भारत की लेखा शिक्षा को वैश्विक मानकों के साथ संरेखित करना

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत का वैश्विक वित्तीय प्रणाली के साथ बढ़ता एकीकरण ऐसे पेशेवरों की मांग उत्पन्न कर रहा है, जो अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन ढाँचों जैसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानक (IFRS) तथा यू.एस. जनरली एक्सेप्टेड अकाउंटिंग प्रिंसिपल्स (U.S. GAAP) में दक्ष हों।

पृष्ठभूमि

  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानक (IFRS) एक वैश्विक रूप से स्वीकृत लेखांकन ढांचा है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय लेखा मानक बोर्ड(IASB) द्वारा विकसित किया गया है और जिसका अनुसरण 140 से अधिक देशों में किया जाता है।
  • यू.एस. जनरली एक्सेप्टेड अकाउंटिंग प्रिंसिपल्स (US GAAP) एक नियम-आधारित ढांचा है, जिसे मुख्यतः वित्तीय लेखा मानक बोर्ड(FASB) द्वारा विकसित एवं अनुरक्षित किया जाता है तथा इसका उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका में संचालित या सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा किया जाता है।
  • भारत भारतीय लेखा मानक(Ind AS) का पालन करता है, जो बड़े पैमाने पर IFRS के साथ अभिसरित हैं, किंतु घरेलू नियामक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप इनमें कुछ संशोधन सम्मिलित हैं।
    • फलस्वरूप, वैश्विक मानकों के साथ पूर्ण सामंजस्य (harmonisation) अभी तक प्राप्त नहीं हो पाया है।

वैश्विक वित्तीय भाषा के रूप में लेखांकन

  •  मानकीकृत लेखांकन प्रणालियाँ वैश्विक व्यापार संचालन में तुलनीयता, पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करती हैं।
  • वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में भारत:
    • भारत में लगभग 55% ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) स्थित हैं, जो वैश्विक वित्तीय सेवाओं में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाते हैं।
    • GCCs भारत के निर्यात में 64 अरब डॉलर से अधिक का योगदान देते हैं, जो 2030 तक 110 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
    • भारत में GCC कार्यबल 2030 तक 3.46 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे लगभग 1.3 मिलियन नए रोजगार सृजित होंगे।

भारत में वाणिज्य शिक्षा में अंतर

  •  भारत में वाणिज्य शिक्षा मुख्यतः सैद्धांतिक एवं परीक्षा-केंद्रित है। छात्रों को वैश्विक मानकों के अंतर्गत तैयार वास्तविक वित्तीय विवरणों का सीमित व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होता है।
  • वाणिज्य स्नातकों की रोजगारयोग्यता दर लगभग 62.81% है, जो कौशल असंगति (skills mismatch) को इंगित करती है।
    • अपर्याप्त कौशल-संरेखण भारत की वैश्विक आउटसोर्सिंग एवं वित्तीय केंद्र के रूप में आकर्षण को कम कर सकता है।

पाठ्यक्रम सुधार की आवश्यकता

  •  शिक्षा-उद्योग अंतर का समापन : पाठ्यक्रम को वैश्विक लेखांकन प्रथाओं को समाहित करते हुए उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
  • मानव पूंजी का संवर्धन: भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश तथा सेवा क्षेत्र की वृद्धि का पूर्ण उपयोग करने हेतु कौशल-आधारित शिक्षा आवश्यक है।
  • वैश्विक एकीकरण का समर्थन : अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ सामंजस्य पेशेवरों एवं व्यवसायों की सीमा-पार गतिशीलता को सुगम बनाएगा।

आगे की राह

  •  भारत को एक मिश्रित (हाइब्रिड) लेखांकन शिक्षा मॉडल अपनाना चाहिए, जो घरेलू एवं वैश्विक ढाँचों का समेकन करता हो।
  • इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया(ICAI) तथा विश्वविद्यालयों जैसे नियामक निकायों को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप समय-समय पर पाठ्यक्रम अद्यतन करना चाहिए।
  • परीक्षा-केंद्रित शिक्षा से हटकर अनुप्रयोग-आधारित शिक्षा पर बल दिया जाना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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