भारत के निर्यात में वृद्धि

पाठ्यक्रम : जीएस-3/अर्थव्यवस्था 

सन्दर्भ

  • वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, भारत का वस्तु निर्यात मई 2026 में बढ़कर रिकॉर्ड 45.2 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुँच गया, जो पिछले वर्ष के मई माह की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है।

परिचय

  • वस्तुओं और सेवाओं दोनों के आयात में तीव्र वृद्धि के कारण भारत का कुल व्यापार घाटा बढ़कर 10.5 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।

भारत के शीर्ष 5 निर्यात गंतव्य निम्नलिखित रहे:

  • सिंगापुर – 68.96 प्रतिशत वृद्धि
  • दक्षिण अफ्रीका – 116.21 प्रतिशत वृद्धि
  • तंजानिया गणराज्य – 196.89 प्रतिशत वृद्धि
  • इटली – 87.54 प्रतिशत वृद्धि
  • श्रीलंका – 150.29 प्रतिशत वृद्धि

नोट-सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, इटली एवं श्री लंका भारत के निर्यात विस्तार के प्रमुख गंतव्य रहे हैं।

भारत के निर्यात में वृद्धि के कारण

  • पेट्रोलियम एवं वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम की ऊँची कीमतों के कारण भारत के पेट्रोलियम निर्यात, विशेषकर डीज़ल, पेट्रोल तथा विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) के निर्यात मूल्य में वृद्धि हुई।
  • वैश्विक स्तर पर वस्तुओं (कमोडिटीज़) की बढ़ती कीमतों ने भी निर्यात आय में समग्र वृद्धि में योगदान दिया।
  • विनिर्माण क्षेत्रों का सशक्त प्रदर्शन: निर्मित उत्पादों तथा मशीनरी की वैश्विक मांग मजबूत रहने के कारण इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात सुदृढ़ बना रहा।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई, जिसका प्रमुख कारण उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के अंतर्गत घरेलू विनिर्माण का विस्तार रहा।
  • निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण: भारतीय निर्यातकों ने तंजानिया, श्रीलंका, बांग्लादेश तथा वियतनाम जैसे उभरते बाज़ारों में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया।
  • इस विविधीकरण से पारंपरिक निर्यात गंतव्यों पर निर्भरता कम हुई तथा क्षेत्रीय व्यवधानों के प्रति निर्यात क्षेत्र की लोचशीलता में सुधार हुआ।
  • प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार: भारतीय रुपये के मूल्यह्रास (Depreciation) से वैश्विक बाज़ारों में भारतीय वस्तुओं की मूल्य-प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ी।
  • स्थिर आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा बेहतर लॉजिस्टिक्स व्यवस्था ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद उद्योगों को निर्यात वृद्धि की गति बनाए रखने में सहायता प्रदान की।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्व

  • बाह्य क्षेत्र की स्थिरता को सुदृढ़ करना: निर्यात में मजबूत वृद्धि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार तथा बाह्य क्षेत्र की स्थिरता को समर्थन प्रदान करती है।
  • निर्यात क्षेत्रों का विविधीकरण किसी एक वस्तु अथवा एकल बाज़ार पर निर्भरता को कम करता है।
  • विनिर्माण निर्यात की वृद्धि: इंजीनियरिंग तथा इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में वृद्धि भारत के विनिर्माण पारितंत्र में सुधार का संकेत देती है। निर्यात वृद्धि रोजगार सृजन तथा औद्योगिक विस्तार को भी प्रोत्साहित करती है।
  • सेवा क्षेत्र एवं व्यापार समझौतों का सामरिक महत्त्व: सेवा निर्यात भारत के बाह्य व्यापार संतुलन को स्थिरता प्रदान करते हैं।
  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA) बाज़ारों तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं, शुल्क संबंधी बाधाओं को कम कर सकते हैं तथा भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ और अधिक गहराई से जोड़ सकते हैं।

