जलवायु शासन की स्थिति: भारत और विश्व

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • वैश्विक जलवायु शासन को हाल के वर्षों में बार-बार असफल रही अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं, विशेषकर हाल की पार्टियों के सम्मेलन (COPs) के कारण नया ध्यान मिला है।
  • COP30 ने इस धारणा को सुदृढ़ किया कि जलवायु महत्वाकांक्षा और वास्तविक कार्रवाई के बीच के अंतर में निरंतर वृद्धि हो रही है, जबकि UNFCCC के अंतर्गत दशकों से वार्ताएँ चल रही हैं।

वैश्विक जलवायु शासन के बारे में

  • यह मुख्य रूप से UNFCCC में निहित है, जिसे क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते जैसे साधनों के माध्यम से लागू किया गया है तथा COP बैठकों द्वारा प्रशासित किया जाता है।
  • यह राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने पर अत्यधिक निर्भर करता है।
  • ये ढाँचे लगभग सार्वभौमिक भागीदारी प्रदान करते हैं।

वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की संभावनाएँ

  • UNEP की उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2024 के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग 57.4 GtCO₂e तक पहुँच गया, जो अब तक का सबसे अधिक है।
    • वर्तमान प्रवृत्ति के अनुसार, विश्व 2030 के शुरुआती वर्षों में ही 1.5°C की सीमा पार कर देगा।
  • वर्तमान शासन प्रणाली बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं, लागू अनुपालन तंत्र और पर्याप्त वित्त के अभाव में केवल वार्ता का मंच बनकर रह जाने का जोखिम उठाती है।
    • विकासशील देशों को शमन और अनुकूलन हेतु प्रति वर्ष $2.4–3 ट्रिलियन की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान जलवायु वित्त प्रवाह $400 बिलियन से कम है।
  • COP30 ने उत्साहवर्धन तो दिया, परंतु कोई बाध्यकारी समयसीमा, योगदानकर्ता या पैमाने की स्पष्टता नहीं दी।
  • भविष्यवाणियाँ बताती हैं कि यदि संरचनात्मक परिवर्तन नहीं हुए, तो जलवायु शासन महत्वाकांक्षी भाषा तो उत्पन्न करेगा, पर उत्सर्जन, कमजोरियाँ और असमानताएँ समानांतर रूप से बढ़ती रहेंगी।

भारत एवं जलवायु शासन

  • भारत UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते का हस्ताक्षरकर्ता है तथा अद्यतन NDCs प्रस्तुत कर चुका है।
  • भारत की प्रतिबद्धताएँ:
    • 2005 के स्तर से 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी।
    • 2030 तक लगभग 50% संचयी स्थापित विद्युत क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से।
    • 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन।
  • भारत ने सौर और पवन ऊर्जा में उल्लेखनीय प्रगति की है और सौर तैनाती में वैश्विक नेता के रूप में उभरा है।
  • फिर भी विकास आवश्यकताओं, कोयला निर्भरता, शहरीकरण और औद्योगिक वृद्धि के कारण कुल उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है।

वैश्विक जलवायु शासन से जुड़ी चिंताएँ

  • राजनीति बनाम तात्कालिकता: राष्ट्रीय हित सामूहिक कार्रवाई पर प्रभुत्वशाली रहते हैं। सर्वसम्मति निर्णय-प्रक्रिया प्रत्येक देश को प्रभावी रूप से वीटो देती है।
  • विज्ञान बनाम राजनीति: समस्या वैज्ञानिक अनिश्चितता नहीं, बल्कि राजनीतिक अनिश्चितता का उपयोग है।
    • राजनीतिक चक्र बनाम दीर्घकालिक संकट: अल्पकालिक राजनीतिक चक्रों में दीर्घकालिक संकट का शासन असमाधित विरोधाभास है।
  • अवसरवादी अर्थशास्त्र: बाज़ार अल्पकालिक लाभ को पुरस्कृत करते हैं, दीर्घकालिक स्थिरता को नहीं।
  • नागरिकों का हाशियाकरण: अधिकांश लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन तब तक अमूर्त है जब तक आपदा न घटे।
  • अनिश्चितता का दुरुपयोग: राजनीतिक रूप से अनिश्चितता का उपयोग देरी और जिम्मेदारी टालने हेतु किया जाता है।
  • न्याय तंत्र की अपर्याप्तता: हानि और क्षति  कोष विद्यमान है, पर वित्तीय रूप से नगण्य है।

