पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा
संदर्भ
- ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया ने गैस-आधारित विद्युत संयंत्रों को आगामी दिनों में गैस-आधारित विद्युत उत्पादन की अतिरिक्त आवश्यकता की संभावना को देखते हुए ईंधन खरीद की अग्रिम व्यवस्था करने की सलाह दी है।
गैस-आधारित विद्युत उत्पादन क्या है?
- गैस-आधारित विद्युत संयंत्र प्राकृतिक गैस अथवा तरलीकृत गैस का उपयोग करके विद्युत का उत्पादन करते हैं।
- ये मुख्यतः संयुक्त चक्र गैस टरबाइन (CCGT) प्रौद्योगिकी पर आधारित होते हैं, जो:
- कोयला आधारित संयंत्रों की तुलना में शीघ्र प्रारम्भ हो सकते हैं।
- अधिक परिचालन लचीलापन प्रदान करते हैं।
- कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों की अपेक्षा कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं।

भारत का ऊर्जा परिदृश्य
- भारत ने अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक भाग गैर-जीवाश्म ईंधन से प्राप्त कर लिया है, जो वर्ष 2030 के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के लक्ष्य से काफी पहले प्राप्त किया गया है।
- IRENA नवीकरणीय ऊर्जा आँकड़े 2025 के अनुसार:
- भारत सौर ऊर्जा स्थापित क्षमता में विश्व में तीसरे स्थान पर है।
- पवन ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है।
- कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भी चौथे स्थान पर है।
- इसके बावजूद कोयला आधारित तापीय विद्युत उत्पादन अभी भी राष्ट्रीय ग्रिड का प्रमुख आधार बना हुआ है तथा कुल चरम विद्युत मांग के दो-तिहाई से अधिक की पूर्ति करता है।
- हालांकि, सौर ऊर्जा उत्पादन के समय यह योगदान घटकर लगभग 57 प्रतिशत रह जाता है।

भारत को अभी भी गैस-आधारित विद्युत की आवश्यकता क्यों है?
- अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत: गैस-आधारित विद्युत उत्पादन, कोयला आधारित संयंत्रों की तुलना में कम प्रदूषक उत्सर्जित करता है, जिससे यह अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा विकल्प माना जाता है।
- जलविद्युत उत्पादन में कमी: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्तमान मानसून में सामान्य से कम वर्षा का पूर्वानुमान व्यक्त किया है।
- इससे जलाशयों में जल प्रवाह कम होगा, जिसके परिणामस्वरूप जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होगा।
- नवीकरणीय ऊर्जा की अनियमित प्रकृति : सूर्यास्त के बाद सौर ऊर्जा उत्पादन समाप्त हो जाता है।
- पवन ऊर्जा उत्पादन भी मौसम के अनुसार परिवर्तित होता रहता है।
- जबकि विद्युत की मांग पूरे दिन बनी रहती है तथा सायंकालीन समय में अपने उच्चतम स्तर पर पहुँचती है।
- ग्रिड संतुलन: गैस-आधारित विद्युत संयंत्र कम समय में प्रारम्भ होकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
- इसलिए ये परिवर्तनीय नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के साथ ग्रिड संतुलन बनाए रखने में अत्यंत उपयोगी हैं।
- त्वरित स्थापना : गैस-आधारित विद्युत संयंत्रों का निर्माण बड़े कोयला अथवा परमाणु विद्युत संयंत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत कम समय में किया जा सकता है।
गैस-आधारित विद्युत उत्पादन की चुनौतियाँ
- प्राकृतिक गैस का आयात: भारत के पास प्राकृतिक गैस के सीमित घरेलू भंडार हैं।
- इसकी अधिकांश आवश्यकता आयातित प्राकृतिक गैस से पूरी की जाती है, जो मुख्यतः कतर, ऑस्ट्रेलिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात की जाती है।
- आधारभूत संरचना संबंधी बाधाएँ: प्राकृतिक गैस के प्रभावी परिवहन एवं वितरण हेतु पाइपलाइन, LNG टर्मिनल तथा सिटी गैस वितरण (CGD) नेटवर्क जैसी आधारभूत संरचना का विकास आवश्यक है।
- किन्तु भारत में इनका विस्तार भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याओं, नियामकीय बाधाओं तथा वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ : यद्यपि प्राकृतिक गैस को कोयला एवं पेट्रोलियम की तुलना में स्वच्छ ईंधन माना जाता है, फिर भी इसके उत्खनन, परिवहन एवं दहन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
- संयंत्रों का कम उपयोग: महंगे ईंधन एवं घरेलू प्राकृतिक गैस की सीमित उपलब्धता के कारण अनेक गैस-आधारित विद्युत संयंत्र अपनी पूर्ण क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहे हैं।