भारत के निर्यात क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ

  • वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता: पश्चिम एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव व्यापार मार्गों, नौवहन नेटवर्कों तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करते हैं।
  • आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भरता: भारत की कच्चे तेल के आयात पर अधिक निर्भरता उसे वैश्विक ऊर्जा मूल्य झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है। सोने तथा पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते आयात व्यापार घाटे को बढ़ाने में योगदान देते हैं।
  • अवसंरचनात्मक बाधाएँ: उच्च लॉजिस्टिक्स तथा परिवहन लागत भारतीय निर्यातों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारतीय निर्यातकों को चीन, वियतनाम तथा बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
  • विकसित देशों द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी व्यापार नीतियाँ तथा गैर-शुल्कीय बाधाएँ (Non-Tariff Barriers) बाज़ार तक पहुँच को सीमित करती हैं।
  • विनिर्माण क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियाँ: भारत के विनिर्माण क्षेत्र को पैमाने (Scale), उत्पादकता तथा तकनीकी प्रतिस्पर्धात्मकता से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • उच्च-मूल्य एवं प्रौद्योगिकी-गहन निर्यातों में सीमित विविधीकरण दीर्घकालिक निर्यात क्षमता को बाधित करता है।

हाल की सरकारी पहलें

  • निर्यात संवर्धन मिशन (EPM):केंद्रीय बजट 2025-26 में वित्त मंत्री ने निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) की घोषणा की।
  • यह निर्यात ऋण तक आसान पहुँच, सीमा-पार फैक्टरिंग सहायता तथा विदेशी बाज़ारों में गैर-शुल्कीय बाधाओं से निपटने हेतु एमएसएमई को समर्थन प्रदान करेगा।
  • ईपीएम की अवधि छह वर्षों की होगी, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 से वित्तीय वर्ष 2030-31 तक विस्तृत रहेगी।
  • इसके अंतर्गत हाल की वैश्विक शुल्क वृद्धि से प्रभावित क्षेत्रों, जैसे वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएँ तथा समुद्री उत्पादों को प्राथमिकता के आधार पर सहायता प्रदान की जाएगी।
  • निर्यात सहायता पैकेज: निर्यातकों की ऋण तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने 7,295 करोड़ रुपये के निर्यात सहायता पैकेज की घोषणा की।
  • इसमें 5,181 करोड़ रुपये की ब्याज अनुदान (Interest Subvention) योजना तथा 2,114 करोड़ रुपये की संपार्श्विक (Collateral) सहायता शामिल है।
  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA) वार्ताएँ: भारत नए बाज़ारों तक पहुँच बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत है तथा वर्ष 2025 में ओमान, न्यूजीलैंड और यूनाइटेड किंगडम के साथ तीन मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है।
  • वर्ष 2026 में भारत ने यूरोपियन यूनियन के साथ भी एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • डिजिटल परिवर्तन:वाणिज्य विभाग ने व्यापार सुगमीकरण तथा व्यापारिक सूचना तंत्र को डेटा-आधारित समाधानों के माध्यम से सुदृढ़ करने के लिए अपने डिजिटल परिवर्तन एजेंडा को आगे बढ़ाया है।
  • ट्रेड ई-कनेक्ट तथा ट्रेड इंटेलिजेंस एंड एनालिटिक्स (TIA) पोर्टल जैसी पहलें साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण और निर्णय-प्रक्रिया के लिए मजबूत आधार प्रदान करती हैं।

आगे की राह

  • निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण: भारत को उभरते हुए बाज़ारों में अपने निर्यात का विस्तार करना चाहिए तथा कुछ पारंपरिक गंतव्यों पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
  • लॉजिस्टिक्स अवसंरचना में सुधार: निर्यात लागत और विलंब को कम करने के लिए भारत को बंदरगाहों, परिवहन नेटवर्कों तथा सीमा-शुल्क प्रणालियों का आधुनिकीकरण करना चाहिए।
  • एमएसएमई एवं निर्यातकों को समर्थन: लघु निर्यातकों के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी तथा निर्यात प्रोत्साहनों तक पहुँच को और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण: भू-राजनीतिक व्यवधानों से निपटने के लिए भारत को सुदृढ़ एवं लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा वैकल्पिक व्यापार मार्गों का विकास करना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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