कज़ाखस्तान ने क्लाउड सीडिंग का विकल्प अपनाया
पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/विज्ञान
संदर्भ
- देश में गंभीर सूखे और जल की कमी की समस्या से निपटने के लिए कज़ाखस्तान ने क्लाउड सीडिंग (मेघ बीजारोपण) का सहारा लिया है। यह मौसम में परिवर्तन करने की ऐसी विधि है, जिसका मध्य एशिया में पहले प्रयोग नहीं किया गया था।
क्लाउड सीडिंग क्या है?
- क्लाउड सीडिंग (मेघ बीजारोपण) मौसम में परिवर्तन की एक विधि है, जिसका उद्देश्य बादल की वर्षा या हिमपात उत्पन्न करने की क्षमता को बढ़ाना है।
- इतिहास: इसका प्रथम सफल प्रदर्शन वर्ष 1946 में अमेरिकी रसायनज्ञ एवं मौसम विज्ञानी विन्सेंट जे. शेफर ने किया था।
- बीजारोपण एजेंट: संघनन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए बादलों में सामान्यतः सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड जैसे लवणों का छिड़काव किया जाता है।
- सिल्वर आयोडाइड और शुष्क बर्फ (ठोस CO₂): इनका उपयोग अत्यधिक ठंडे बादलों में किया जाता है, जहाँ तापमान हिमांक से नीचे होता है।
- कैल्शियम क्लोराइड: इसका उपयोग अपेक्षाकृत गर्म बादलों में किया जाता है, जहाँ तापमान हिमांक से ऊपर होता है।
- कार्यप्रणाली: लवण अथवा बीजारोपण एजेंट ऐसे संघनन केंद्र (नाभिक) के रूप में कार्य करते हैं, जिनके चारों ओर जल की बूंदें बन सकती हैं या बर्फ के क्रिस्टल विकसित हो सकते हैं।
- जैसे-जैसे जल की बूंदें बड़ी होती जाती हैं, वे बादल में उपस्थित अन्य बूंदों से टकराती हैं। जब उनका भार पर्याप्त बढ़ जाता है, तो बादल संतृप्त हो जाता है और वर्षा होने लगती है।
- मौसम विज्ञानी ऐसे बादलों की पहचान करते हैं जिनमें पर्याप्त आर्द्रता होती है, लेकिन वे स्वयं पर्याप्त वर्षण उत्पन्न करने में सक्षम नहीं होते।
- प्रयोग की विधियाँ: इन कणों को विशेष विमानों, रॉकेटों या भूमि पर स्थापित प्रसार उपकरणों के माध्यम से बादलों में पहुँचाया जाता है।


स्रोत: TH
BNSS के अंतर्गत पुलिस हिरासत के दायरे पर सर्वोच्च न्यायालय की स्पष्टता
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(2) जाँच एजेंसी द्वारा पुलिस हिरासत की माँग किए जाने की अवधि को विस्तारित करती है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- विस्तारित दायरा: अब पुलिस हिरासत को हिरासत की शुरुआती 40/60 दिनों की अवधि के दौरान अलग-अलग चरणों में लिया जा सकता है, हालांकि इसकी कुल अवधि 15 दिनों से अधिक नहीं हो सकती।
- पहले पुलिस हिरासत केवल रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित थी।
- अधिवक्ता से मिलने का अधिकार: BNSS की धारा 38 के अंतर्गत अभियुक्त को अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक पूछताछ सत्र की पूरी अवधि के दौरान अधिवक्ता की निरंतर भौतिक उपस्थिति अनिवार्य होगी।
- मजिस्ट्रेट की भूमिका: मजिस्ट्रेट या न्यायालय अपने पर्यवेक्षण संबंधी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए हिरासत पर कोई ऐसी पूर्ण और गैर-विस्तार योग्य अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं कर सकता, जिसे आगे बढ़ाया ही न जा सके।
- न्यायालय ने 7 दिनों की अतिरिक्त पुलिस हिरासत की अनुमति दी, ताकि निचली न्यायालयों द्वारा दी गई हिरासत सहित पुलिस रिमांड की कुल अवधि 15 दिनों से अधिक न हो।
- इस विधायी परिवर्तन का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों से निपटना था, जहाँ जाँच के दौरान नए तथ्य, साक्ष्य या महत्वपूर्ण सुराग सामने आ सकते हैं।
- इसलिए पुलिस रिमांड की अवधि को शुरुआती 15 दिनों से आगे बढ़ाकर जाँच के 40वें या 60वें दिन तक उपलब्ध कराया गया है।
पुलिस रिमांड से संबंधित वर्तमान कानून
- BNSS की धारा 58 के अनुसार, पुलिस द्वारा बिना वारंट गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि धारा 187 के अंतगर्त मजिस्ट्रेट द्वारा इसकी अनुमति न दी गई हो।
