पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- भारत में विगत एक दशक के दौरान शहद के उत्पादन में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। हालांकि, इस मधु क्रांति की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि मधुमक्खियों का संरक्षण किस प्रकार किया जाता है, क्योंकि वे आवश्यक परागणकर्ता होने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में बिना पारिश्रमिक के महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली प्राकृतिक शक्ति हैं।
बिना पारिश्रमिक के कृषि कार्यबल के रूप में मधुमक्खियाँ
- खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, परागणकर्ता विश्व के कुल फसल उत्पादन में लगभग एक-तिहाई योगदान देते हैं तथा 115 प्रमुख खाद्य फसलों में से 87 फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक होते हैं।
- मधुमक्खियों द्वारा किया जाने वाला परागण विशेष रूप से तिलहन, फलों, सब्जियों तथा कई अन्य खाद्य फसलों के लिए महत्वपूर्ण है। इस कारण मधुमक्खियाँ सतत कृषि व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।
- मधुमक्खी पालन ग्रामीण आजीविका के विविधीकरण, रोजगार सृजन तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में भी योगदान देता है।
भारत में मधुमक्खी पालन और शहद क्षेत्र
- भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा शहद उत्पादक देश बन गया है। यह मधुमक्खी पालन और व्यावसायिक स्तर पर शहद उत्पादन के विस्तार को दर्शाता है।
- भारत में पिछले एक दशक के दौरान शहद का उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। वर्ष 2013–14 में लगभग 76,000 टन उत्पादन की तुलना में वर्ष 2025–26 में यह बढ़कर लगभग 1,51,000 टन हो गया।
- भारत विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक शहद का निर्यात करता है, जिनमें सरसों/तोरी का शहद, नीलगिरी का शहद, लीची का शहद और सूरजमुखी का शहद आदि प्रमुख हैं।
- भारत में शहद के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं:
- उत्तर प्रदेश — 17%
- पश्चिम बंगाल — 16%
- पंजाब — 14%
- बिहार — 12%
- राजस्थान — 9%
- भारत के प्रमुख निर्यात गंतव्यों में संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और लीबिया शामिल हैं।
- भारत के कुल शहद उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत निर्यात किया जाता है। वर्ष 2025–26 में शहद का निर्यात लगभग 208 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। वैश्विक शहद निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 8.4 प्रतिशत है।
राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन (NBHM)
- राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसे राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड के माध्यम से लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को समग्र रूप से बढ़ावा देना एवं उसका विकास करना तथा गुणवत्तापूर्ण शहद एवं मधुमक्खी के छत्ते से प्राप्त अन्य उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना है।

प्रमुख चुनौतियाँ
- भारत का शहद निर्यात अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भर रहा है। वर्ष 2025–26 में भारत के कुल शहद निर्यात का लगभग 76 प्रतिशत अकेले अमेरिकी बाजार में गया।
- इस प्रकार की निर्भरता भारतीय मधुमक्खी पालकों और निर्यातकों को एक प्रमुख बाजार में शुल्क में बदलाव, व्यापार प्रतिबंधों, नियामकीय बाधाओं तथा मांग में परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
- कम मूल्य प्राप्ति: भारत मुख्यतः शहद का निर्यात बड़ी मात्रा में और अपेक्षाकृत कम ब्रांड पहचान वाले उत्पाद के रूप में करता है। इससे उच्च मूल्य वाले बाजारों में अधिक लाभ प्राप्त करने की उसकी क्षमता सीमित रहती है।
- घरेलू बाजार की अप्रयुक्त क्षमता: देश की बड़ी जनसंख्या और निरंतर बढ़ते उत्पादन के बावजूद भारत में प्रति व्यक्ति शहद की वार्षिक खपत लगभग 37 ग्राम ही है।
- कमजोर घरेलू बाजार के कारण इस क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय मांग पर निर्भरता में वृद्धि हो जाती है।
- मधुमक्खियों के स्वास्थ्य में गिरावट: कीटनाशकों का अनियंत्रित प्रयोग, विशेष रूप से फूल आने की अवधि के दौरान, मधुमक्खियों की संख्या और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तथा उनकी परागण संबंधी सेवाओं को कम करता है।
- अपर्याप्त परीक्षण व्यवस्था: नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद (NMR) आधारित परीक्षण, गुणवत्ता प्रमाणन, अवशेष परीक्षण और उत्पाद की उत्पत्ति एवं आपूर्ति-शृंखला का पता लगाने की व्यवस्था से संबंधित अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा उच्च मूल्य वाले अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच को सीमित कर सकता है।
आगे की राह
- भारत को केवल शहद तक सीमित रहने के बजाय मधुमोम, मधुमक्खी गोंद, राजमधु और मधुमक्खी परागकण जैसे अन्य उत्पादों के उत्पादन एवं विपणन का विस्तार करना चाहिए। इससे मधुमक्खी पालकों की आय बढ़ाने और अधिक मूल्य वाले बाजारों तक पहुँच बनाने में सहायता मिलेगी।
- अंतरराष्ट्रीय मानकों की कठोर आवश्यकताओं को पूरा करने तथा भारतीय शहद की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद आधारित परीक्षण प्रयोगशालाओं, गुणवत्ता प्रमाणन और उत्पाद की उत्पत्ति एवं आपूर्ति-शृंखला का पता लगाने वाली व्यवस्थाओं में निवेश आवश्यक है।
- स्थिरता: शहद उत्पादन के विस्तार से मधुमक्खियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए मधुमक्खियों के संरक्षण को केवल पर्यावरणीय प्राथमिकता के रूप में नहीं, बल्कि कृषि नीति की महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
स्रोत: IE
Previous article
मेघालय द्वारा खदान बंदी नीति के क्रियान्वयन में विलंब
Next article
ओडिशा में तटीय कटाव