मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा रेपो दर यथावत, आर्थिक विकास दर के पूर्वानुमान में कटौती 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ 

  • मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया।

परिचय 

  • स्थायी जमा सुविधा (SDF) की दर 5% पर यथावत रखी गई है।
  • सीमांत स्थायी सुविधा MSF) दर तथा बैंक दर को 5.50% पर बनाए रखा गया है।
  • आर्थिक विकास का अनुमान: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया गया है।
    • प्रथम तिमाही (Q1) – 6.6%
    • द्वितीय तिमाही (Q2) – 6.3%
    • तृतीय तिमाही (Q3) – 6.5%
    • चतुर्थ तिमाही (Q4) – 6.8%
  • मुद्रास्फीति का अनुमान: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1% लगाया गया है, जो पूर्व अनुमान से 50 आधार अंक अधिक है।
  • प्रथम तिमाही (Q1) – 4.2%
  • द्वितीय तिमाही (Q2) – 5.1%
  • तृतीय तिमाही (Q3) – 5.9%
  • चतुर्थ तिमाही (Q4) – 5.4%

रेपो दर क्या है?

  • रेपो दर वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है। यह तरलता, मुद्रास्फीति तथा आर्थिक विकास को नियंत्रित करने हेतु RBI का प्रमुख मौद्रिक नीति उपकरण है।
  • निम्न रेपो दर का प्रभाव: कम रेपो दर का अर्थ है कि बैंक RBI से कम लागत पर ऋण प्राप्त कर सकते हैं। इससे बैंक अपनी ऋण दरों में कमी करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप—
    • उपभोक्ताओं एवं व्यवसायों के लिए ऋण प्राप्त करना आसान हो जाता है।
    • निवेश, उपभोग तथा आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है।
    • अर्थव्यवस्था में तरलता एवं मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है।
    • विशेष रूप से आर्थिक मंदी के समय आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

मौद्रिक नीति समिति क्या है?

  • मौद्रिक नीति समिति एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में वर्ष 2016 के संशोधन के माध्यम से की गई थी।
  • यह मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को ध्यान में रखकर मानक ब्याज दर (रेपो दर) निर्धारित करने के लिए उत्तरदायी है।
  • संरचना: मौद्रिक नीति समिति में कुल 6 सदस्य होते हैं—
    • RBI के 3 सदस्य (जिनमें RBI गवर्नर अध्यक्ष होते हैं)
    • केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 3 बाह्य सदस्य
  • कार्यप्रणाली: समिति की बैठक वर्ष में कम-से-कम चार बार (आमतौर पर द्विमासिक) आयोजित की जाती है।
    • निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं।
    • प्रत्येक सदस्य के पास एक मत होता है।
    • मतों की समानता की स्थिति में RBI गवर्नर का निर्णायक मत मान्य होता है।

लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा (FITF)

  • भारत ने वर्ष 2016 में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा (FITF) अपनाया।
  • इसके अंतर्गत केंद्र सरकार, RBI के परामर्श से प्रत्येक पाँच वर्ष में मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करती है।
  • वर्तमान लक्ष्य: 31 मार्च 2026 तक प्रभावी वर्तमान व्यवस्था के अनुसार—
    • CPI आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्य : 4%
    • सहनशीलता सीमा : ±2%
    • अर्थात स्वीकार्य मुद्रास्फीति सीमा : 2% से 6%

भारत में मौद्रिक नीति के उपकरण

  • RBI द्वारा मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने हेतु प्रयुक्त विभिन्न उपकरणों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—
  • मात्रात्मक उपकरण : मौद्रिक नीति के मात्रात्मक साधनों का उद्देश्य क्रेडिट की लागत और मात्रा को नियंत्रित करना है।
  • गुणात्मक उपकरण : मौद्रिक नीति के गुणात्मक साधनों का उद्देश्य क्रेडिट के उपयोग और दिशा को नियंत्रित करना है।

