पाठ्यक्रम: जीएस-1/ भारतीय विरासत एवं संस्कृति, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर भारत सरकार ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति में भारतीय हथकरघा क्षेत्र के योगदान को मान्यता दी, जो सांस्कृतिक विरासत को सतत आर्थिक विकास के साथ जोड़ता है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का परिचय
- राष्ट्रीय हथकरघा दिवस प्रतिवर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। यह 1905 में स्वदेशी आंदोलन के शुभारंभ की स्मृति में मनाया जाता है, जिसने स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा दिया और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित किया।
- भारत सरकार ने 2015 में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया।
- यह अवसर भारत की बुनाई परंपराओं का उत्सव मनाता है तथा हथकरघा श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक योगदान को मान्यता प्रदान करता है।
- यह 35.22 लाख बुनकरों एवं संबद्ध श्रमिकों को सम्मानित करता है, जिनमें 72% से अधिक महिलाएँ हैं।
भारत का हथकरघा उद्योग
- भारतीय हथकरघा उद्योग विश्व के सबसे प्राचीन एवं सबसे जीवंत कुटीर उद्योगों में से एक है।
हथकरघा जनगणना:
- भारत अब तक चार हथकरघा जनगणनाएँ कर चुका है: 1987-88, 1995-96, 2009-10 और 2019-20।
- इनका आयोजन औसतन 8–12 वर्ष के अंतराल पर किया जाता है।
- चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019–20) के अनुसार, लगभग 35.22 लाख परिवार इस कार्य से जुड़े हैं तथा आर्थिक रूप से सक्रिय हथकरघा बुनकरों में लगभग 72% महिलाएँ हैं।
- शीर्ष निर्यात गंतव्य: वित्त वर्ष 2024-25 में संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य रहा, इसके बाद क्रमशः संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम का स्थान रहा।
- उत्पाद: वर्ष 2024-25 में निर्मित गृह-सज्जा उत्पाद जैसे कुशन कवर, पर्दे, टेबल लिनेन तथा अन्य घरेलू वस्तुओं का योगदान 42.4% रहा। इसके बाद फर्श आवरण जैसे कालीन, गलीचे और चटाइयों का योगदान 40.6% रहा।
- परिधान सहायक सामग्री का योगदान 12.7%, जबकि कपड़ों (फैब्रिक्स) का योगदान 4.3% रहा।

उद्योग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- बुनकरों की घटती संख्या: कम आय, सामाजिक सुरक्षा का अभाव तथा आधुनिक कौशल प्रशिक्षण की कमी के कारण युवा पीढ़ी इस व्यवसाय से दूर हो रही है।
- पारंपरिक बुनकरों की आयु बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप कार्यबल लगातार घट रहा है।
- आर्थिक संकट: कच्चे माल (कपास, रेशम और रंगों) की कीमतें अधिक हैं, जबकि बिचौलियों द्वारा शोषण के कारण उत्पादों के विक्रय मूल्य कम मिलते हैं।
- पावरलूम एवं मिलों से प्रतिस्पर्धा: मशीनों से बड़े पैमाने पर कपड़ों का उत्पादन होता है, जो सस्ते, शीघ्र तैयार होने वाले तथा बाजार पर नियंत्रण रखने वाले होते हैं।
- बेहतर गुणवत्ता और विशिष्टता होने के बावजूद हथकरघा उत्पाद प्रतिस्पर्धी मूल्य पर उपलब्ध नहीं हो पाते।
- कमज़ोर विपणन एवं ब्रांडिंग: ब्रांडिंग, आधुनिक खुदरा व्यवस्था तथा ई-कॉमर्स को पर्याप्त रूप से अपनाने की कमी के कारण घरेलू एवं वैश्विक बाजारों में सीमित पहुँच है।
- प्रौद्योगिकी एवं कौशल संबंधी अंतराल: पारंपरिक करघे कम उत्पादक हैं तथा उनमें अधिक श्रम की आवश्यकता होती है।
- वैश्वीकरण एवं आयात से प्रतिस्पर्धा: सस्ते आयात (विशेषकर चीन और बांग्लादेश से) भारतीय बाजारों में बड़ी मात्रा में आ रहे हैं।
- उच्च उत्पादन लागत तथा निर्यात संवर्धन के लिए आक्रामक प्रयासों की कमी के कारण भारतीय हथकरघा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष कर रहा है।
हथकरघा बुनकरों के लिए सहयोगात्मक पारिस्थितिकी तंत्र
- राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP): NHDP को 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए लागू करने हेतु तैयार किया गया।
- यह हथकरघा क्षेत्र के समेकित विकास के लिए आवश्यकता-आधारित दृष्टिकोण अपनाता है, जिसका मुख्य केंद्र हथकरघा बुनकरों का कल्याण है।

- कच्चा माल आपूर्ति योजना (Raw Material Supply Scheme – RMSS): यह योजना सभी प्रकार के धागों (यार्न) के परिवहन (फ्रेट) शुल्क की प्रतिपूर्ति करके बुनकरों को धागे की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायता करती है।
- यह निर्धारित मात्रा सीमा के अधीन निर्दिष्ट धागों पर 15% मूल्य सब्सिडी भी प्रदान करती है।
- हथकरघा एवं पारंपरिक शिल्प के लिए GST राहत: वर्ष 2025 में आयोजित 56वीं GST परिषद की बैठक में अनुशंसित अगली पीढ़ी के GST सुधारों में हथकरघा क्षेत्र के समर्थन हेतु कई उपाय शामिल किए गए।
- GST युक्तिकरण के अंतर्गत 36 हस्तशिल्प वस्तुओं पर कर की दर 12% से घटाकर 5% कर दी गई।
- सूती हथकरघा गलीचों एवं हाथ से बुने कालीनों को भी 5% GST की श्रेणी में शामिल किया गया।
- घरेलू एवं औद्योगिक सिलाई मशीनों पर GST दर भी 12% से घटाकर 5% कर दी गई, जिससे सिलाई इकाइयों की लागत कम हुई तथा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिला।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में वस्त्र क्षेत्र पर विशेष बल देते हुए कई नए उपायों की घोषणा की गई:
- राष्ट्रीय फाइबर योजना (National Fibre Scheme) का उद्देश्य वस्त्र उद्योग के कच्चे माल के आधार को सुदृढ़ करना है।
- वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना (Textile Expansion and Employment Scheme) के अंतर्गत पारंपरिक वस्त्र क्लस्टरों का आधुनिकीकरण किया जाएगा।
- महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल (Mahatma Gandhi Gram Swaraj Initiative) के माध्यम से खादी, हथकरघा एवं हस्तशिल्प को सुदृढ़ किया जाएगा, जिससे बुनकरों, ग्रामोद्योगों, ग्रामीण युवाओं तथा एक जिला एक उत्पाद (ODOP) पहल को लाभ मिलेगा।

निष्कर्ष
- भारत का हथकरघा क्षेत्र विरासत, सतत विकास और आर्थिक अवसरों का एक अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।
- पारंपरिक शिल्पकला को आधुनिक प्रौद्योगिकी, डिज़ाइन नवाचार तथा वैश्विक बाजारों तक पहुँच के साथ एकीकृत करके हथकरघा विकसित भारत 2047 का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। इससे भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण होगा तथा महिलाओं के नेतृत्व वाली समावेशी ग्रामीण आजीविकाओं का सृजन होगा।
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संक्षिप्त समाचार 06-08-2026