पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- एक नए अध्ययन के अनुसार, 1992 से 2023 के बीच लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र के 12 हिमनदों की गति औसतन 2.4 मीटर/वर्ष प्रति दशक की दर से धीमी हुई, साथ ही हिमनदों के क्षीण होने की प्रक्रिया में भी वृद्धि हुई।
हिमनद क्या हैं?
- हिमनद भूमि पर निर्मित बर्फ के बड़े और मोटे पिंड होते हैं, जो सदियों तक बर्फ के संचय के कारण बनते हैं।
- पृथ्वी के कुल स्वच्छ जल का लगभग 70 प्रतिशत हिमनदों में संचित है। वर्तमान में हिमनद पृथ्वी के लगभग 10 प्रतिशत भू-भाग को आच्छादित करते हैं।
- हिमनदों में होने वाली अपरदन, परिवहन और निक्षेपण जैसी प्रक्रियाएँ विशिष्ट अपरदनी एवं निक्षेपणीय हिमानी स्थलाकृतियों का निर्माण करती हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- हिमनदों की गति में कमी: अध्ययन में पाया गया कि विगत तीन दशकों के दौरान हिमनदों की सतही गति में कमी आई है।
- हिमनदों के पतले होने की गति में वृद्धि: हिमनदों की सतह के पतले होने की दर 2000–05 में 0.22 मीटर/वर्ष से बढ़कर 2015–20 में 0.57 मीटर/वर्ष हो गई।
- कारण: अधिक तापमान के कारण बर्फ का क्षरण और पतलापन बढ़ता है। जब हिमनद पतले होते हैं, तो उन पर लगने वाला प्रेरक तनाव कम हो जाता है, जिससे ढलान की दिशा में बर्फ को नीचे की ओर ले जाने वाला बल भी कम हो जाता है।
- बर्फ के परिवहन में कमी: धीमी गति से बहने वाले हिमनद अधिक ऊँचाई वाले बर्फ-संचय क्षेत्रों से कम मात्रा में बर्फ को निचले क्षेत्रों तक पहुँचाते हैं, जहाँ बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया होती है।
- क्षेत्रीय विविधता: सभी हिमनदों ने तापमान वृद्धि के प्रति एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी। हिमनद के प्रवाह की गति को प्रभावित करने वाले कारकों में हिमनद की ज्यामिति, मलबे का आवरण तथा हिमनद के अंतिम छोर या हिमनद-शीर्ष की स्थितियाँ शामिल हैं।
जांस्कर के हिमनदों का महत्व
- जांस्कर क्षेत्र में हिमालय के कुछ सबसे बड़े और व्यापक हिमनद पाए जाते हैं। माचोई हिमनद और पारकाचिक हिमनद इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- ये हिमनद स्वच्छ जल के प्राकृतिक भंडार के रूप में कार्य करते हैं और उष्ण महीनों के दौरान पिघले हुए जल के रूप में जल उपलब्ध कराते हैं।
- यह मौसमी जलापूर्ति अपेक्षाकृत शुष्क लद्दाख क्षेत्र की नदियों, पारिस्थितिकी तंत्रों, कृषि भूमि और स्थानीय जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

सिंधु नदी बेसिन पर प्रभाव
- वर्षा सीमित होने वाले शुष्क ग्रीष्मकालीन महीनों में हिमनद सिंधु नदी के प्रवाह में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
- प्रारंभिक चरण में हिमनदों के तीव्रता से पिघलने से नदी के जलप्रवाह में वृद्धि हो सकती है। इस घटना को ‘पीक वाटर’ कहा जाता है। हालांकि, जब हिमनद अपने संचित बर्फ के एक बड़े हिस्से को खो देते हैं:
- पिघले हुए जल का योगदान कम होने की संभावना है।
- दीर्घकालिक जल उपलब्धता अधिक अनिश्चित हो सकती है।
- कृषि, जलविद्युत, पारिस्थितिकी तंत्र और निचले क्षेत्रों की जल सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।
हिमनदों के संरक्षण के लिए वैश्विक पहल
- पेरिस समझौता, 2015: इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तरों की तुलना में 2°C से काफी नीचे, तथा संभव हो तो 1.5°C तक सीमित रखना है।
- हाई माउंटेन समिट (WMO): यह पर्वतों और हिमनदों को जलवायु परिवर्तन के महत्वपूर्ण संकेतकों के रूप में मान्यता देता है तथा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और बेहतर आँकड़ा-साझाकरण को बढ़ावा देता है।
- इंटरनेशनल क्रायोस्फीयर क्लाइमेट इनिशिएटिव (ICCI): वर्ष 2009 में COP-15 के परिणामस्वरूप स्थापित यह वरिष्ठ नीति विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का एक नेटवर्क है, जो सरकारों एवं विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर कार्य करता है।
- यह पृथ्वी के क्रायोस्फीयर (हिममंडल) के संरक्षण के उद्देश्य से विभिन्न पहलों का निर्माण एवं क्रियान्वयन करता है।
- हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के सतत संरक्षण हेतु राष्ट्रीय मिशन (NMSHE): यह भारत सरकार की एक पहल है, जिसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से संबंधित चुनौतियों का समाधान करना है।
- यह सतत रणनीतियों के विकास तथा हिमनदों के पिघलने, प्राकृतिक आपदाओं और जैव-विविधता के ह्रास जैसी समस्याओं के समाधान पर केंद्रित है।
- आर्कटिक परिषद: यह आर्कटिक देशों के बीच पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के शमन के लिए सहयोग का एक प्रमुख मंच है।
- वैश्विक हिम निगरानी पहल: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ग्लोबल क्रायोस्फीयर वॉच (GCW) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का CryoSat मिशन जैसी पहलें उपग्रह-आधारित दूरसंवेदी तकनीक के माध्यम से हिमनदों एवं हिमचादरों में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करती हैं।
आगे की राह
- उपग्रह-आधारित दूरसंवेदी तकनीक, ड्रोन और भू-आधारित अवलोकनों का उपयोग करते हुए एक समन्वित हिमालयी हिमनद निगरानी नेटवर्क स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि हिमनदों के द्रव्यमान संतुलन, मोटाई, प्रवाह की गति और पिघले हुए जल के बहाव की निगरानी की जा सके।
- अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्वचालित मौसम केंद्रों का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि तापमान, हिमपात, वर्षा और विकिरण से संबंधित विश्वसनीय आँकड़े प्राप्त किए जा सकें। ये आँकड़े हिमनदों के सटीक मॉडलिंग के लिए आवश्यक हैं।
- आर्द्रभूमियों, झरनों और उच्च-ऊँचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि ये प्राकृतिक जल-संतुलनकारी तंत्र के रूप में कार्य कर सकते हैं। साथ ही, संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में अस्थिर एवं अनियंत्रित विकास को रोका जाना चाहिए।
स्रोत: TH