पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत के श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन कार्यबल की अधिक वित्तीय समावेशन की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है। यह सामाजिक सुरक्षा, आय संरक्षण और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा उपायों को रोजगार संबंध में समाहित करता है।
भारत की नई श्रम संहिताओं की प्रमुख विशेषताएँ
- वेतन की समान परिभाषा: ‘वेतन’ की मानकीकृत परिभाषा यह सुनिश्चित करती है कि मूल वेतन कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% हो।
- इससे भविष्य निधि (PF), पेंशन और ग्रेच्युटी में अधिक योगदान होता है, जो दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
- सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन: राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन का प्रावधान, जिसके नीचे कोई भी राज्य न्यूनतम वेतन निर्धारित नहीं कर सकता।
- इसका उद्देश्य वेतन असमानताओं को कम करना और निम्न-आय वाले श्रमिकों की रक्षा करना है।
- समय पर भुगतान एवं सीमित कटौतियाँ: वेतन का समय पर भुगतान सुनिश्चित करता है और मनमानी कटौतियों को सीमित करता है।
- इससे आय की स्थिरता बढ़ती है और शोषण की रोकथाम होती है।
- सरल विवाद समाधान: औद्योगिक विवादों के समाधान हेतु न्यायाधिकरण और सुलह के माध्यम से त्वरित तंत्र का निर्माण।
- ट्रेड यूनियनों की मान्यता: प्रतिष्ठानों में वार्ता हेतु यूनियनों की मान्यता के लिए मानदंड निर्धारित करता है।
- नियत-अवधि रोजगार का औपचारिककरण: नियत-अवधि रोजगार को कानूनी मान्यता प्रदान करता है, जिससे स्थायी श्रमिकों के समान लाभ (एक वर्ष बाद ग्रेच्युटी सहित) सुनिश्चित होते हैं।
- छंटनी एवं पुनर्गठन सीमा परिवर्तन: छंटनी और पुनर्गठन के लिए पूर्व सरकारी अनुमोदन की आवश्यकता वाले कर्मचारियों की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 की गई।
- विस्तारित सामाजिक सुरक्षा कवरेज: प्रथम बार गिग वर्कर्स, प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स और असंगठित श्रमिकों को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई।
- भविष्य निधि एवं पेंशन विस्तार: अधिक प्रतिष्ठानों और श्रमिक वर्गों तक कवरेज का विस्तार।
- नियत-अवधि श्रमिकों हेतु ग्रेच्युटी: एक वर्ष की सेवा के बाद पात्रता, जिससे आय संरक्षण सुदृढ़ होता है।
- लाभ पोर्टेबिलिटी: राज्यों और रोजगार के बीच लाभों की पोर्टेबिलिटी सक्षम करता है, जो प्रवासी श्रमिकों के लिए महत्वपूर्ण है।
- बेहतर कार्यस्थल सुरक्षा मानक: विभिन्न सुरक्षा कानूनों को एकीकृत कर सभी क्षेत्रों में लागू एक ढाँचा तैयार करता है।
- कार्य घंटे एवं अवकाश प्रावधान: कार्य परिस्थितियों और अवकाश अधिकारों का मानकीकरण।
- प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा: बेहतर पंजीकरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित करता है।
संरचनात्मक विशेषताएँ एवं व्यापक आर्थिक प्रभाव
- 29 कानूनों का 4 संहिताओं में समेकन: विखंडन को कम करता है और नियोक्ताओं के लिए अनुपालन को सरल बनाता है, साथ ही श्रमिकों के लिए स्पष्टता बढ़ाता है।
- डिजिटल अनुपालन एवं पारदर्शिता: ऑनलाइन पंजीकरण, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख-रखरखाव और एकीकृत लाइसेंसिंग को प्रोत्साहित करता है।
