पाठ्यक्रम: जीएस- 3/कृषि
सन्दर्भ
- भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तनशीलता तथा बढ़ती इनपुट लागत का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे कृषि अभियांत्रिकी इस क्षेत्र में दक्षता, सततता और लचीलापन बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण साधन बन गई है।
कृषि अभियांत्रिकी क्या है?
- कृषि अभियांत्रिकी में अभियांत्रिकी सिद्धांतों, वैज्ञानिक ज्ञान तथा तकनीकी नवाचारों का उपयोग करके कृषि उत्पादकता और सततता में सुधार किया जाता है।
- यह कृषि विज्ञान से भिन्न है, क्योंकि इसका केंद्र फसलों की जीवविज्ञान के बजाय कृषि को सक्षम बनाने वाली प्रणालियों, उपकरणों और अवसंरचना पर होता है।
- यह चार प्रमुख क्षेत्रों में कार्य करता है: कृषि यंत्रीकरण, मृदा एवं जल संरक्षण, कटाई उपरांत अभियांत्रिकी तथा सटीक/डिजिटल कृषि।
भारतीय कृषि के आधुनिकीकरण में कृषि अभियांत्रिकी की भूमिका
- कृषि उत्पादकता में वृद्धि: ट्रैक्टर, बीज ड्रिल, प्लांटर, हार्वेस्टर और लेज़र भूमि समतलीकरण जैसे उपकरण कार्य दक्षता बढ़ाते हैं।
- कृषि यंत्रीकरण से उत्पादकता में 12–15% वृद्धि, लागत में 20% कमी तथा बुवाई श्रम में 60–70% तक कमी आती है।
- जल संसाधन प्रबंधन: ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर प्रणाली तथा उर्वरक मिश्रित सिंचाई जैसी तकनीकें जल का कुशल उपयोग सुनिश्चित करती हैं। सेंसर और स्वचालित सिंचाई प्रणाली अत्यधिक जल उपयोग को रोकती हैं और फसल स्वास्थ्य सुधारती हैं।
- मृदा प्रबंधन को सुदृढ़ करना: मेड़बंदी, सीढ़ीदार खेती, जल निकासी प्रणाली और कटाव नियंत्रण जैसी तकनीकें मृदा उर्वरता को बनाए रखती हैं।
- कटाई उपरांत हानि में कमी: भारत में भंडारण, परिवहन और आपूर्ति श्रृंखला की कमियों के कारण हर वर्ष 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कृषि उत्पाद नष्ट होता है।
- शीत श्रृंखला जैसी अभियांत्रिकी तकनीकों से यह हानि 75% तक कम की जा सकती है।
- सटीक और स्मार्ट कृषि को बढ़ावा: ड्रोन, सेंसर, उपग्रह आधारित यंत्र और आँकड़ा विश्लेषण से वास्तविक समय में खेतों की निगरानी संभव होती है।
- इससे उर्वरक उपयोग की दक्षता 12–15% बढ़ती है तथा कीटनाशकों का उपयोग लगभग 20% घटता है।
- जलवायु अनुकूलता: सटीक सिंचाई, मौसम आधारित सेंसर और ड्रोन आधारित निगरानी किसानों को अनियमित वर्षा और तापीय तनाव से निपटने में सहायता करते हैं।
- संरक्षण जुताई उपकरण (जैसे जीरो-टिल ड्रिल, हैप्पी सीडर) मृदा कटाव कम करते हैं, नमी बनाए रखते हैं तथा पराली जलाने की समस्या घटाते हैं।
- जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति भी उत्पादकता और सततता को बढ़ावा देती है।
कृषि अभियांत्रिकी के अपनाने में चुनौतियाँ
- उच्च पूंजी लागत: आधुनिक मशीनें और तकनीकें महंगी होती हैं, जिससे छोटे किसानों के लिए इन्हें अपनाना कठिन होता है।
- संस्थागत ऋण की कमी और सीमित सब्सिडी भी बाधा बनती है।
- यंत्रीकरण की स्थिति: भारत में कृषि यंत्रीकरण लगभग 40–45% है, जो अमेरिका, ब्राजील और चीन की तुलना में काफी कम है।
- वर्ष 2024 तक यह लगभग 47% है, जिसमें बीज-क्यारी की तैयारी में अधिक (70%) तथा कटाई में कम (34%) है।
- यंत्रीकरण क्षेत्रीय रूप से असमान है, जो मुख्यतः पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों तक सीमित है।
- तकनीकी जागरूकता की कमी: किसानों को आधुनिक उपकरणों के संचालन और रखरखाव का पर्याप्त ज्ञान नहीं होता।
- कृषि विस्तार तंत्र की कमजोरी के कारण नई तकनीकों का प्रसार सीमित रहता है।
- खंडित भूमि स्वामित्व: लगभग 84% जोत 1 हेक्टेयर से कम हैं, जिससे व्यक्तिगत मशीन स्वामित्व आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
- भूमि समेकन की कमी उच्च क्षमता वाली मशीनों के उपयोग में बाधा डालती है।
- अवसंरचनात्मक एवं संस्थागत कमियाँ: ग्रामीण अवसंरचना, भंडारण, शीत श्रृंखला, सड़क और बिजली की कमी तकनीकी लाभों को सीमित करती है।
- बाजार संपर्कों की कमजोरी भी उत्पादन लाभ को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होने देती।
प्रमुख सरकारी नीतियाँ और योजनाएँ
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): “हर बूंद से अधिक फसल” के सिद्धांत पर आधारित, जो जल उपयोग दक्षता बढ़ाने हेतु सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देती है।
- नमो ड्रोन दीदी: महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन उपलब्ध कराने की योजना, जिससे कीटनाशक और उर्वरक छिड़काव किया जा सके।
- प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना: कम उत्पादकता वाले जिलों में यंत्रीकरण, सिंचाई और कटाई उपरांत सहायता पर केंद्रित।
- फार्म मशीनरी समाधान ऐप: डिजिटल मंच जो किसानों को उपकरण सेवाओं से जोड़ता है और लागत कम करता है।
- कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय: प्रत्येक राज्य में स्थापना का प्रस्ताव, ताकि यंत्रीकरण नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके।
आगे की राह
- समावेशी यंत्रीकरण को बढ़ावा देने हेतु कस्टम हायरिंग केंद्रों का विस्तार किया जाए तथा उपकरण किराया मॉडल को प्रोत्साहित किया जाए। किसान उत्पादक संगठनों को सामूहिक रूप से कृषि उपकरणों के स्वामित्व और प्रबंधन के लिए प्रेरित किया जाए।
- तकनीक की अंतिम स्तर तक पहुँच: डिजिटल मंचों, मोबाइल आधारित परामर्श सेवाओं तथा खेत स्तर पर प्रदर्शन के माध्यम से कृषि विस्तार सेवाओं को सुदृढ़ किया जाए।
- गाँव स्तर पर प्रशिक्षित कृषि-तकनीकी सहायकों की नियुक्ति की जाए, जो किसानों को आधुनिक उपकरणों के उपयोग में सहायता प्रदान करें।
- लघु किसानों के लिए नवाचार: कम लागत, छोटे आकार तथा क्षेत्र विशेष के अनुरूप मशीनों के विकास को बढ़ावा दिया जाए, जो खंडित भूमि के लिए उपयुक्त हों।
- संस्थागत सहयोग: कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना तथा पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं के बेहतर समन्वय के माध्यम से समग्र कृषि विकास सुनिश्चित किया जाए।
स्रोत : TH
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