पाठ्यक्रम:GS3/पर्यावरण
समाचार में
- केंद्र सरकार ने गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु में फैले पश्चिमी घाट के 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) घोषित करने हेतु सातवीं प्रारूप अधिसूचना जारी की है।
पश्चिमी घाट
- पश्चिमी घाट भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिमी तट के समानांतर विस्तृत पर्वतमाला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु सहित छह राज्यों में फैली हुई है।
- यह भारत में स्थित विश्व के 36 जैव-विविधता हॉटस्पॉटों में से चार में से एक है।
- लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी यह पर्वतमाला हिमालय से भी अधिक प्राचीन है।
- संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने वर्ष 2018 में इसे विश्व के आठ प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉटों में सम्मिलित किया।
- भारत में स्थित अन्य तीन जैव-विविधता हॉटस्पॉट हैं—
- हिमालय
- भारत–म्यांमार क्षेत्र
- सुंडालैंड
पश्चिमी घाट का पारिस्थितिकीय महत्त्व
- पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि पर्वतमाला भी कहा जाता है, अत्यंत समृद्ध पारिस्थितिकीय एवं जैव-विविधता संपदा का धनी है और भारत तथा विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में से एक है।
- इसकी असाधारण जैव-विविधता, स्थानिक प्रजातियों की समृद्धि तथा महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकीय एवं जलवायु प्रक्रियाओं को बनाए रखने में इसकी भूमिका इसे वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाती है।
- यह प्रायद्वीपीय भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण जलवायु नियामक का कार्य करता है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून के मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर यह घने वनों एवं अनेक नदियों के अस्तित्व को बनाए रखता है, जिन पर करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर करती है।
- यहाँ विविध पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं, जिनमें—
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
- घासभूमियाँ
- मायरिस्टिका दलदली वन
- विशिष्ट शोला वन
- इन पारिस्थितिकी तंत्रों में अनेक वनस्पति एवं जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से अनेक स्थानिक हैं।
- यह सिंह-पूँछ मकाक, नीलगिरि तहर तथा बाघ जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है।
- कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, मांडोवी, पेरियार तथा शरावती जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम भी यहीं से होता है। इसी कारण इसे प्रायद्वीपीय भारत का जल भंडार कहा जाता है।
पश्चिमी घाट के समक्ष प्रमुख खतरे
- बड़े बाँधों, सड़कों एवं रेलमार्गों के विस्तार से प्राकृतिक आवास खंडित हो रहे हैं, नदी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं तथा जैव-विविधता को खतरा उत्पन्न हो रहा है।
- बढ़ते तापमान, वर्षा के परिवर्तित स्वरूप तथा आवास क्षेत्रों में बदलाव के कारण पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं और अनेक प्रजातियाँ अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होने को विवश हैं।
- पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि से अपशिष्ट, वन्यजीवों में व्यवधान तथा मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहे हैं।
- यूकेलिप्टस एवं बबूल जैसी बाह्य प्रजातियाँ स्थानीय वनस्पतियों का स्थान ले रही हैं, जिससे जैव-विविधता में कमी तथा वनों के पुनर्जनन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
- वृक्षारोपण, कृषि विस्तार, अवैध कटाई, अतिक्रमण एवं अपशिष्ट निपटान के कारण प्राकृतिक आवास निरंतर क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।
पश्चिमी घाट के लिए पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए)
- पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र संरक्षित क्षेत्रों के आसपास निर्धारित बफर क्षेत्र होते हैं, जिनका उद्देश्य खनन, जलविद्युत परियोजनाओं तथा अन्य मानवीय गतिविधियों के प्रतिकूल प्रभावों को न्यूनतम करना है।
