भारत की सांस्कृतिक कूटनीति: वैश्विक सहभागिता के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा की दिशा में

पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • भारत 98 देशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को सुदृढ़ कर रहा है।

सांस्कृतिक कूटनीति क्या है?

  • सांस्कृतिक कूटनीति से आशय राष्ट्रों और लोगों के बीच विचारों, सूचनाओं, कला, भाषा तथा संस्कृति के अन्य पहलुओं के आदान-प्रदान से है, जिसका उद्देश्य आपसी समझ को बढ़ावा देना है।
    • यह एक ऐसी सॉफ्ट पावर के रूप में कार्य करती है, जो सौम्य होते हुए भी एकता और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने में अत्यंत प्रभावशाली होती है।
  • स्वतंत्रता के बाद, कई देशों ने अपनी विदेश नीति में संस्कृति को केंद्रीय स्थान दिया अथवा अंतर-राज्यीय सांस्कृतिक सहयोग को अपनी विकास नीतियों का आधार बनाया।
  • सॉफ्ट पावर का उदाहरण: यूरोपीय संघ (EU) का गठन यूरोप में सदियों से चले आ रहे विवादों और संघर्षों के समाधान में सॉफ्ट पावर की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
    • द्वितीय विश्व युद्ध के तत्काल बाद, फ्रांस और जर्मनी के स्कूली बच्चों को एक-दूसरे की संस्कृति, भाषा और रीति-रिवाजों को समझने के लिए आदान-प्रदान कार्यक्रमों में भेजा गया।

भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के स्तंभ

  • समन (शांति): शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता उसकी अहिंसा की दीर्घ परंपरा और राजनयिक पहलों में परिलक्षित होती है।
    • भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है और विश्वभर में 40 से अधिक अभियानों के लिए कार्मिकों का योगदान दिया है।
    • भारत की शांति-उन्मुख विदेश नीति तथा गुटनिरपेक्ष स्थिति ने एक शांतिपूर्ण और स्थिर शक्ति के रूप में उसकी छवि को सुदृढ़ किया है।
    • वैश्विक दक्षिण-दक्षिण सहयोग की भारत के समर्थन ने विकासशील देशों के बीच सम्मान अर्जित किया है, जो भारत को आर्थिक विकास के एक मॉडल के रूप में देखते हैं।
  • समृद्धि : ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी पहलों के माध्यम से भारत की आर्थिक प्रगति ने उसे उभरती हुई वैश्विक आर्थिक शक्ति तथा एक उभरते वैश्विक बाजार के रूप में स्थापित किया है।
    • विशेष रूप से अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य-पूर्व के साथ भारत के बढ़ते व्यापारिक संबंध उसकी आर्थिक प्रभावशीलता को प्रदर्शित करते हैं।
  • सुरक्षा : क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए भारत की रणनीति अमेरिका, रूस और जापान जैसी प्रमुख शक्तियों के साथ उसके संबंधों पर आधारित है।
    • भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा में स्वयं को एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित किया है। इसने अपनी ऐतिहासिक गुटनिरपेक्ष नीति को क्वाड जैसे सुरक्षा मंचों में सक्रिय भागीदारी के साथ संतुलित किया है।
    • आतंकवाद-रोधी प्रयासों और मानवीय पहलों पर भारत का बल क्षेत्रीय सुरक्षा में उसके योगदान को दर्शाता है।
  • संस्कृति : बॉलीवुड, शास्त्रीय कलाएँ, योग और भारतीय व्यंजन विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति के सबसे प्रमुख प्रतिनिधियों में शामिल हैं।
    • विश्वभर में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि भारत ने वैश्विक दर्शकों तक पहुँच बनाने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रभावी विस्तार किया है।
    • भारतीय प्रवासी समुदाय भी भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा परस्पर जुड़ी हुई वैश्वीकृत विश्व में भारत की सांस्कृतिक प्रभावशीलता को बढ़ाता है।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • वैश्विक सहभागिता योजना (GES): संस्कृति मंत्रालय GES के माध्यम से अन्य देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देता है।
    • GES के चार प्रमुख घटक हैं: अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम (ICEP), प्रोजेक्ट मौसम, बृहत्तर भारत तथा भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत और विविध सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की योजना।
  • भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR): ICCR विदेश मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन है, जो विदेशों में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने तथा विदेशों में स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अपने नेटवर्क के माध्यम से जन-से-जन संबंधों को सुदृढ़ करने का कार्य करता है।
  • बहुपक्षीय सांस्कृतिक सहभागिता: भारत की सांस्कृतिक कूटनीति ब्रिक्स (BRICS), जी20 (G20), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे मंचों में उसकी भागीदारी के माध्यम से भी आगे बढ़ाई जाती है।

चुनौतियाँ

  • अन्य देशों की सॉफ्ट पावर से प्रतिस्पर्धा: चीन, दक्षिण कोरिया, जापान और अन्य देश विदेशों में अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर पर्याप्त संसाधन व्यय करते हैं।
  • सीमित संस्थागत एवं वित्तीय संसाधन: भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद जैसे संगठनों के बजटीय और मानव संसाधन, प्रमुख वैश्विक शक्तियों के समान संस्थानों की तुलना में सीमित हैं।
  • सांस्कृतिक संपदाओं का अपर्याप्त उपयोग: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भाषाएँ, साहित्य, संग्रहालय और ऐतिहासिक स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमेशा प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं।
  • डिजिटल एवं भाषाई बाधाएँ: प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में सीमित अनुवाद और डिजिटल प्रसार के कारण भारतीय सांस्कृतिक सामग्री की वैश्विक पहुँच अपेक्षाकृत कम है।
  • संस्कृति का व्यावसायीकरण: अत्यधिक व्यावसायीकरण पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं के वस्तुकरण अथवा उनके मूल स्वरूप के क्षरण का कारण बनता है तथा उनकी प्रामाणिकता को कम करता है।

आगे की राह

  • संस्थागत क्षमता का सुदृढ़ीकरण : भारत की सांस्कृतिक पहुँच का विस्तार करने के लिए ICCR और भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों के वित्तपोषण, मानव संसाधन तथा वैश्विक उपस्थिति को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • डिजिटल कूटनीति: भारतीय संस्कृति को वैश्विक दर्शकों के लिए अधिक सुलभ बनाने हेतु OTT प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, आभासी संग्रहालय, डिजिटल अभिलेखागार और बहुभाषी सामग्री का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।
  • प्रवासी भारतीयों के साथ साझेदारी का सुदृढ़ीकरण: भारतीय प्रवासी समुदाय को सांस्कृतिक राजदूतों के रूप में सक्रिय करते हुए विदेशों में भारतीय परंपराओं, भाषाओं, त्योहारों और मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सांस्कृतिक कूटनीति, आर्थिक प्रगति और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से भारत की सॉफ्ट पावर क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • जैसे-जैसे भारत अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति की जटिलताओं के बीच अपनी राह आगे बढ़ा रहा है, उसकी सॉफ्ट पावर संबंधों को सुदृढ़ करने, पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देने और वैश्विक स्तर पर अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होगी।

स्रोत: PIB, DD NEWS

 

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