- पुलिस हिरासत की अधिकतम अवधि 15 दिन है। इसे निम्नलिखित अवधि के दौरान अलग-अलग चरणों में दिया जा सकता है:
- 60 दिन, यदि अपराध के लिए कम-से-कम 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान हो;
- 40 दिन, किसी अन्य अपराध के मामले में।
- धारा 187(3) के अनुसार, यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि पर्याप्त आधार उपस्थित हैं, तो वह 15 दिनों की अवधि के बाद भी अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है। इसकी अधिकतम अवधि निम्नलिखित होगी:
- 90 दिन, यदि जाँच ऐसे अपराध से संबंधित है जिसके लिए मृत्यु-दंड, आजीवन कारावास या 10 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान है;
- 60 दिन, किसी अन्य अपराध के मामले में।
- इस प्रकार, यदि निर्धारित अवधि के अंदर जाँच पूरी नहीं होती है, तो अभियुक्त को रिहा किया जा सकता है। इसे सामान्यतः डिफॉल्ट जमानत कहा जाता है।
स्रोत: TH
ग्लूबॉल
पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
बीजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (BESIII) प्रयोग से ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो संकेत देते हैं कि X(2370) एक ग्लूबॉल हो सकता है। ग्लूबॉल ऐसा कण है, जिसकी संरचना में मुख्यतः ग्लूऑन होते हैं। ग्लूऑन प्रबल नाभिकीय बल के वाहक कण हैं।
ग्लूबॉल क्या है?
- ग्लूबॉल एक परिकल्पित संयुक्त कण है, जो मुख्यतः ग्लूऑनों से बना होता है।
- ग्लूऑन प्रबल नाभिकीय बल के बल-वाहक कण हैं। यही बल क्वार्कों को प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के अंदर एक साथ बाँधकर रखता है।
- ग्लूबॉल की भविष्यवाणी क्वांटम क्रोमोडायनेमिक्स (QCD) द्वारा की जाती है। QCD वह सिद्धांत है जो प्रबल अंतःक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
कणों के प्रकार
- मूलभूत कण: ये सबसे बुनियादी कण होते हैं और इनसे छोटे किसी अन्य कण से बने नहीं होते। उदाहरण के लिए, क्वार्क, लेप्टॉन और गेज बोसॉन।
- संयुक्त कण: ये मूलभूत कणों से मिलकर बने होते हैं। इसके सबसे प्रमुख उदाहरण प्रोटॉन और न्यूट्रॉन हैं, जो क्वार्कों से बने होते हैं।
स्रोत: TH
काली गर्दन वाली सारस (BNC)
पाठ्यक्रम: GS3/प्रजातियाँ
संदर्भ
- बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने लद्दाख में काली गर्दन वाली सारस (BNC) तथा अन्य वन्यजीवों के संरक्षण के लिए 2,950 से अधिक खुले में विचरण करने वाले कुत्तों (FRD) की नसबंदी की है।
काली गर्दन वाली सारस (ग्रस निग्रिकोलिस)
- विश्वभर में पाई जाने वाली सारस की 15 प्रजातियों में काली गर्दन वाली सारस को एकमात्र उच्च-ऊँचाई/अल्पाइन सारस प्रजाति माना जाता है।
- आवास एवं वितरण: भारत में यह मुख्यतः लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है, विशेषकर अधिक ऊँचाई वाले आर्द्रभूमि क्षेत्रों और दलदली क्षेत्रों में।
- इसका वैश्विक वितरण क्षेत्र तिब्बती पठार तथा इससे जुड़े हिमालयी क्षेत्रों तक फैला हुआ है, जिसमें चीन, भारत, भूटान और नेपाल शामिल हैं।
- जनसंख्या: भारत में काली गर्दन वाली सारस की संख्या 100 से कम होने का अनुमान है, जबकि विश्वभर में इसकी कुल संख्या लगभग 15,000 है।
- प्रमुख खतरे: खुले में विचरण करने वाले कुत्तों द्वारा शिकार, कृषि पद्धतियों में परिवर्तन तथा उच्च-ऊँचाई वाली आर्द्रभूमियों के आसपास तीव्रता से हो रहा और अनियंत्रित विकास इसके प्रमुख खतरों में शामिल हैं।
- संरक्षण स्थिति: इस प्रजाति को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसे CITES तथा प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय (CMS) के अंतर्गत भी संरक्षण प्राप्त है।
- IUCN की रेड लिस्ट के अंतर्गत इसे संकटासन्न श्रेणी में रखा गया है।
- राजकीय पक्षी: यह लद्दाख का राजकीय पक्षी है तथा लद्दाख की बौद्ध संस्कृति में इसका विशेष महत्व है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS)