मात्रात्मक उपकरण

  •  रेपो दर: वह दर जिस पर RBI प्रतिभूतियों के बदले बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है।
  • रिवर्स रेपो दर: वह दर जिस पर RBI बैंकों से अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करता है।
  • नकद आरक्षित अनुपात : जमा राशि का वह भाग जिसे बैंकों को नकद रूप में RBI के पास रखना अनिवार्य होता है।
  • वैधानिक तरलता अनुपात : जमा राशि का वह भाग जिसे बैंक स्वर्ण, नकद अथवा सरकारी प्रतिभूतियों जैसे तरल परिसंपत्तियों में रखते हैं।
  • खुला बाजार परिचालन : तरलता को नियंत्रित करने हेतु RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद एवं बिक्री।
  • सीमांत स्थायी सुविधा : दंडात्मक दर पर बैंकों को उपलब्ध आपातकालीन ऋण सुविधा।
  • तरलता समायोजन सुविधा : रेपो एवं रिवर्स रेपो परिचालनों का ढाँचा।
  • बाजार स्थिरीकरण योजना : अधिशेष तरलता को अवशोषित करने हेतु जारी किए जाने वाले बांड।

गुणात्मक उपकरण

  • मार्जिन आवश्यकता : ऋण एवं संपार्श्विक मूल्य के अनुपात को नियंत्रित करना।
  • उपभोक्ता ऋण विनियमन : उपभोक्ता ऋण की शर्तों को विनियमित करना।
  • ऋण का राशनिंग : विशिष्ट क्षेत्रों को दिए जाने वाले ऋण की सीमा निर्धारित करना।
  • नैतिक प्रेरणा : RBI द्वारा बैंकों को परामर्श एवं प्रेरणा के माध्यम से निर्देशित करना।
  • प्रत्यक्ष कार्रवाई : निर्देशों का पालन न करने वाले बैंकों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करना।

हालिया नीतिगत निर्णय के पीछे कारण

  • भू-राजनीतिक अनिश्चितता: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को बढ़ा दिया है। इसी कारण MPC ने रेपो दर को यथावत रखने का निर्णय लिया।
  • आपूर्ति-पक्षीय आघात: समिति ने उल्लेख किया कि ऊर्जा एवं वस्तु बाज़ारों में व्यवधानों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था आपूर्ति-पक्षीय झटकों का सामना कर रही है।
  • लक्ष्य सीमा के अंदर मुद्रास्फीति: खुदरा मुद्रास्फीति 2% से 6% की लक्ष्य सीमा के अंदर  बनी हुई है तथा कोर मुद्रास्फीति नियंत्रित है, जिससे तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता सीमित हो गई है।
  • व्यापार समझौतों का प्रभाव: भारत ने हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ, ओमान तथा न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं। इन समझौतों से—
    • निर्यात एवं निवेश में वृद्धि होने की संभावना है।
    • बाह्य क्षेत्र की संवेदनशीलताओं में कमी आएगी।
    • मध्यम अवधि के आर्थिक विकास को समर्थन मिलेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • उधारकर्ताओं एवं परिवारों पर प्रभाव: स्थिर ब्याज दरें मध्यम वर्गीय परिवारों तथा आवास ऋण धारकों के लिए वित्तीय अनिश्चितता को कम करती हैं।
  • निवेश एवं ऋण वृद्धि पर प्रभाव: स्थिर ब्याज दरें, सुदृढ़ मांग की परिस्थितियाँ तथा व्यापार समझौते निजी निवेश के लिए एक पूर्वानुमेय एवं अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं।
  • व्यापक आर्थिक स्थिरता: यह निर्णय भारत के लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है तथा मौद्रिक नीति निर्माण में संस्थागत स्थिरता को प्रदर्शित करता है।

आगे की राह 

  • बाह्य क्षेत्र की स्थिरता को सुरक्षित करना: बाह्य आघातों से अर्थव्यवस्था की सुरक्षा हेतु सक्रिय तरलता प्रबंधन, विदेशी मुद्रा भंडार का विवेकपूर्ण उपयोग तथा वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों की सतत निगरानी आवश्यक है।
  • राजकोषीय एवं मौद्रिक समन्वय का सुदृढ़ीकरण: राजकोषीय समेकन के साथ लक्षित सार्वजनिक व्यय को जारी रखना चाहिए, जिससे मौद्रिक नीति को समर्थन मिलेगा तथा मुद्रास्फीति संबंधी दबाव उत्पन्न किए बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।

स्रोत: TH

 

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