पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- विगत एक दशक में भारत ने जैव विविधता संरक्षण के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन, आवास पुनर्स्थापन, प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रमों तथा सामुदायिक भागीदारी का समावेश किया गया है।
जैव विविधता क्या है?
- जैव विविधता से आशय पृथ्वी पर विद्यमान जीवन की विविधता से है, जिसमें पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्मजीव तथा उनके द्वारा निर्मित पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं।
- यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का आधार है तथा परागण, मृदा निर्माण, पोषक तत्वों के चक्रण, जल शुद्धिकरण एवं जलवायु विनियमन जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को समर्थन प्रदान करती है

भारत का जैव विविधता ढाँचा
- जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (वर्ष 2023 में संशोधित): यह अधिनियम राष्ट्रीय, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से जैव विविधता शासन का वैधानिक आधार प्रदान करता है।
- यह कानून जैविक संसाधनों तथा उनसे संबंधित पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण को भी समर्थन प्रदान करता है।
- वर्ष 2023 के संशोधन ने इस ढाँचे को अधिक सुदृढ़ बनाया है तथा इसके कार्यान्वयन को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सुगम बनाया है।

- जैविक विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 39: जैविक विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 39 केंद्र सरकार को विभिन्न श्रेणियों के जैविक संसाधनों के लिए संस्थानों को भंडारगृह के रूप में नामित करने का अधिकार प्रदान करती है।
- किसी नई वर्गिकी इकाई (New Taxon) की खोज करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह नामित भंडारगृह को इसकी सूचना दे तथा संबंधित प्रमाणिक नमूना (Voucher Specimen) वहाँ जमा करे।
- वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग:
- भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) एवं भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI): भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) एवं भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) क्रमशः देश की प्राणी एवं वनस्पति विविधता का दस्तावेजीकरण करते हैं।
- भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI): भारतीय वन सर्वेक्षण ( FSI) अपनी आवधिक भारत वन स्थिति रिपोर्ट के माध्यम से देश के वन एवं वृक्ष आच्छादन का मानचित्रण करता है।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA): राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा राज्य वन विभाग बाघों एवं उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण कोष (NBAF): राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण कोष (NBAF) एक वैधानिक कोष है, जो लाभ-साझेदारी तथा संरक्षण-संबंधी उपयोग हेतु एक संस्थागत तंत्र उपलब्ध कराकर जैव विविधता शासन को समर्थन प्रदान करता है।
- जन जैव विविधता रजिस्टर (PBR): जन जैव विविधता रजिस्टर एक स्थानीय जैव विविधता डेटाबेस है, जिसे सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से तैयार किया जाता है।
- इसका निर्माण जैव विविधता प्रबंधन समिति (BMC) द्वारा स्थानीय समुदायों के परामर्श से किया जाता है।
- PBR जैव विविधता के दस्तावेजीकरण, संरक्षण तथा लाभ-साझेदारी के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
- राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य योजना (NBSAP 2024-2030): यह योजना जैव विविधता के संरक्षण तथा उसके सतत उपयोग के लिए भारत को दीर्घकालिक नीतिगत दिशा प्रदान करती है।
- वर्ष 2024 से 2030 तक की अद्यतन कार्ययोजना कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा ( KMGBF) के अनुरूप तैयार की गई है, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता अधिक सुदृढ़ हुई है।
- राष्ट्रीय रेड लिस्ट रोडमैप (2025-2030): यह पहल भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) एवं भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) के नेतृत्व में संचालित की जा रही है, जिसमें IUCN-इंडिया तथा सेंटर फॉर स्पीशीज़ सर्वाइवल, इंडिया का सहयोग प्राप्त है।
- इस रोडमैप का उद्देश्य संकटग्रस्त प्रजातियों के आकलन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित, वैज्ञानिक एवं साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन प्रणाली की स्थापना करना है।