- BNHS भारत के सबसे बड़े और सबसे पुराने गैर-सरकारी संगठनों में से एक है, जो प्रकृति संरक्षण एवं जैव विविधता अनुसंधान के लिए समर्पित है।
- इसकी स्थापना 15 सितंबर 1883 को मुंबई में हुई थी। इसका उद्देश्य अनुसंधान, शिक्षा और जन-जागरूकता पर आधारित कार्यों के माध्यम से प्रकृति का संरक्षण करना है।
स्रोत: DTE
हरित हाइड्रोजन
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
समाचार में
- जर्मनी हरित हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के साथ अपनी साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य कर रहा है। जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए जर्मनी द्वारा भारत से हरित हाइड्रोजन आयात करने की संभावना भी है।
ईंधन के रूप में हाइड्रोजन
- हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है, लेकिन यह मुक्त अवस्था में उपलब्ध नहीं होता और इसे जल जैसे यौगिकों से अलग करना पड़ता है।
- यह एक स्वच्छ ईंधन है, लेकिन इसके उत्पादन की प्रक्रिया ऊर्जा-गहन होती है।
- हाइड्रोजन को इसके स्रोत और उत्पादन की विधि के आधार पर विभिन्न ‘रंगों’ में वर्गीकृत किया जाता है।
प्रकार
- ग्रे हाइड्रोजन: जीवाश्म ईंधनों से उत्पादित हाइड्रोजन को ग्रे हाइड्रोजन कहा जाता है।
- वर्तमान में औद्योगिक उपभोग और विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए उत्पादित अधिकांश हाइड्रोजन ग्रे हाइड्रोजन है।
- ब्लू हाइड्रोजन: जीवाश्म ईंधनों से उत्पादित ऐसा हाइड्रोजन, जिसमें कार्बन कैप्चर एवं स्टोरेज (CCS) की व्यवस्था होती है, ब्लू हाइड्रोजन कहलाता है।
- हरित हाइड्रोजन: नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित इलेक्ट्रोलाइज़र के माध्यम से जल के विद्युत अपघटन द्वारा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग करके उत्पादित हाइड्रोजन को हरित हाइड्रोजन कहा जाता है।
- इसे हाइड्रोजन उत्पादन की लगभग उत्सर्जन-मुक्त प्रक्रिया माना जाता है।
हरित हाइड्रोजन एवं इसके लाभ
- यह सौर, पवन या जलविद्युत जैसी सतत ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके जल के विद्युत अपघटन से उत्पादित हाइड्रोजन है।
- यह एक स्वच्छ दहनशील अणु है, जिसका उपयोग परिवहन, रसायन तथा लौह एवं इस्पात जैसे विभिन्न उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए किया जा सकता है।
- इसके उत्पादन से ग्रीनहाउस गैसों का बहुत कम उत्सर्जन हो सकता है।
- ईंधन के रूप में उपयोग किए जाने पर इससे CO₂ का उत्सर्जन नहीं होता, इसलिए इसे स्वच्छ ईंधन माना जाता है।
उठाए गए कदम
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2023 में स्वीकृति दी थी। यह मिशन वर्ष 2047 तक भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता तथा वर्ष 2070 तक नेट-जीरो के लक्ष्य को प्राप्त करने में हरित हाइड्रोजन की भूमिका को मान्यता देता है।
- यह मिशन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा समर्थित है।
- मिशन हरित हाइड्रोजन को भारत के लिए एक उभरते हुए क्षेत्र के रूप में देखता है। इसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन तथा इसके व्युत्पन्न उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।
- NGHM के अंतर्गत वर्ष 2030 तक हरित हाइड्रोजन की उत्पादन क्षमता का लक्ष्य 50 लाख टन प्रति वर्ष रखा गया है। इससे जीवाश्म ईंधनों के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने में सहायता मिलने की अपेक्षा है।
- मिशन के लक्ष्यों की प्राप्ति से वर्ष 2030 तक भारत के जीवाश्म ईंधन आयात में संचयी रूप से लगभग ₹1 लाख करोड़ की कमी आने की अपेक्षा है।
स्रोत:TH
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बढ़ती बकाया राशि की प्राप्ति बैंकिंग क्षेत्र की सुदृढ़ होती वित्तीय स्थिति को दर्शाती है
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संक्षिप्त समाचार 13-08-2026