पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; पर्यावरण
संदर्भ
- भारत पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित एवं सतत पोत पुनर्चक्रण के लिए एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है।
पोत पुनर्चक्रण
- पोत पुनर्चक्रण से आशय ऐसे पोतों को विघटित करने की प्रक्रिया से है, जिनका उद्देश्य उनकी सामग्री, विशेष रूप से इस्पात, को निकालकर पुनः उपयोग के लिए प्राप्त करना होता है।
- यह समुद्री जीवन-चक्र का एक अभिन्न हिस्सा है, जो अपने परिचालन जीवन की अवधि पूरी कर चुके पोतों को सुरक्षित, पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल और संसाधन-कुशल तरीके से विघटित करने में सक्षम बनाता है।
भारत में वर्तमान स्थिति
- भारत का पोत पुनर्चक्रण क्षेत्र एक आधुनिक एवं अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उद्योग के रूप में विकसित हुआ है।
- भारत ने 2025 में वैश्विक स्तर पर पोत पुनर्चक्रण में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
- वैश्विक पोत पुनर्चक्रण में भारत की हिस्सेदारी 2024 के 30.1% से बढ़कर 2025 में 35.4% हो गई।
- भारत में पोत पुनर्चक्रण की मात्रा 2024 में 1.86 मिलियन ग्रॉस टन (GT) से बढ़कर 2025 में 2.99 मिलियन GT हो गई। अर्थात पुनर्चक्रित पोतों की मात्रा में लगभग 60% की वृद्धि हुई।
- भारत का लक्ष्य मैरीटाइम इंडिया विजन (MIV) 2030 के तहत अपनी पोत पुनर्चक्रण क्षमता को लगभग दोगुना करके लगभग 9 मिलियन लाइट डिस्प्लेसमेंट टन (LDT) करने का है।
महत्व
- पर्यावरणीय महत्व: सेवा-आयु पूरी कर चुके पोतों के निपटान के लिए उनके पुनर्चक्रण को नियंत्रित एवं व्यवस्थित किया जाता है।
- समुद्री और तटीय प्रदूषण की संभावना कम होती है।
- खतरनाक सामग्रियों का सुरक्षित प्रबंधन सुनिश्चित करते हुए उनका उचित पुनर्चक्रण किया जाता है तथा उन पर सख्त नियामक नियंत्रण लागू होते हैं।
- यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने तथा भारत के सतत विकास और डी-कार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में भी योगदान देता है।
- संसाधन क्षेत्र: देश में पोत पुनर्चक्रण से प्राप्त लौह-आधारित अपशिष्ट का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता इस्पात उद्योग है।
- इससे आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम होती है और आपूर्ति की सुरक्षा बढ़ती है।
- इस्पात की पुनर्प्राप्ति और उसके पुनः उपयोग के माध्यम से भारत सर्कुलर अर्थव्यवस्था तथा संसाधनों के कुशल उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
- पुनर्चक्रित इस्पात से इस्पात का उत्पादन करने में प्राथमिक या नए स्रोतों से इस्पात उत्पादन की तुलना में काफी कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- आर्थिक एवं औद्योगिक महत्व: पोत पुनर्चक्रण बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है।
- सहायक उद्योगों और संबंधित गतिविधियों के विस्तार से रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा होते हैं। इनमें परिवहन, पुनर्बेलन मिलें , उपकरण आपूर्तिकर्ता और अपशिष्ट प्रबंधन सेवाएँ शामिल हैं।
क्या आप जानते हैं?