- बायोडायवर्सिटी फाइनेंस इंडिया : बायोडायवर्सिटी फाइनेंस इंडिया का शुभारंभ वर्ष 2015 में जैव विविधता संरक्षण हेतु वित्तीय आवश्यकताओं की पहचान करने तथा संरक्षण कार्यों के लिए संसाधन एकत्रित करने की एक वित्तीय नियोजन पहल के रूप में किया गया था।
- यह पहल वित्तीय संसाधनों की पहचान एवं उनके संकलन पर केंद्रित है, जबकि राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण कोष (NBAF) संरक्षण एवं लाभ-साझेदारी के लिए वैधानिक तंत्र के माध्यम से इन संसाधनों का उपयोग सुनिश्चित करता है।
जैव विविधता संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय ढाँचे
- जैविक विविधता अभिसमय (CBD), 1992: इसे रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में अपनाया गया था।
- यह लगभग सार्वभौमिक सदस्यता वाला एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
- भारत CBD का एक पक्षकार देश है।
- जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच (IPBES): इसकी स्थापना वर्ष 2012 में की गई थी तथा इसे प्रायः “जैव विविधता का IPCC” कहा जाता है।
- यह जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर वैज्ञानिक आकलन उपलब्ध कराता है, जो साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को समर्थन प्रदान करते हैं।
- रामसर अभिसमय , 1971: यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण एवं विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संधि है।
- यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की पहचान एवं प्रबंधन को प्रोत्साहित करता है।
- प्रवासी वन्य जीव प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (बॉन अभिसमय): इस पर वर्ष 1979 में हस्ताक्षर किए गए थे।
- यह प्रवासी स्थलीय, समुद्री तथा पक्षी प्रजातियों के संरक्षण हेतु कार्य करता है तथा उनके प्रवास मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की पहलें: IUCN विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त संकटग्रस्त प्रजातियों की रेड लिस्ट का संधारण करता है।
- यह संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणियाँ तथा संरक्षण संबंधी दिशानिर्देश विकसित करता है।
- नागोया प्रोटोकॉल : यह जैविक विविधता अभिसमय (CBD) के COP-10 के दौरान जापान के नागोया शहर में अपनाया गया एक कानूनी रूप से बाध्यकारी पूरक समझौता है।
- यह आनुवंशिक संसाधनों तथा उनसे संबंधित स्थानीय एवं स्वदेशी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत एवं समान वितरण को सुनिश्चित करता है।
- कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (KMGBF): इसे कनाडा के मॉन्ट्रियल में आयोजित CBD के COP-15 के दौरान अपनाया गया था।
- यह वर्ष 2022 में 196 देशों द्वारा स्वीकृत एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक जैव विविधता हानि को रोकना एवं उसे उलटना तथा वर्ष 2050 तक “प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन” की परिकल्पना को साकार करना है।
- 30×30 लक्ष्य
- इस रूपरेखा में वर्ष 2030 तक विश्व की कम-से-कम 30% भूमि एवं महासागरों के संरक्षण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- भारत की सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट (NR-7): हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने जैविक विविधता अभिसमय (CBD) को भारत की सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट (NR-7) प्रस्तुत की है।
- यह रिपोर्ट अभिसमय के उद्देश्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करती है।
निष्कर्ष
- भारत के जैव विविधता संरक्षण प्रयास अब सुदृढ़ विधिक ढाँचे, संस्थागत व्यवस्थाओं तथा समुदाय-आधारित सहभागिता पर आधारित हैं, जो जैविक विविधता अभिसमय (CBD) के अंतर्गत वैश्विक रूपरेखाओं के अनुरूप संचालित हो रहे हैं।
- भारत वन एवं वृक्ष आच्छादन को सुदृढ़ करने, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार करने, प्रजातियों के संरक्षण को बेहतर बनाने तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी को संगठित एवं समन्वित तरीके से बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
- भविष्य की दृष्टि से, अद्यतन रणनीतियाँ, समर्पित वित्तीय संसाधन तथा पारदर्शी राष्ट्रीय रिपोर्टिंग तंत्र जैव विविधता को सतत एवं समावेशी विकास के केंद्र में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
स्रोत: PIB
Previous article
किसान-केंद्रित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
Next article
संक्षिप्त समाचार 06-06-2026