पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीयसंबंध; GS4/एथिक्स
संदर्भ
- पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रम, इज़राइल–हमास संघर्ष तथा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े विवादों ने पुनः इस प्रश्न को केंद्र में ला दिया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल राष्ट्रीय हितों द्वारा संचालित होते हैं, अथवा इनमें एथिक्स, भावनाएँ और नैतिक वैधता की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंध: राष्ट्रीय हित से परे
- परंपरागत रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंध का अध्ययन एक ऐसे विषय के रूप में किया गया है, जिसका मुख्य सरोकार शक्ति, सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित से संबंधित प्रश्नों से होता है।
- कूटनीति की भाषा में प्रतिरोध, शक्ति संतुलन , रणनीतिक स्वायत्तता तथा सुरक्षा जैसे शब्द प्रमुख स्थान रखते हैं।
- किन्तु वर्तमान वैश्विक संकट यह सिद्ध करते हैं कि विदेश नीति केवल रणनीतिक हितों से ही संचालित नहीं होती, बल्कि उस पर एथिक्स, भावनाएँ, पहचान तथा जनमत का भी गंभीर प्रभाव पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास
- पाश्चात्य बौद्धिक प्रभाव : आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास मुख्यतः पाश्चात्य अनुसंधान के प्रभाव में हुआ, विशेषकर द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात।
- प्रसिद्ध विद्वान स्टैनली हॉफमैन ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को “एक अमेरिकी सामाजिक विज्ञान” की संज्ञा दी है।
- आधुनिक सिद्धांतों, संस्थाओं तथा कूटनीतिक परंपराओं का निर्माण यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभुत्व तथा उसके पश्चात अमेरिकी बौद्धिक नेतृत्व के प्रभाव में हुआ।
- हैंस जे. मॉर्गेन्थाउ , जिन्हें शास्त्रीय यथार्थवाद का जनक माना जाता है, ने प्रतिपादित किया कि विदेश नीति का आधार राष्ट्रीय हित तथा शक्ति होते हैं।
| प्रमुख अवधारणाएँ एवं अर्थ |
| यथार्थवाद: शक्ति एवं राष्ट्रीय हित राज्यों के व्यवहार को संचालित करते हैं। |
| अराजकता : ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जिसमें कोई सर्वोच्च वैश्विक संप्रभु प्राधिकरण विद्यमान नहीं होता। |
| राष्ट्रीय हित : विदेश नीति का मार्गदर्शन करने वाला प्रमुख उद्देश्य। |
| नैतिक वैधता : नैतिक मानकों के आधार पर किसी कार्य या निर्णय की स्वीकार्यता। |
| रणनीतिक स्वायत्तता : किसी शक्ति-गुट के साथ औपचारिक रूप से संबद्ध हुए बिना स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की क्षमता। |
| सॉफ्ट पावर : संस्कृति, मूल्यों तथा कूटनीति के माध्यम से दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता।. |
एथिक्स एवं भावनाओं का बढ़ता महत्त्व
- एथिक्स से तात्पर्य उन नैतिक सिद्धांतों एवं मूल्यों से है, जो विश्व राजनीति में राज्यों, नेताओं तथा संस्थाओं के आचरण का मार्गदर्शन करते हैं।
- भावनाएँ से आशय सहानुभूति, भय, गौरव, क्रोध तथा करुणा जैसी अनुभूतियों से है, जो नेताओं एवं समाजों की धारणाओं तथा निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
- हाल के विद्वानों का मत है कि तर्क और भावना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए।
- नेटा क्रॉफर्ड के अनुसार, भय, शोक, क्रोध, लज्जा, सहानुभूति तथा गौरव जैसी भावनाएँ राजनीतिक निर्णय-निर्माण को अत्यधिक प्रभावित करती हैं।
- ये भावनाएँ खतरे की धारणा, राष्ट्रीय पहचान, नीतिगत विकल्पों तथा संघर्षों के प्रति जनसमर्थन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- ब्रेंट सैस्ले का तर्क है कि नेता सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश के भीतर निर्णय लेते हैं, जहाँ पहचान तथा सामूहिक भावनाएँ राज्य के व्यवहार को आकार देती हैं।
