भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण को प्रोत्साहन 

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ 

  • गृह मंत्रालय के अनुसार, 1 जनवरी, 2027 से नए आपराधिक कानूनों के अंतर्गत होने वाली सभी जाँचों एवं न्यायिक ट्रायल से संबंधित प्रक्रियाओं का डिजिटल रूप से अभिलेखन किया जाएगा।

परिचय 

  • अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थापना पुलिस (CCTNS), न्यायालय (e-Courts), कारागार (e-Prisons), विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं (e-Forensics) तथा अभियोजन (e-Prosecution) प्रणालियों को एकीकृत करके की गई है।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु नोडल एजेंसी है, जबकि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) प्रौद्योगिकी साझेदार के रूप में कार्य कर रहा है।
  • ICJS 2.0 परियोजना के अंतर्गत सभी अनुप्रयोगों का उन्नयन किया जा रहा है तथा राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को हार्डवेयर तथा नेटवर्क कनेक्टिविटी के उन्नयन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।

ICJS द्वारा संबोधित प्रमुख क्षेत्र

  • पुलिस, कारागार, विधि विज्ञान, अभियोजन तथा न्यायालयों के विभिन्न आँकड़ा-समूहों (Data Sets) के मध्य निर्बाध एकीकरण सुनिश्चित करना।
  • डेटा प्रविष्टि में होने वाली त्रुटियों को कम कर डेटा की गुणवत्ता में सुधार करना।
  • विभिन्न स्तंभों के मध्य सूचनाओं की सहज उपलब्धता के माध्यम से जाँच एवं न्यायिक विचारण की प्रभावशीलता तथा समयबद्धता बढ़ाना।
  • जाँच प्रक्रिया में डेटा विश्लेषण तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता/मशीन लर्निंग (AI/ML) आधारित उपकरणों के प्रभावी उपयोग को सक्षम बनाना।
  • निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में कागजी अभिलेखों पर निर्भरता कम करना।
  • “स्मार्ट पुलिसिंग “ की दिशा में परिवर्तन को प्रोत्साहित करना।

विकसित एवं उन्नत की जा रही प्रमुख डिजिटल प्रणालियाँ

  • अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली (CCTNS) परियोजना, 2009: इसका उद्देश्य सभी पुलिस थानों को एक समान अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर से जोड़ना है।
    • यह जाँच, डेटा विश्लेषण, अनुसंधान, नीति-निर्माण तथा नागरिक सेवाओं के प्रभावी प्रावधान में सहायक है।
  • ई-प्रिज़न्स : यह एक क्लाउड-आधारित एकीकृत अनुप्रयोग है, जिसे भारत के सभी राज्यों के लिए विकसित किया गया है, जहाँ राज्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इसमें आवश्यक विन्यास कर सकते हैं।
    • यह कारागारों में निरुद्ध बंदियों से संबंधित वास्तविक समय की जानकारी न्यायालयों, कारागार अधिकारियों तथा आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े अन्य संस्थानों को उपलब्ध कराता है।
  • ई-फॉरेंसिक्स : यह ICJS परियोजना के अंतर्गत विकसित एक ऑनलाइन प्रकरण पंजीकरण एवं ट्रैकिंग प्रणाली है।
    • यह विधि विज्ञान विशेषज्ञों को पुलिस के लिए शीघ्र, सटीक एवं विश्वसनीय फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध कराने में सहायता प्रदान करती है।
  • ई-प्रॉसिक्यूशन: इसका मुख्य उद्देश्य लोक अभियोजकों की कार्यप्रणाली का डिजिटलीकरण करना है।
    • यह आपराधिक न्याय प्रणाली में पारदर्शी एवं त्वरित न्यायिक विचारण सुनिश्चित करने में सहायक है।
  • राष्ट्रीय स्वचालित अंगुलिचिह्न पहचान प्रणाली (NAFIS): यह अपराधियों के अंगुलिचिह्नों का एक केंद्रीकृत भंडार है।
    • इसका उपयोग सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों तथा केंद्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा किया जा सकता है।
  • आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) प्रणाली: सरकार ने आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 अधिनियमित किया है।
    • यह अधिनियम पुलिस एवं कारागार अधिकारियों को आपराधिक मामलों में पहचान एवं जाँच के उद्देश्य से संबंधित व्यक्तियों के मापन एकत्र करने का अधिकार प्रदान करता है।
    • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को इस अधिनियम के देशभर के सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में क्रियान्वयन हेतु नोडल एजेंसी नामित किया गया है।

चिंताएँ 

  • डेटा गोपनीयता एवं साइबर सुरक्षा संबंधी जोखिम: आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न डेटाबेसों के एकीकरण से डेटा उल्लंघन, साइबर हमलों तथा संवेदनशील व्यक्तिगत सूचनाओं के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।
  • डिजिटल विभाजन एवं असमान पहुँच: ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में कमजोर डिजिटल अवसंरचना तथा कम डिजिटल साक्षरता के कारण कमजोर एवं वंचित वर्ग न्याय तक पहुँच से वंचित हो सकते हैं।
  • निष्पक्ष न्यायिक विचारण एवं विधिसम्मत प्रक्रिया पर प्रभाव: तकनीकी त्रुटियाँ, इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्याएँ तथा आभासी न्यायिक कार्यवाहियों पर अत्यधिक निर्भरता प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व एवं न्याय तक पहुँच को बाधित कर सकती है।
  • संस्थागत एवं अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ: विभिन्न प्रणालियों के मध्य सीमित अंतर-संचालनीयता, अपर्याप्त डिजिटल अवसंरचना तथा पुलिस, अभियोजकों एवं न्यायिक अधिकारियों के अपर्याप्त प्रशिक्षण के कारण प्रभावी क्रियान्वयन प्रभावित होता है।
  • विधिक एवं नियामकीय कमियाँ: भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल साक्ष्य, जवाबदेही एवं डेटा शासन से संबंधित व्यापक विधिक ढाँचे का अभाव है, जिससे अनिश्चितता एवं संभावित दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है।

आगे की राह

  • डेटा संरक्षण एवं साइबर सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: आपराधिक न्याय डेटाबेस के लिए सुदृढ़ डेटा संरक्षण मानक, नियमित सुरक्षा ऑडिट, एन्क्रिप्शन तथा कठोर अभिगम नियंत्रण लागू किए जाएँ।
  • डिजिटल विभाजन को कम करना: डिजिटल अवसंरचना, इंटरनेट कनेक्टिविटी एवं डिजिटल साक्षरता में सुधार किया जाए तथा डिजिटल रूप से वंचित नागरिकों के लिए ऑफलाइन विकल्प भी उपलब्ध कराए जाएँ।
  • संस्थागत क्षमता का विकास: पुलिस, अभियोजकों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों एवं न्यायिक अधिकारियों को डिजिटल उपकरणों, साइबर फॉरेंसिक तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संबंध में नियमित प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
  • सुदृढ़ विधिक एवं नैतिक ढाँचा का विकास: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चेहरे की पहचान तथा डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएँ तथा गोपनीयता, पारदर्शिता एवं विधिसम्मत प्रक्रिया की सुरक्षा हेतु स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
  • अंतर-संचालनीयता एवं अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) के अंतर्गत पुलिस, न्यायालय, कारागार, अभियोजन तथा विधि विज्ञान प्रणालियों के मध्य मानकीकृत प्रोटोकॉल एवं विश्वसनीय डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से निर्बाध एकीकरण को सुदृढ़ किया जाए।

स्रोत: TH

 

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