एनसीईआरटी की “डांसिंग गर्ल” प्रतिमा पर विवाद

पाठ्यक्रम: जीएस-1/प्राचीन भारत 

सन्दर्भ

  • आलोचनाओं का सामना करने के बाद एनसीआरटी ने कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध नृत्यांगना (Dancing Girl) की प्रतिमा का मूल चित्र पुनः शामिल करने का निर्णय लिया है।
  • इससे पहले एनसीईआरटी ने प्रतिमा को ढके हुए धड़ (Covered Torso) के साथ प्रदर्शित करने का निर्णय लिया था।

नृत्यांगना (Dancing Girl) का परिचय

  • “नृत्यांगना की प्रतिमा” लगभग 4,500 वर्ष पुरानी कांस्य प्रतिमा है, जिसे वर्ष 1926 में पुरातत्त्वविद् अर्नेस्ट मैके ने मोहनजोदड़ो (वर्तमान पाकिस्तान) से खोजा था। मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगरीय केन्द्र था।
  • यह प्रतिमा लगभग 10.5 सेंटीमीटर ऊँची है तथा इसके गले में हार और भुजाओं पर बड़ी संख्या में चूड़ियाँ अंकित हैं।
  • सामग्री एवं निर्माण तकनीक: यह कांस्य मूर्ति मधुच्छिष्ट ढलाई पद्धति (Lost-Wax Technique) द्वारा निर्मित की गई थी। यह धातु ढलाई तकनीक आज भी भारत के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ में प्रचलित है।
  • वर्तमान में यह मूल पुरावशेष राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित रखा गया है।

सिंधु घाटी सभ्यता

  • सिंधु घाटी सभ्यता (IVC), जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मानी जाती है। इसका उत्कर्षकाल लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।
  • इसका विकास मुख्यतः सिंधु नदी तंत्र के किनारे हुआ तथा इसका विस्तार वर्तमान पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत  के विशाल क्षेत्रों तक था।
  • यह सभ्यता अपने सुनियोजित नगरों, उन्नत जल-निकासी व्यवस्था, मानकीकृत बाट एवं माप, शिल्प उत्पादन तथा दूरगामी व्यापारिक नेटवर्कों के लिए प्रसिद्ध है।
  • ताँबा-आधारित मिश्रधातुओं के व्यापक उपयोग के कारण इसे कांस्य युगीन सभ्यता (Bronze Age Civilization) माना जाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

हड़प्पा -पंजाब, पाकिस्तान

मोहनजोदड़ो-सिंध, पाकिस्तान

धौलावीरा -कच्छ जिला, गुजरात

कालीबंगा -राजस्थान 

लोथल – गुजरात

राखीगढ़ी- हरियाणा 

चन्हूदड़ो -सिंध, पाकिस्तान 

गणवेरीवाला -पंजाब, पाकिस्तान

सुत्कागेंडोर -बलूचिस्तान प्रांत, पाकिस्तान

आलमगीरपुर -उत्तरप्रदेश

विवाद का महत्त्व

  • इस प्रकरण ने विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में ऐतिहासिक प्रामाणिकता और शैक्षिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन को लेकर बहस को पुनः जीवित कर दिया है।
  • यह प्रश्न उठाता है कि क्या ऐतिहासिक पुरावशेषों को उनके मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए अथवा उन्हें समकालीन मान्यताओं के अनुरूप आयु-उपयुक्त (Age-Appropriate) बनाने के लिए संशोधित किया जाना चाहिए।
  • यह विवाद इस बात को भी रेखांकित करता है कि पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों की भारत की सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत विरासत संबंधी समझ को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • साथ ही, यह प्रभावी शिक्षण सुनिश्चित करते हुए पुरातात्त्विक साक्ष्यों की अखंडता (Integrity) को संरक्षित रखने के महत्त्व को भी उजागर करता है।

भारत एवं विदेशों में समान प्रकार की बहसें

  • भारत में खजुराहो स्मारक समूह में प्रेम, मानवीय संबंधों तथा कामुकता को दर्शाने वाली जटिल मूर्तियाँ विद्यमान हैं। यद्यपि समय-समय पर उनकी स्पष्ट कलात्मक अभिव्यक्तियों को लेकर बहस होती रही है, फिर भी ये यूनेस्को  द्वारा मान्यता प्राप्त स्मारक भारत की सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर के महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में अपने मूल स्वरूप में संरक्षित और प्रदर्शित किए जाते हैं।
  • यूरोप तथा उत्तर अमेरिका में विद्यार्थियों को नियमित रूप से प्राचीन यूनानी एवं रोमन मूर्तियों के चित्रों से परिचित कराया जाता है। इनमें से अनेक मूर्तियाँ मानव शरीर को ऐसे रूप में प्रदर्शित करती हैं जिन्हें आधुनिक दर्शक स्पष्ट मान सकते हैं। फिर भी इन कलाकृतियों को सामान्यतः उनके मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है तथा उनके साथ ऐतिहासिक और कलात्मक संदर्भ भी प्रदान किए जाते हैं।

Source: IE

 

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