- वित्तीय समावेशन पर ध्यान: वेतन परिभाषाओं को सुदृढ़ कर और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार कर संहिताएँ दीर्घकालिक बचत, सेवानिवृत्ति सुरक्षा, बीमा तक पहुँच एवं आय स्थिरता को बढ़ाती हैं।
- उच्चतर उपभोग: श्रमिकों की आय सामान्यतः घरेलू अर्थव्यवस्था में प्रवाहित होती है।
- बेहतर बचत व्यवहार: सुदृढ़ PF और ग्रेच्युटी संचय दीर्घकालिक वित्तीय संपत्तियों का निर्माण करता है।
- वित्तीय प्रणाली में अधिक भागीदारी: औपचारिक वेतन संरचनाएँ बैंकिंग और संस्थागत जुड़ाव को प्रोत्साहित करती हैं।
भारत की नई श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ
- विलंबित कार्यान्वयन एवं राज्य-स्तरीय तैयारी: यद्यपि संसद ने 2019–2020 में चार संहिताएँ पारित कीं, इनके पूर्ण प्रवर्तन से पूर्व राज्यों को नियम बनाने की आवश्यकता है।
- भारत के संविधान के अंतर्गत श्रम एक समवर्ती विषय है, जिसका अर्थ है कि इस पर केंद्र और राज्य दोनों विधायन करते हैं।
- कार्यान्वयन क्षमता एवं प्रवर्तन अंतराल: निरीक्षक-आधारित व्यवस्था से ‘निरीक्षक-सह-प्रवर्तक’ मॉडल की ओर बदलाव का उद्देश्य उत्पीड़न को कम करना और अनुपालन को बढ़ावा देना है।
- अन्य चिंताओं में श्रम विभागों में सीमित स्टाफिंग, डिजिटल अवसंरचना की कमी और कमजोर निगरानी तंत्र शामिल हैं।
- गिग एवं असंगठित श्रमिकों हेतु सामाजिक सुरक्षा वित्तपोषण: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अंतर्गत गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को औपचारिक मान्यता दी गई है।
- उद्योग की लागत संबंधी चिंताएँ: वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत संशोधित वेतन परिभाषा यह सुनिश्चित करती है कि मूल वेतन कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% हो।
- ट्रेड यूनियन विरोध एवं राजनीतिक प्रतिरोध: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के अंतर्गत:
- छंटनी हेतु पूर्व सरकारी अनुमोदन की सीमा बढ़ाई गई।
- हड़तालों के लिए कठोर शर्तें लागू की गईं।
- ट्रेड यूनियन का तर्क है कि ये प्रावधान सामूहिक सौदेबाज़ी की शक्ति को कमजोर करते हैं।
- असंगठित क्षेत्र का एकीकरण जटिलता: भारत का कार्यबल मुख्यतः असंगठित है।
- इतने विशाल एवं विविध श्रमबल का औपचारिककरण संरचनात्मक चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, जैसे दस्तावेज़ों की कमी, प्रवासी गतिशीलता, सीमित वित्तीय साक्षरता और छोटे उद्यमों में नियोक्ता प्रतिरोध।
- जागरूकता एवं वित्तीय साक्षरता की कमी: अनेक श्रमिक भविष्य निधि (सेवानिवृत्ति बचत योजना), ग्रेच्युटी (सेवा उपरांत लाभ), बीमा और कल्याणकारी योजनाओं के संबंध में अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं।
- लक्षित जागरूकता अभियानों के अभाव में लाभों का उपयोग सीमित रह सकता है।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर अनुपालन भार का जोखिम: MSMEs डिजिटल अनुपालन आवश्यकताओं, अभिलेख-रखरखाव दायित्वों और उच्च सामाजिक सुरक्षा योगदान की लागत का सामना कर सकते हैं।
भारत की श्रम संहिताओं के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु प्रमुख सुझाव
- समयबद्ध एवं समान राज्य कार्यान्वयन सुनिश्चित करें: चूँकि श्रम एक समवर्ती विषय है, संहिताओं के पूर्ण रूप से लागू होने से पूर्व राज्यों को अपने नियम बनाने होंगे।
- राज्य नियम अधिसूचना हेतु स्पष्ट समयसीमा निर्धारित करें।
- समानता हेतु अंतर-राज्यीय समन्वय को प्रोत्साहित करें।
- विविधता को न्यूनतम करने हेतु मॉडल नियम विकसित करें।