एथिक्स एवं भावनाएँ क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
- विदेश नीति को आकार देना: इतिहास के प्रत्येक काल में एथिक्स विश्व राजनीति का अभिन्न अंग रही है।
- मूल्य एवं भावनाएँ यह निर्धारित करती हैं कि राज्य किन देशों के साथ मैत्री स्थापित करेंगे, संघर्षों का समाधान कैसे करेंगे तथा सहयोग को किस प्रकार विकसित करेंगे।
- शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक प्रस्तुत किया।
- वहीं, सोवियत संघ को अधिनायकवाद के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित किया गया।
- जनमत को प्रभावित करना: जनता की भावनाएँ (जैसे- क्रोध, सहानुभूति एवं गौरव) सरकारों की नीतियों तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को प्रभावित कर सकती हैं।
- शांति एवं न्याय को प्रोत्साहित करना: एथिक्स मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के सम्मान को प्रोत्साहित करती है।
- विश्वास एवं एकजुटता का निर्माण: सहानुभूति तथा नैतिक उत्तरदायित्व साझा वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु वैश्विक साझेदारियों को सुदृढ़ करते हैं।
विश्व राजनीति को एथिक्स एवं भावनाएँ किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
- निर्णय-निर्माण: नेताओं की नैतिक मान्यताएँ एवं भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ संकट, युद्ध तथा वार्ताओं में उनके निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
- संघर्ष एवं सहयोग: भय एवं घृणा जैसी भावनाएँ संघर्षों को बढ़ावा दे सकती हैं, जबकि सहानुभूति एवं क्षमा मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करती हैं।
- वैश्विक मानदंड: नैतिक विचार अंतरराष्ट्रीय कानूनों, संधियों एवं संस्थाओं (जैसे- मानवाधिकार, जलवायु न्याय तथा संरक्षण की उत्तरदायित्व संबंधी अवधारणा) को आकार देते हैं।
- सौम्य शक्ति: नैतिक मूल्य एवं भावनात्मक आकर्षण किसी देश की छवि तथा प्रभाव को सुदृढ़ करते हैं (जैसे- अहिंसा, मानवीय सहायता एवं सांस्कृतिक कूटनीति)।
वैश्वीकरण पर नैतिक दृष्टिकोण
- वैश्वीकरण ने आर्थिक परस्पर निर्भरता, साझा समृद्धि तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वादा किया।
- इससे व्यापार का विस्तार, प्रौद्योगिकीय प्रगति तथा अनेक क्षेत्रों में गरीबी में कमी आई।
- किंतु वैश्विक उत्तर एवं वैश्विक दक्षिण के मध्य बनी हुई असमानताएँ, लाभों का असमान वितरण तथा समावेशी विकास के नैतिक वादों की अपूर्णता आज भी चुनौती बनी हुई है।
डिजिटल युग में एथिक्स का महत्त्व
- आधुनिक संघर्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक मीडिया, डिजिटल पत्रकारिता, नागरिक प्रतिवेदन, अंतरराष्ट्रीय जन-अभियानों तथा त्वरित संचार के कारण अभूतपूर्व वैश्विक निगरानी के अंतर्गत घटित होते हैं।
- इसके परिणामस्वरूप:
- नागरिकों की पीड़ा प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है।
- कूटनीति पर जनमत का प्रभाव बढ़ जाता है।
- सरकारों की जवाबदेही अधिक हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समकालीन चुनौतियाँ
- राष्ट्रीय हित बनाम एथिक्स: राज्यों को रणनीतिक उद्देश्यों, मानवीय सिद्धांतों तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता एवं वैश्विक अपेक्षाएँ: भारत जैसे देशों को विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने के साथ-साथ वैश्विक संकटों तथा महाशक्तियों के दबाव का भी सामना करना पड़ता है।
- मानवीय संकट एवं जनमत: वैश्विक जनमत वास्तविक समय के मीडिया कवरेज के आधार पर संघर्षों (जैसे- गाज़ा एवं यूक्रेन) का मूल्यांकन कर रहा है।
