पाठ्यक्रम: GS1/ समाज, GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल के वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी में सुधार हुआ है, किंतु नेतृत्व भूमिकाओं में उनकी प्रतिनिधित्व क्षमता अत्यंत सीमित बनी हुई है।
महिला श्रम शक्ति भागीदारी की स्थिति
- भारत की महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR) 2022 में 33.9% से बढ़कर 2025 में लगभग 40% हो गई है।
- यह स्तर वैश्विक औसत 49% से कम है और ब्राज़ील (53%) तथा वियतनाम (69%) जैसे उभरते अर्थतंत्रों से काफी पीछे है।
- विश्व बैंक ने रेखांकित किया है कि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने हेतु लगभग 8% वार्षिक वृद्धि बनाए रखना आवश्यक है, जो उच्च महिला कार्यबल भागीदारी के बिना संभव नहीं।

महिलाओं की भागीदारी का आर्थिक महत्व
- महिलाओं की अधिक भागीदारी से श्रम आपूर्ति, उत्पादकता और समावेशी विकास में वृद्धि होती है।
- महिला रोजगार से परिवार कल्याण, बाल पोषण और शैक्षिक परिणामों में सुधार होता है।
- अनुभवजन्य साक्ष्य दर्शाते हैं कि महिला विधायकों द्वारा प्रतिनिधित्व वाले निर्वाचन क्षेत्रों में आर्थिक वृद्धि लगभग 1.8 प्रतिशत अंक अधिक रही है।
नेतृत्व पदों में अल्प-प्रतिनिधित्व
- अकादमिक क्षेत्र: राष्ट्रीय स्तर पर प्रोफेसर एवं समकक्ष पदों पर महिलाओं का प्रतिशत 2011-12 में 25.9% से बढ़कर 2021-22 में 29.5% हुआ है, जो धीमी संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है।
- प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों में महिला संकाय का प्रतिशत IITs में केवल 14% और IIMs में 19% से 31% तक है।
- कॉर्पोरेट क्षेत्र: महिला-स्वामित्व वाले स्वामित्व प्रतिष्ठानों का हिस्सा मात्र 27% है।
- वरिष्ठ भूमिकाओं में प्रत्येक 100 पुरुषों पर केवल 13 महिलाएँ हैं।
- BSE 200 कंपनियों में महिला अध्यक्षों का प्रतिशत मात्र 7% और NSE 500 कंपनियों में 5% है।
- टोकनवाद की समस्या: कंपनी बोर्डों पर कम-से-कम एक महिला निदेशक नियुक्त करने का प्रावधान प्रायः न्यूनतम अनुपालन तक सीमित रहता है।
- प्रभावी भागीदारी हेतु लगभग 30% प्रतिनिधित्व आवश्यक है, किंतु वर्तमान में महिलाएँ निर्णयों को सार्थक रूप से प्रभावित करने के लिए बहुत कम हैं।
- ग्लास सीलिंग: अदृश्य संस्थागत एवं सामाजिक बाधाएँ महिलाओं को शीर्ष नेतृत्व पदों तक पहुँचने से रोकती हैं।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023): लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण।
- ग्रामीण स्तर पर प्रतिनिधित्व: 20 से अधिक राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं में 50% आरक्षण; लगभग 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि।
- महिला-नेतृत्व वाले व्यवसायों का वित्तपोषण: स्टैंड-अप इंडिया एवं प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (69% लाभार्थी महिलाएँ)।
- मार्गदर्शन: नीति आयोग का महिला उद्यमिता मंच (WEP) नेटवर्किंग एवं मेंटरशिप को प्रोत्साहित करता है।
- लैंगिक बजटिंग: 2025-26 में ₹4.49 लाख करोड़ तक बढ़ी, जिससे महिला-नेतृत्व विकास पर ध्यान केंद्रित हुआ।
प्रमुख चुनौतियाँ
- नियुक्ति एवं पदोन्नति में लैंगिक पक्षपात।
- महिलाएँ असंगठित, कम वेतन एवं असुरक्षित रोजगारों में अधिक केंद्रित।
- अपर्याप्त बाल देखभाल अवसंरचना, सुरक्षा चिंताएँ एवं गतिशीलता सीमाएँ।
- विविधता मानदंडों का कमजोर प्रवर्तन एवं राजनीतिक सुधारों में विलंब।
आगे की राह
- सरकार को वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं खाद्य प्रसंस्करण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर ध्यान देना चाहिए।
- बाल देखभाल अवसंरचना, मातृत्व सहयोग एवं लचीली कार्य व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- समान वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ एवं कार्यस्थल उत्पीड़न की रोकथाम महिलाओं की दीर्घकालिक भागीदारी एवं प्रगति हेतु अनिवार्य है।
स्रोत: IE
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