गैस-आधारित ऊर्जा को बढ़ावा देने हेतु सरकारी पहल
- आधारभूत संरचना का विकास : जून 2025 तक लगभग 25,429 किलोमीटर प्राकृतिक गैस पाइपलाइनें संचालित हो चुकी हैं, जबकि 10,459 किलोमीटर पाइपलाइनें विभिन्न निर्माण चरणों में हैं।
- राष्ट्रीय गैस ग्रिड (“एक राष्ट्र, एक गैस ग्रिड”): इसका उद्देश्य पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार कर सभी राज्यों को जोड़ना तथा प्राकृतिक गैस का सुरक्षित एवं किफायती परिवहन सुनिश्चित करना है।
- प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा परियोजना: जगदीशपुर–हल्दिया–बोकारो–धामरा–बरौनी–गुवाहाटी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन लगभग 3,546 किलोमीटर लंबी है।
- यह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं असम सहित छह राज्यों से होकर गुजरती है तथा पूर्वी भारत में स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती है।
- सिटी गैस वितरण (CGD) नेटवर्क का विस्तार: सरकार घरेलू उपभोक्ताओं, उद्योगों तथा वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों तक पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की पहुँच बढ़ाने हेतु CGD नेटवर्क के विस्तार को प्रोत्साहित कर रही है।
- पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (PNGRB) द्वारा चिन्हित भौगोलिक क्षेत्रों में CGD नेटवर्क विकसित करने के लिए विभिन्न संस्थाओं को लाइसेंस प्रदान किए जाते हैं।
- गैस मूल्य निर्धारण में सुधार : नई घरेलू गैस मूल्य निर्धारण दिशा-निर्देश (2014) तथा हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं लाइसेंसिंग नीति (HELP) जैसी सुधारात्मक पहलों का उद्देश्य घरेलू गैस उत्पादकों को मूल्य प्रोत्साहन प्रदान करना तथा उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- प्राकृतिक गैस अवसंरचना विकास कोष (NGIDF): सरकार ने भारत में प्राकृतिक गैस अवसंरचना के विकास हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से NGIDF की स्थापना की है।
आगे की राह
- बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS): ग्रिड स्तर की बैटरी भंडारण प्रणालियों की स्थापना को नीतिगत समर्थन एवं वित्तीय प्रोत्साहनों के माध्यम से तीव्र गति प्रदान की जानी चाहिए, ताकि ग्रिड संतुलन एवं चरम मांग के समय विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध हो सके।
- पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं (PSPs) का विस्तार: दीर्घकालिक एवं किफायती ऊर्जा भंडारण समाधान के रूप में पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज परियोजनाओं के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल ग्रिड प्रबंधन का उपयोग: नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के सटीक पूर्वानुमान तथा विद्युत अनुसूची के अनुकूलन हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग एवं डिजिटल ग्रिड प्रबंधन तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।
- पारेषण अवसंरचना का विस्तार: ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तथा अंतर्राज्यीय विद्युत पारेषण नेटवर्क के विस्तार को गति दी जानी चाहिए, ताकि संसाधन-संपन्न क्षेत्रों से मांग वाले क्षेत्रों तक नवीकरणीय ऊर्जा का प्रभावी संचरण सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
- भारत का ऊर्जा संक्रमण अब केवल अधिक संख्या में सौर पैनलों एवं पवन टर्बाइनों की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को आवश्यकता के प्रत्येक समय स्वच्छ एवं विश्वसनीय विद्युत उपलब्ध हो।
- जब तक बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ तथा स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियाँ व्यापक रूप से विकसित एवं लागू नहीं हो जातीं, तब तक गैस-आधारित विद्युत उत्पादन भारत की ऊर्जा प्रणाली में ग्रिड संतुलन बनाए रखने वाले एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य संसाधन के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
Source: IE, BS, MOSPI, NITI AAYOG
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