- बढ़ती शक्ति प्रतिद्वंद्विता: महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा (जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका–चीन तथा रूस–पश्चिमी देश) वैश्विक सहयोग को कठिन बना रही है।
- प्रौद्योगिकी एवं सूचना युद्ध: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर आक्रमण, दुष्प्रचार तथा डिजिटल निगरानी कूटनीति एवं सुरक्षा की प्रकृति को परिवर्तित कर रहे हैं।
- वैश्विक शासन में सुधार: संयुक्त राष्ट्र तथा विश्व व्यापार संगठन पर वैश्विक दक्षिण का बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने तथा समकालीन चुनौतियों का समाधान करने हेतु पुनर्गठन का दबाव बढ़ रहा है।
- जलवायु परिवर्तन एवं गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ: जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद तथा ऊर्जा अस्थिरता जैसी चुनौतियों के समाधान हेतु पारंपरिक सैन्य उपायों से आगे बढ़कर सामूहिक अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई आवश्यक है।
भारत का दृष्टिकोण
- भारतीय विदेश नीति: भारत ने सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (महा उपनिषद् से उद्धृत), रणनीतिक स्वायत्तता, लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलवाद तथा उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत पर बल दिया है।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन: यह शीत युद्ध के दौरान केवल एक भू-राजनीतिक विकल्प नहीं था, बल्कि संप्रभु समानता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, गुटनिरपेक्षता तथा न्यायसंगत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आकांक्षा का प्रतीक था।
- भारत की नैतिक प्रतिष्ठा: विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों, सांस्कृतिक विविधता, विधि के शासन, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा उत्तरदायी वैश्विक सहभागिता के कारण भारत की वैश्विक छवि सुदृढ़ हुई है।
संवैधानिक संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने का प्रावधान।
- राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व: अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करते हैं।
वास्तविक उदाहरण
- महात्मा गांधी का अहिंसा सिद्धांत: भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने सत्य एवं अहिंसा के नैतिक सिद्धांतों को अपनाया, जिसने विश्वभर में नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रेरित किया।
- नेल्सन मंडेला का सामंजस्य : क्षमा एवं सहानुभूति ने दक्षिण अफ्रीका को रंगभेद के पश्चात सामाजिक पुनर्निर्माण तथा लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण में सहायता प्रदान की।
- ‘फिर कभी नहीं’ – यहूदी नरसंहार की स्मृति: नैतिक उत्तरदायित्व एवं सामूहिक स्मृति ने मानवाधिकारों तथा नरसंहार की रोकथाम से संबंधित वैश्विक मानदंडों को आकार दिया।
- जलवायु न्याय आंदोलन: चिंता, आक्रोश एवं आशा जैसी भावनाओं ने युवाओं तथा देशों को जलवायु कार्रवाई एवं समानता की माँग के लिए संगठित किया।
आगे की राह
- यथार्थवाद एवं नैतिक कूटनीति के मध्य संतुलन स्थापित किया जाए।
- लोकतांत्रिक मूल्यों एवं समावेशी विकास के माध्यम से भारत की सौम्य शक्ति को सुदृढ़ किया जाए।
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता कायम रखी जाए।
- न्यायपूर्ण एवं नियम-आधारित वैश्विक शासन के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व में भारत की भूमिका को सशक्त बनाया जाए।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधिक एवं न्यायसंगत बनाने हेतु उनके सुधार का समर्थन किया जाए।