- गुजरात के अलंग में पूर्व INS विराट का पुनर्चक्रण भारत के पोत पुनर्चक्रण क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण परियोजना थी।
- इस विमानवाहक पोत को भारतीय नौसेना में 30 वर्ष तथा रॉयल नेवी में 27 वर्ष की सेवा के बाद मार्च 2017 में सेवामुक्त किया गया और यह सितंबर 2020 में अलंग पहुँचा।
- विराट को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा विश्व के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले युद्धपोतों में से एक के रूप में मान्यता दी गई है। इसने 22,622 से अधिक उड़ान घंटे, 2,252 दिन समुद्र में तथा 5.88 लाख से अधिक समुद्री मील की दूरी तय की थी।
- इसके पुनर्चक्रण ने बड़े और जटिल पोतों को सुरक्षित रूप से विघटित करने, मूल्यवान सामग्रियों की पुनर्प्राप्ति तथा पर्यावरण संरक्षण, व्यावसायिक सुरक्षा, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- गुजरात का अलंग-सोसिया पोत पुनर्चक्रण क्लस्टर भारत की पोत पुनर्चक्रण क्षमता की आधारशिला है।
- इसे विश्व के सबसे बड़े पोत पुनर्चक्रण केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह क्लस्टर भारत की पोत पुनर्चक्रण गतिविधियों का लगभग 98% हिस्सा संचालित करता है।
- भारत का लक्ष्य अपनी पोत पुनर्चक्रण क्षमता को लगभग दोगुना करके लगभग 9 मिलियन लाइट डिस्प्लेसमेंट टन (LDT) करना है।
- पोत पुनर्चक्रण अधिनियम, 2019: यह अधिनियम भारत में पोत पुनर्चक्रण के विनियमन के लिए प्राथमिक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- यह अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारत में लागू करने का प्रावधान करता है। साथ ही, महानिदेशक नौवहन को राष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में नामित करता है।
- अधिनियम के अंतर्गत प्राधिकरण, प्रमाणन, निरीक्षण और प्रवर्तन संबंधी तंत्र अनिवार्य किए गए हैं।
- पोत पुनर्चक्रण नियम, 2021: ये नियम अधिनियम को क्रियान्वित करते हुए प्रक्रियात्मक और तकनीकी आवश्यकताओं को निर्धारित करते हैं।
- इनमें पुनर्चक्रण सुविधाओं का प्राधिकरण, पोत पुनर्चक्रण योजनाएँ, खतरनाक पदार्थों का प्रबंधन, श्रमिक सुरक्षा, प्रशिक्षण तथा रिपोर्टिंग संबंधी दायित्व शामिल हैं।
- पोत पुनर्चक्रण विनियम, 2026: ये विनियम विस्तृत परिचालन, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों के माध्यम से कार्यान्वयन को सुदृढ़ करते हैं।
- इनका उद्देश्य पोत पुनर्चक्रण सुविधाओं में एकरूप अनुपालन और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना है।
- जहाजों के सुरक्षित एवं पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल पुनर्चक्रण पर हांगकांग अंतरराष्ट्रीय अभिसमय: यह पोत पुनर्चक्रण को नियंत्रित करने वाला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साधन है।
- यह पोतों और पुनर्चक्रण सुविधाओं के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी आवश्यकताएँ निर्धारित करता है।
- खतरनाक सामग्रियों की सूची ( IHM): यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित पोत पुनर्चक्रण का एक महत्वपूर्ण घटक है।
- इसके अंतर्गत पोतों के परिचालन जीवन के दौरान तथा पुनर्चक्रण से पूर्व उन पर विद्यमान खतरनाक सामग्रियों की पहचान एवं सूची तैयार की जाती है।
- भारत में जीवन-चक्र आधारित अनुपालन प्रणाली लागू है। इससे लाइसेंस प्राप्त पुनर्चक्रण सुविधाओं में पोत के पुनर्चक्रण से पहले पारदर्शिता, अनुरेखणीयता और उचित जोखिम न्यूनीकरण सुनिश्चित होगा।
- पोत विघटन के लिए क्रेडिट नोट जारी करने की योजना: भारत में अनुपालन करने वाले पोत पुनर्चक्रण यार्डों में पोतों के पुनर्चक्रण के लिए पोत मालिकों को प्रोत्साहित करने हेतु शिप बिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFA) 2.0 के अंतर्गत पोत विघटन के लिए क्रेडिट नोट जारी करने की योजना तैयार की जा रही है।
स्रोत :PIB
Next article
संक्षिप्त समाचार 12-08-2026