महिला आरक्षण अधिनियम, 2023: संवैधानिक दुविधा

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; महिलाओं से जुड़े मुद्दे

संदर्भ

  • महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम) के अंतर्गत महिलाओं का आरक्षण केवल 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके पश्चात होने वाले परिसीमन अभ्यास के बाद ही प्रभावी होगा।
  • यह एक संवैधानिक एवं व्यवस्थागत बाधा उत्पन्न करता है, जिससे 2029 के आम चुनावों में इसका क्रियान्वयन व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है।

महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम) के बारे में

  • पृष्ठभूमि: इसे लोकप्रिय रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 कहा जाता है।
    • संसद द्वारा पारित और सितंबर 2023 में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त।
    • उद्देश्य: विधायिकाओं में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना।
  • मुख्य प्रावधान:
    • लोकसभा (अनुच्छेद 82), राज्य विधानसभाएँ (अनुच्छेद 170), और दिल्ली (एनसीटी) की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण।
    • आरक्षण में अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं को उनके आरक्षण कोटे के भीतर शामिल किया गया है।
  • संवैधानिक संशोधन: अधिनियम द्वारा निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़े गए:
    • अनुच्छेद 330A: लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें।
    • अनुच्छेद 332A: राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें।
    • अनुच्छेद 334A: आरक्षण की अवधि और संचालन संबंधी विवरण।
  • अवधि:
    • आरक्षण प्रारंभ से 15 वर्षों तक जारी रहेगा।
    • संसद इसे आगे भी बढ़ा सकती है।
  • सीटों का परिक्रमण (Rotation of Seats):
    • प्रत्येक परिसीमन के पश्चात आरक्षित सीटों में परिवर्तन होगा(अनुच्छेद 82)।
    • विशिष्ट तंत्र बाद में निर्धारित किया जाएगा।
  • क्रियान्वयन प्रावधान:
    • आरक्षण केवल 2026 के बाद होने वाली प्रथम जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा।
    • अतः यह संभवतः 2031 की जनगणना-आधारित परिसीमन के बाद, 2034 के आम चुनावों से लागू होगा।

क्या आप जानते हैं?

  • प्रथम महिला आरक्षण विधेयक 1996 में प्रस्तुत हुआ।
  • कई बार पुनः प्रस्तुत हुआ, परंतु बार-बार निरस्त हो गया।
  • 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ, पर लोकसभा में नहीं।
  • अंततः 27 वर्षों की परिचर्चा के पश्चात 2023 में महिला आरक्षण अधिनियम पारित हुआ।

महत्व: आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना

  • राजनीतिक गणित: यदि इसे तुरंत वर्तमान 543 लोकसभा सीटों में लागू किया जाए:
    • 181 सीटें केवल महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
    • 181 पुरुष सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में अयोग्य हो जाएंगे।
  • लोकसभा का संभावित विस्तार: परिसीमन के बाद लोकसभा सीटें उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकती हैं (अनुमानित 750–888 सीटें)।
    • इससे 33% आरक्षण बिना वर्तमान पुरुष सांसदों को हटाए संभव होगा।
    • विस्तार के माध्यम से राजनीतिक समायोजन किया जा सकेगा।
  • महत्वपूर्ण कदम:
    • लैंगिक न्याय और राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम।
    • अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत वास्तविक समानता को बढ़ावा।
    • भारत की SDG-5 (लैंगिक समानता) प्रतिबद्धता के अनुरूप।
    • पंचायती राज और नगरपालिकाओं में 33% आरक्षण (73वाँ एवं 74वाँ संशोधन) पर आधारित।

संबंधित चिंताएँ एवं मुद्दे

  • उत्तर–दक्षिण विभाजन:
    • परिसीमन 1976 (42वाँ संशोधन) से स्थगित है और 2001 (84वाँ संशोधन) में आगे बढ़ाया गया।
    • परिसीमन होने पर अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं।
    • जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों का अनुपातिक प्रतिनिधित्व घट सकता है।
  • अधिनियम में डिज़ाइन संबंधी खामियाँ:
    • उच्च सदनों का बहिष्कार: अधिनियम राज्यसभा या राज्य विधान परिषदों पर लागू नहीं होता, जिससे प्रतिनिधित्व में समानता पर प्रश्न उठते हैं।
    • ओबीसी उप-आरक्षण का अभाव: अनुसूचित जाति/जनजाति महिलाओं को अनुपातिक कोटा मिलता है, परंतु बड़ी जनसंख्या हिस्सेदारी के बावजूद ओबीसी महिलाओं के लिए कोई विशेष उप-कोटा नहीं।
  • निर्वाचन क्षेत्रों का परिक्रमण: प्रत्येक आम चुनाव के बाद आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र बदलेंगे। इससे दीर्घकालिक राजनीतिक आधार बनाने में अस्पष्टता उत्पन्न होती है।

आगे की राह: संवैधानिक एवं नीतिगत विकल्प

  • यह विलंब संवैधानिक रूप से अपरिहार्य नहीं है। संसद कर सकती है:
    • आरक्षण को परिसीमन से अलग करने हेतु संविधान संशोधन।
    • वर्तमान निर्वाचन क्षेत्रों में दो चुनाव चक्रों तक आरक्षण लागू।
    • तुरंत लोकसभा का विस्तार कर महिलाओं के लिए सीटें निर्धारित।
    • संघीय विवाद से बचने हेतु राज्यवार सीट आवंटन अस्थायी रूप से स्थिर करना।
  • अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत संसद को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार है।
  • अधिनियम के सार्थक क्रियान्वयन हेतु आवश्यक है:
    • जनगणना और परिसीमन की समयरेखा का स्पष्ट रोडमैप।
    • अंतरिम क्रियान्वयन तंत्र पर विचार।
    • उच्च सदनों तक आरक्षण का विस्तार।
    • ओबीसी उप-आरक्षण की चिंता का समाधान।
    • पारदर्शी परिक्रमण नीति सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष 

  • महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 एक ऐतिहासिक संवैधानिक वादा है। परंतु, इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर संसद ने उस वादे को स्थगित कर दिया है।
  • महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व कम से कम 2034 तक टल जाएगा, जब तक कि सुधारात्मक संवैधानिक कदम न उठाए जाएँ।
  • समानता पर आधारित लोकतंत्र में, लंबा विलंब संवैधानिक प्रतिबद्धता को प्रतीकात्मक विधान में बदलने का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • प्रतिनिधित्व में विलंब, प्रतिनिधित्व से वंचित करने के समान है।

मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के संवैधानिक, राजनीतिक एवं संघीय निहितार्थों का परीक्षण कीजिए।

Source: TH

 

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