- प्रशासनिक एवं डिजिटल क्षमता को सुदृढ़ करें: डिजिटल अनुपालन और निरीक्षक-सह-प्रवर्तक मॉडल हेतु सशक्त अवसंरचना आवश्यक है।
- श्रम विभागों में स्टाफिंग एवं प्रशिक्षण को उन्नत करें।
- पंजीकरण एवं रिपोर्टिंग हेतु एकीकृत डिजिटल पोर्टल में निवेश करें।
- जोखिम-आधारित निरीक्षणों के लिए डेटा विश्लेषण का उपयोग करें।
- गिग श्रमिकों हेतु सतत वित्तपोषण ढाँचा तैयार करें: गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों का समावेश परिवर्तनकारी है, किंतु वित्तपोषण तंत्र स्पष्ट और व्यवहार्य होना चाहिए।
- एग्रीगेटरों हेतु पारदर्शी योगदान सूत्र परिभाषित करें।
- सह-योगदान मॉडल (सरकार, प्लेटफ़ॉर्म एवं श्रमिक संयुक्त रूप से) लागू करें।
- गिग श्रमिकों हेतु केंद्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष स्थापित करें।
- श्रमिक कल्याण एवं उद्योग प्रतिस्पर्धा में संतुलन: वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत संशोधित वेतन परिभाषा सामाजिक सुरक्षा योगदान बढ़ाती है।
- MSMEs हेतु संक्रमणकालीन अनुपालन अवधि प्रदान करें।
- उच्च सामाजिक सुरक्षा अनुपालन हेतु कर प्रोत्साहन दें।
- वेतन घटकों के चरणबद्ध पुनर्गठन को प्रोत्साहित करें।
- श्रमिक जागरूकता एवं वित्तीय साक्षरता बढ़ाएँ: कानूनी अधिकार प्रभावी पहुँच की गारंटी नहीं देते।
- राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान चलाएँ।
- PF, पेंशन एवं ग्रेच्युटी लाभों का संप्रेषण सरल बनाएँ।
- कौशल कार्यक्रमों में श्रम अधिकार शिक्षा को समाहित करें।
- सामाजिक संवाद के माध्यम से विश्वास निर्माण करें: ट्रेड यूनियनों का विरोध सहभागी शासन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- त्रिपक्षीय परामर्श (सरकार, नियोक्ता एवं श्रमिक) को संस्थागत करें।
- पारदर्शी कार्यान्वयन रिपोर्ट प्रकाशित करें।
- शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करें।
- असंगठित क्षेत्र एकीकरण पर ध्यान दें: भारत का कार्यबल मुख्यतः असंगठित है, जिससे औपचारिककरण एक संरचनात्मक चुनौती है।
- छोटे उद्यमों हेतु पंजीकरण प्रक्रियाएँ सरल बनाएँ।
- पोर्टेबिलिटी हेतु आधार-लिंक्ड डिजिटल पहचान प्रणाली का उपयोग करें।
- असंगठित व्यवसायों के लिए ऑनबोर्डिंग प्रोत्साहन प्रदान करें।
- प्रभाव का समय-समय पर मूल्यांकन एवं निगरानी करें: सुधार साक्ष्य-आधारित एवं अनुकूलनीय होना चाहिए।
- समय-समय पर प्रभाव आकलन स्थापित करें।
- वेतन अनुपालन एवं सामाजिक सुरक्षा कवरेज पर वास्तविक समय डेटा एकत्र करें।
- आवश्यकतानुसार मध्य-पथ सुधार की अनुमति दें।
निष्कर्ष
- भारत की श्रम संहिताओं को केवल नियामक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि वित्तीय समावेशन की दिशा में एक संरचनात्मक हस्तक्षेप के रूप में समझा जाना चाहिए।
- ये संहिताएँ वेतन परिभाषाओं में सुधार, नियत-अवधि श्रमिकों तक ग्रेच्युटी का विस्तार, गिग एवं असंगठित श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान सुनिश्चित कर आय सुरक्षा, वित्तीय गरिमा तथा आर्थिक मूल्य के अधिक न्यायसंगत वितरण को बढ़ावा देती हैं।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत की नई श्रम संहिताओं के अंतर्गत वेतन की पुनर्परिभाषा श्रमिकों के लिए वित्तीय समावेशन और दीर्घकालिक आय सुरक्षा की दिशा में एक संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाती है। विवेचना कीजिए। |
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