न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता: दक्षता और संवैधानिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन

पाठ्यक्रम: GS2/न्यायपालिका

संदर्भ

  • ‘वन केस वन डेटा’ पहल से जुड़ा ‘सु सहाय’ का शुभारंभ न्यायिक पहुँच और दक्षता को बढ़ाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है। साथ ही न्यायालय अब डीपफेक, भ्रामक सूचना, और डेटा गोपनीयता जैसे मुद्दों से भी अधिकाधिक रूप से सामना कर रहे हैं।

न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे संगणक तंत्रों को संदर्भित करती है जो सामान्यतः मानव बुद्धि की आवश्यकता वाले कार्य कर सकते हैं, जैसे भाषा संसाधन, डेटा विश्लेषण, पूर्वानुमान, और निर्णय सहयोग।
  • न्यायपालिका में AI का प्रयोग मुख्यतः सहायक तकनीक के रूप में किया जा रहा है, न कि न्यायाधीशों के स्थान पर।
  • यह कानूनी शोध और केस-लॉ खोज, निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद, केस प्रबंधन और समय निर्धारण, भाषण से पाठ रूपांतरण, प्रारूपण सहायता एवं संक्षेपण, ई-फाइलिंग और आभासी न्यायालय प्रणाली में सहायक है।
  • न्यायिक कार्य प्रायः अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक प्रवृत्तियों से बचाने, स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने, तथा संवैधानिक मूल्यों की गतिशील व्याख्या करने की माँग करता है।
    • AI, जो पैटर्न-आधारित और पूर्वानुमानात्मक है, नैतिक तर्क और संदर्भात्मक व्याख्या की आवश्यकता वाले मामलों में कठिनाई का सामना कर सकता है।

प्रमुख चिंताएँ और चुनौतियाँ

  • न्यायिक तर्क पर खतरा: एल्गोरिदमिक ढंग से न्यायिक तर्क का आकार लेना एक बड़ी चिंता है।
  • अत्यधिक निर्भरता: AI-जनित सारांश और प्रारूपों पर अत्यधिक निर्भरता से मानकीकृत एवं सतही तर्क, चिंतनशील कानूनी लेखन में गिरावट, तथा न्यायाधीशों और वकीलों की बौद्धिक संलग्नता में कमी हो सकती है।
  • भ्रामक उद्धरण: जनरेटिव AI प्रणालियाँ प्रायः निर्णयों और कानूनी मिसालों का मनगढ़ंत निर्माण करती हैं। ऐसी अशुद्धियाँ न्यायालयों को गुमराह कर सकती हैं, कानूनी डेटाबेस को दूषित कर सकती हैं, और सत्यापन का बोझ बढ़ा सकती हैं।
  • पक्षपात और पारदर्शिता की कमी: AI प्रणालियाँ ऐतिहासिक डेटा से सीखती हैं, जिसमें सामाजिक पक्षपात, भेदभावपूर्ण पैटर्न और संस्थागत पूर्वाग्रह हो सकते हैं। अपारदर्शी एल्गोरिद्म जवाबदेही, व्याख्येयता और न्यायिक परिणामों में निष्पक्षता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
  • गोपनीयता और डेटा सुरक्षा: न्यायालय अभिलेखों में अत्यंत संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी होती है। ऐसे डेटा को AI प्रणालियों में डालना गोपनीयता के अधिकार (पुट्टस्वामी निर्णय में मान्यता प्राप्त), डेटा दुरुपयोग और साइबर सुरक्षा कमजोरियों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
  • संवैधानिक और नैतिक चिंताएँ: न्याय में सहानुभूति, नैतिकता और संदर्भात्मक समझ शामिल होती है। AI में मानव अनुभव, नैतिक उत्तरदायित्व एवं लोकतांत्रिक जवाबदेही का अभाव है। AI प्रणालियाँ न्यायाधीशों की तरह सार्वजनिक रूप से निर्णयों का औचित्य सिद्ध या बचाव नहीं कर सकतीं।

न्यायपालिका में AI से संबंधित प्रमुख सुधार और पहल

  • ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के अंतर्गत न्याय विभाग द्वारा शुरू की गई डिजिटलीकरण पहल, जिसमें न्यायालय अभिलेखों का डिजिटलीकरण, ई-फाइलिंग और आभासी सुनवाई शामिल है। चरण III का उद्देश्य ‘स्मार्ट न्यायपालिका’ का निर्माण है।
  • SUVAS (सर्वोच्च न्यायालय विधिक अनुवाद सॉफ़्टवेयर): क्षेत्रीय भाषाओं में निर्णयों का अनुवाद करने हेतु AI-आधारित उपकरण।
  • SUPACE (सर्वोच्च न्यायालय पोर्टल फॉर असिस्टेंस इन कोर्ट्स एफिशिएंसी): न्यायाधीशों को प्रासंगिक तथ्य और मिसालें पहचानने में सहायता करता है।
  • वन केस वन डेटा पहल: न्यायिक डेटा प्रबंधन को मानकीकृत करता है।
  • सु सहाय चैटबॉट: वादकारियों और वकीलों को न्यायिक जानकारी तक आसान पहुँच प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG): लंबित मामलों और निस्तारण का वास्तविक समय डेटाबेस। यह पारदर्शिता एवं नीतिगत योजना को बढ़ाता है।
  • डिजिटल इंडिया और इंडियाAI मिशन: सार्वजनिक संस्थानों में AI एकीकरण को समर्थन देने वाली व्यापक डिजिटल शासन पहलें।

आगे का मार्ग: न्यायपालिका में AI को सुदृढ़ करने हेतु सुझावित उपाय

  • AI को सख्ती से सहायक बनाए रखें: AI को प्रशासनिक दक्षता का समर्थन करना चाहिए, परंतु न्यायिक तर्क या संवैधानिक व्याख्या का स्थान नहीं लेना चाहिए।
  • मानवीय पर्यवेक्षण और जवाबदेही: निर्णयों की अंतिम जिम्मेदारी न्यायाधीशों के पास रहनी चाहिए। सभी AI-सहायित प्रक्रियाओं में मानवीय समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
  • एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता: न्यायालयों में प्रयुक्त AI प्रणालियाँ व्याख्येय, ऑडिट योग्य और पारदर्शी होनी चाहिए।
  • सुदृढ़ डेटा संरक्षण ढाँचा: संवेदनशील न्यायिक डेटा को एन्क्रिप्शन, सुरक्षित भंडारण और डेटा संरक्षण कानूनों के अनुपालन द्वारा सुरक्षित किया जाना चाहिए।
  • क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण: न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायालय कर्मचारियों को AI साक्षरता, सत्यापन अभ्यास एवं प्रौद्योगिकी के नैतिक उपयोग में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • स्वतंत्र नियामक मानक: भारत को न्यायिक AI दिशानिर्देश विकसित करने चाहिए, जिनमें नैतिक सुरक्षा, पक्षपात शमन और संवैधानिक अनुपालन पर ध्यान केंद्रित हो।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक दक्षता को बढ़ा सकती है, परंतु संवैधानिक उत्तरदायित्व और न्यायिक तर्क मानवीय ही बने रहना चाहिए। भारतीय न्यायपालिका में AI के बढ़ते एकीकरण के संदर्भ में चर्चा कीजिए। 

स्रोत: HT

 

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