भारत का विद्युत क्षेत्र: प्रगति और सुधार

पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा

संदर्भ 

  • भारत का विद्युत क्षेत्र विगत दशक में सतत निवेश, नीतिगत सुधारों और संस्थागत सुदृढ़ीकरण के कारण घाटा-प्रधान प्रणाली से एक अधिक विश्वसनीय एवं क्षमता-संपन्न प्रणाली में परिवर्तित हुआ है।

विद्युत क्षेत्र की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • जनवरी 2026 तक भारत की स्थापित विद्युत क्षमता 520.51 गीगावाट तक पहुँच गई, जबकि FY14 में 4.2% की विद्युत कमी घटकर दिसंबर 2025 तक मात्र 0.03% रह गई।
  • 2024–25 में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत बढ़कर 1,460 किलोवाट-घंटा हो गई, जो ऊर्जा पहुँच और आर्थिक गतिविधि में वृद्धि को दर्शाती है।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) ने FY25 में ₹2,701 करोड़ का लाभ दर्ज किया, जिससे पूर्व के वित्तीय घाटे परिवर्तित हो गए।
  • तकनीकी और वाणिज्यिक हानियाँ (AT&C), जो तकनीकी अक्षमताओं एवं वाणिज्यिक रिसाव के कारण ऊर्जा हानि को दर्शाती हैं, FY14 में 22.62% से घटकर FY25 में 15.04% हो गईं।

भारत का विद्युत क्षेत्र

नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण

  • नवंबर 2025 तक भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 253.96 गीगावाट तक पहुँच गई, जो 2024 की 205.52 गीगावाट से 23% से अधिक की वृद्धि है।
  • सौर ऊर्जा क्षमता 132.85 गीगावाट तक पहुँची, इसके बाद पवन ऊर्जा लगभग 53.99 गीगावाट रही।
  • भारत की वैश्विक स्थिति:
    • सौर ऊर्जा स्थापित क्षमता में विश्व में तीसरे स्थान पर।
    • पवन ऊर्जा स्थापित क्षमता में चौथे स्थान पर।
    • कुल नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता में विश्व में चौथे स्थान पर।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में अग्रणी राज्य: राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक।
  • भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त करना है।

विद्युत क्षेत्र की वृद्धि हेतु सरकारी पहलें

  • दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY): ग्रामीण विद्युतीकरण और फीडर पृथक्करण को सुदृढ़ किया।
  • एकीकृत विद्युत विकास योजना (IPDS): शहरी वितरण अवसंरचना और आईटी-सक्षम प्रणालियों में सुधार।
  • प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य): अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी के माध्यम से सार्वभौमिक घरेलू विद्युतीकरण सुनिश्चित किया।
  • पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): ₹3.03 लाख करोड़ के प्रावधान के साथ DISCOMs की दक्षता और वित्तीय स्थिरता में सुधार का लक्ष्य।

नीतिगत और विनियामक सुधार

  • विद्युत (विलंबित भुगतान अधिभार और संबंधित मामले) नियम, 2022: बकाया देयों के निपटान हेतु संरचित और समयबद्ध तंत्र स्थापित कर DISCOMs की नकदी प्रवाह समस्याओं का समाधान।
  • विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2026: लागत-परावर्तक शुल्क को बढ़ावा देना, क्रॉस-सब्सिडी का युक्तिकरण और बाजार-आधारित विद्युत खरीद को सक्षम करना।
  • राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023–2032): 2032 तक अनुमानित 458 गीगावाट की चरम माँग को पूरा करने हेतु बड़े पैमाने पर निवेश का रोडमैप।

चुनौतियाँ

  • DISCOMs में वित्तीय दबाव: राज्य सरकारों द्वारा कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए उच्च सब्सिडी भार के कारण वितरण कंपनियाँ वित्तीय तनाव का सामना करती हैं।
    • परिचालन अक्षमताएँ जैसे विद्युत चोरी, खराब बिलिंग और कम वसूली दक्षता हानियों को और बढ़ाती हैं।
    • कमजोर वित्तीय स्थिति उनके लिए अवसंरचना में निवेश, समय पर जनरेटरों को भुगतान और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करने की क्षमता को प्रभावित करती है।
  • कोयले पर उच्च निर्भरता: नवीकरणीय ऊर्जा की वृद्धि के बावजूद, भारत में विद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत कोयला है। इससे उच्च कार्बन उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण होता है, जो जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्रभावित करता है।
  • अनियमित नवीकरणीय ऊर्जा: नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत स्वभावतः अनियमित हैं और उनकी परिवर्तनशीलता ग्रिड स्थिरता बनाए रखने और माँग-आपूर्ति संतुलन में चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।
  • शुल्क युक्तिकरण की आवश्यकता: भारत में विद्युत शुल्क लागत-परावर्तक नहीं हैं, क्योंकि उच्च भुगतान करने वाले औद्योगिक उपभोक्ता कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं को सब्सिडी देते हैं।
    • यह क्रॉस-सब्सिडी संरचना मूल्य निर्धारण को विकृत करती है और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती है।

आगे की राह

  • स्मार्ट मीटरिंग और डिजिटल बिलिंग प्रणालियों का तीव्र विस्तार AT&C हानियों को कम करेगा, बिलिंग दक्षता में सुधार करेगा तथा पारदर्शिता बढ़ाएगा।
  • ग्रिड अवसंरचना को सुदृढ़ करना, जिसमें ट्रांसमिशन कॉरिडोर और लचीली उत्पादन क्षमता शामिल है, बढ़ती माँग एवं नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण के प्रबंधन हेतु महत्वपूर्ण है।
  • लक्षित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के साथ लागत-परावर्तक शुल्क को बढ़ावा देना क्रॉस-सब्सिडी को कम करेगा और कमजोर उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

Source: PIB

 

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