- गुजरात, गोवा एवं महाराष्ट्र में प्रस्तावित क्षेत्रों के सीमांकन पर लगभग सहमति बन चुकी है।
- छठे प्रभावित राज्य तमिलनाडु को भी इस विषय पर कोई प्रमुख आपत्ति नहीं है।

- गतिविधियाँ
- प्रतिबंधित
- खनन
- प्रदूषणकारी उद्योग
- बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ
- खतरनाक पदार्थों का उपयोग
- अपशिष्टों का निपटान
- विनियमित
- वृक्षों की कटाई
- होटल निर्माण
- सड़कों का चौड़ीकरण
- भूजल का दोहन
- रात्रिकालीन यातायात
- बाह्य प्रजातियों का प्रवेश
- अनुमेय
- पारंपरिक कृषि एवं बागवानी
- वर्षा जल संचयन
- जैविक खेती
- नवीकरणीय ऊर्जा
- हरित प्रौद्योगिकियों का उपयोग
- प्रतिबंधित
विभिन्न समितियों की सिफारिशें
- पश्चिमी घाट में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के सीमांकन की प्रक्रिया वर्ष 2010 में माधव गाडगिल समिति के गठन से प्रारंभ हुई।
- भारत के प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल ने अगस्त 2011 में अपनी समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- समिति ने पश्चिमी घाट के संपूर्ण 1,29,037 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की अनुशंसा की तथा विभिन्न क्षेत्रों की संवेदनशीलता के आधार पर अलग-अलग स्तर के प्रतिबंध सुझाए।
- प्रभावित राज्यों के विरोध के पश्चात केंद्र सरकार ने अगस्त 2012 में इस रिपोर्ट को पूर्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्च स्तरीय कार्यदल को भेजा।
- कस्तूरीरंगन समिति ने लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की अनुशंसा की।
- यह अनुशंसा प्राकृतिक परिदृश्य एवं सांस्कृतिक परिदृश्य के वर्गीकरण पर आधारित थी।
- प्राकृतिक परिदृश्य में लगभग 1,500 किलोमीटर तक फैली सतत प्राकृतिक वनस्पति पट्टी को सम्मिलित किया गया।
- सांस्कृतिक परिदृश्य में मानव बस्तियों, कृषि एवं बागानों से प्रभावित क्षेत्रों को शामिल किया गया।
- पश्चिमी घाट में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की प्रथम प्रारूप अधिसूचना मार्च 2014 में कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर जारी की गई।
राज्यों की आपत्तियाँ
- इस प्रस्ताव का विभिन्न राज्य सरकारों, स्थानीय समुदायों, बागान मालिकों तथा राजनीतिक संगठनों ने विरोध किया है। उनका मानना है कि इससे विकास, निर्माण कार्यों, आधारभूत संरचना परियोजनाओं तथा आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
- केरल ने 31 गाँवों (मुख्यतः इडुक्की एवं वायनाड) को बाहर रखते हुए पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र को 9,993.7 वर्ग किलोमीटर से घटाकर 8,805 वर्ग किलोमीटर करने का अनुरोध किया है, जिसे केंद्र की विशेषज्ञ समिति ने स्वीकार नहीं किया।
- कर्नाटक वर्तमान प्रस्ताव का निरंतर विरोध कर रहा है तथा कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन पर प्रश्न उठा रहा है। केंद्र सरकार ने राज्य से वैकल्पिक संरक्षण ढाँचा प्रस्तुत करने को कहा है।
- गोवा ने सत्तारी तालुका के 21 गाँवों को प्रस्तावित पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र से बाहर रखने की मांग की है।
निष्कर्ष
- पश्चिमी घाट में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र की अवधारणा का उद्देश्य जैव-विविधता संरक्षण एवं सतत विकास के मध्य संतुलन स्थापित करना है।
- इस योजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समावेशी शासन, सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है, जिससे आजीविका की सुरक्षा के साथ-साथ इस पारिस्थितिकीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
- भौगोलिक सूचना प्रणाली एवं दूरसंवेदी प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी को सुदृढ़ करना तथा अनुमेय गतिविधियों के संबंध में प्रभावी जन-संवाद स्थापित करना पारदर्शिता बढ़ाने, जन-आशंकाओं को कम करने तथा दीर्घकालिक जल सुरक्षा, पारिस्थितिकीय संतुलन एवं बाढ़, भूस्खलन तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति क्षेत्र की सहनशीलता को सुदृढ़ करने में सहायक होगा।
Source: IE
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