पाठ्यक्रम: GS2/शासन
समाचार में
- संविधान (एक सौ तीसवाँ संशोधन) विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी पाँच अनुशंसाओं में से दो पर मतदान की प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी मसौदा प्रतिवेदन को अपनाने का निर्णय स्थगित कर दिया है।
- संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 में यह प्रस्ताव किया गया है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा मंत्री किसी गंभीर आपराधिक अपराध के मामले में न्यायिक अभिरक्षा में रखे जाते हैं, तो उन्हें अपने पद से हटाया जाए।
संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 के बारे में
- उद्देश्य: इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर आपराधिक अपराधों के मामलों में दीर्घकालीन न्यायिक अभिरक्षा में रहने वाले व्यक्ति उच्च संवैधानिक पदों पर बने न रहें।
- प्रयोज्यता : यह विधेयक केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली पर लागू होगा।
- पुदुचेरी तथा जम्मू-कश्मीर के लिए समान प्रावधानों वाले पृथक विधेयक भी प्रस्तुत किए गए हैं।
- पदच्युति के आधार: निम्नलिखित परिस्थितियों में किसी मंत्री को पदच्युति किया जा सकेगा—
- यदि उस पर ऐसे अपराध का आरोप लगाया गया हो, जिसके लिए पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान हो; तथा
- यदि वह निरंतर तीस दिनों तक गिरफ्तार होकर न्यायिक अभिरक्षा में रहे।
- मंत्रियों को पदच्युति करने की प्रक्रिया: केंद्रीय मंत्री को राष्ट्रपति तथा राज्य मंत्री को राज्यपाल, क्रमशः प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री के परामर्श पर पदच्युति कर सकेंगे।
- यदि निर्धारित अवधि के अंदर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो मंत्री को न्यायिक अभिरक्षा के 31वें दिन से स्वतः पद रिक्त माना जाएगा।
- प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के संबंध में प्रावधान: प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को निरंतर 30 दिनों की न्यायिक अभिरक्षा पूर्ण होने पर अपने पद से त्यागपत्र देना होगा।
- यदि वे त्यागपत्र नहीं देते हैं, तो 31वें दिन से उनका पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- संवैधानिक प्रश्न: विधेयक में गंभीर अपराधों के मामलों में केवल 30 दिनों की न्यायिक अभिरक्षा के आधार पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों को स्वतः पद से हटाने का प्रावधान किया गया है। इससे दोषसिद्धि से पूर्व केवल आरोपों के आधार पर पदच्युत किए जाने तथा संविधान के मूल ढाँचे पर उसके संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
- शक्ति के दुरुपयोग की आशंका: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री निर्वाचित विधानमंडलों के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
- स्वतः पदच्युति की व्यवस्था से जाँच एजेंसियाँ अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सरकारों के भविष्य को प्रभावित करने की स्थिति में आ सकती हैं।
- इससे प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री के मंत्रियों के चयन एवं पदस्थापन संबंधी विवेकाधिकार में भी कमी आ सकती है।
- शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत: निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गिरफ्तारी कार्यपालिका के अधीन कार्यरत जाँच एजेंसियों को सरकारों के कार्यकाल को प्रभावित करने का अवसर प्रदान कर सकती है।
- इससे नागरिकों → विधानमंडलों → सरकारों तक उत्तरदायित्व की लोकतांत्रिक श्रृंखला कमजोर होने की आशंका है।
- संघवाद पर प्रभाव: यदि किसी एक स्तर की सरकार की जाँच एजेंसियाँ दूसरे स्तर की सरकार के निर्वाचित प्रतिनिधियों को गिरफ्तार करती हैं, तो इससे संघ एवं राज्यों के मध्य संवैधानिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
- विधि का शासन: गिरफ्तारी केवल संदेह अथवा जाँच की प्रक्रिया का हिस्सा होती है, दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं।
- गिरफ्तारी के चरण में न्यायालय केवल गिरफ्तारी की वैधता का परीक्षण करते हैं, अपराध सिद्ध होने का नहीं।
- न्यायिक निर्णय से पूर्व किसी मंत्री को पद से हटाना मनमाना माना जा सकता है तथा प्राकृतिक न्याय एवं निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
संयुक्त संसदीय समिति के मसौदा प्रतिवेदन की प्रमुख अनुशंसाएँ
- ‘पदच्युति’ के स्थान पर ‘निलंबन’ का प्रावधान: मंत्रियों को स्वतः पदच्युति के बजाय, न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण होने तक उन्हें निलंबित रखा जाए।
- स्वतः पुनर्स्थापना का प्रावधान: यदि संबंधित व्यक्ति दोषमुक्त हो जाता है अथवा निर्धारित अवधि के अंदर अभियोजन आगे नहीं बढ़ता है, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त कर उसे पुनः पद पर पुनर्स्थापित किया जाए।
- ‘गंभीर आपराधिक अपराध’ की स्पष्ट परिभाषा: गंभीर आपराधिक अपराधों में ऐसे अपराधों को सम्मिलित किया जाए, जिनके लिए पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान है।
आगे की राह
- संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य राजनीति में शुचिता तथा शासन में उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना है। किंतु केवल गिरफ्तारी एवं न्यायिक अभिरक्षा के आधार पर जनप्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से पद से हटाने का प्रावधान अनुच्छेद 21, दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माने जाने के सिद्धांत तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- अतः आवश्यकता इस बात की है कि ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए, जो एक ओर नैतिक एवं उत्तरदायी सार्वजनिक नेतृत्व को सुनिश्चित करे और दूसरी ओर विधिसम्मत प्रक्रिया तथा संवैधानिक अधिकारों की भी पूर्ण सुरक्षा करे।
- संवैधानिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त समाधान होंगे—
- शासन में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
- आपराधिक मामलों का त्वरित निस्तारण करना।
- संवैधानिक एवं जाँच संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को और अधिक सुदृढ़ बनाना।
स्रोत :TH
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संक्षिप्त समाचार 17-07-2026