंख्या की उत्पादकता और कल्याण से निकटता से जुड़ी हुई हैं, इसलिए इनका प्रभाव केवल स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आर्थिक विकास पर भी पड़ता है।
- अतः स्वास्थ्य सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की वास्तविक सफलता केवल इसके तकनीकी उपयोग या व्यापक प्रसार से निर्धारित नहीं होगी। इसकी सफलता का वास्तविक मापदंड बेहतर स्वास्थ्य परिणाम, अधिक सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ और जीवन की बेहतर गुणवत्ता होगा।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 14-08-2026