संबंधित प्रयास एवं पहल

  • शमन : देशों से महत्वाकांक्षा बढ़ाने का आग्रह किया गया, पर कोई नई बाध्यकारी प्रतिबद्धता नहीं बनाई गई।
    • यहाँ तक कि जीवाश्म ईंधन से संबंधित स्पष्ट भाषा भी बाध्यकारी पाठ में शामिल नहीं हो सकी।
  • जलवायु वित्त : विकासशील देशों के लिए आवश्यकता प्रति वर्ष $2.4–3 ट्रिलियन आंकलन किया गया।
    • वर्तमान प्रवाह $400 बिलियन से कम है, और इस पर कोई सहमति नहीं है कि कौन, कितना और कब भुगतान करेगा।
  • अनुकूलन : अनुकूलन वित्त को ‘तीन गुना’ करने की प्रतिज्ञाएँ की गईं, परंतु इनमें आधाररेखाएँ, समयसीमाएँ या बाध्यकारी स्रोत नहीं थे, जिससे ये केवल आकांक्षात्मक रह गईं।
  • हानि एवं क्षति: एक नया कोष औपचारिक रूप से संचालित किया गया, पर पूंजीकरण सीमित रहा और अनुमानित आवश्यकताओं से बहुत कम।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं क्षमता निर्माण: नए प्लेटफ़ॉर्म और कार्यक्रम घोषित किए गए, पर वास्तविक प्रभाव के लिए आवश्यक वित्तीय समर्थन का अभाव रहा।
  • न्यायसंगत संक्रमण : अधिकारों और सिद्धांतों को स्वीकार किया गया, पर बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं या संसाधनों का प्रावधान नहीं हुआ जिससे व्यवहार में न्याय सुनिश्चित हो सके।
  • COP30 ने वही दिया जिसके लिए यह संरचनात्मक रूप से तैयार था:
    • ‘ग्लोबल मुतिराओ’ पैकेज सहयोग और एकजुटता पर बल देता है, पर अधिकांशतः स्वैच्छिक ही रहा।
    • अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने का आह्वान किया गया, पर बिना आधाररेखाओं, वित्तीय स्रोतों या बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं के।
    • हानि और क्षति  कोष का औपचारिक संचालन हुआ, पर पूंजीकरण सीमित रहा।
    • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और न्यायसंगत संक्रमण पर नए प्लेटफ़ॉर्म और कार्यक्रम घोषित हुए, जो भाषा में समृद्ध पर संसाधनों में गरीब रहे।
    • विस्तारित ढाँचे और संकेतक बनाए गए, जो अक्सर जल्दबाज़ी में तैयार हुए तथा वित्तीय योजनाओं से असंबद्ध रहे।

भारत की पहलें

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC): आठ राष्ट्रीय मिशन, जिनमें सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल, कृषि और सतत आवास शामिल हैं।
  • राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजनाएँ (SAPCCs): उप-राष्ट्रीय जलवायु शासन के लिए ढाँचे, यद्यपि कार्यान्वयन में भिन्नता पाई जाती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत-नेतृत्व वाली पहल, जो विकासशील देशों में सौर ऊर्जा तैनाती को बढ़ावा देती है।
  • पर्यावरण हेतु जीवनशैली (LiFE): व्यवहार परिवर्तन पर आधारित पहल, जो सतत उपभोग पर बल देती है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: उद्योग और परिवहन को डीकार्बोनाइज करने तथा भविष्य-उन्मुख ऊर्जा प्रणालियाँ विकसित करने का लक्ष्य।
  • जलवायु वित्तीय साधन: ग्रीन बॉन्ड और मिश्रित वित्त का उपयोग, यद्यपि पैमाना अभी भी सीमित है।

आगे की राह 

  • अपनी कमियों के बावजूद UNFCCC और COP प्रक्रिया अपरिहार्य बनी हुई है। कोई वैकल्पिक मंच, चाहे वह G7, G20, BRICS या अस्थायी गठबंधन हों, समान सार्वभौमिकता, वैधता या कानूनी आधार प्रदान नहीं करता। जलवायु स्थिरता की आवश्यकता स्पष्ट है।
  • प्रमुख सुधार:
    • स्वैच्छिकता से आगे बढ़ना : उत्सर्जन कटौती और वित्त पर बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ आवश्यक हैं, केवल औपचारिक प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं।
    • निर्णय-प्रक्रिया की समीक्षा : सर्वसम्मति को सार्वभौमिक वीटो के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए। प्रगति हेतु लचीले मतदान तंत्र आवश्यक हो सकते हैं।
    • वित्त को बाध्यता में जोड़ना: जलवायु वित्त को प्रतिज्ञाओं से हटाकर पूर्वानुमेय, जिम्मेदारी और क्षमता से जुड़े आकलित योगदानों में बदलना होगा।
    • अनुकूलन एवं हानि-क्षति को प्राथमिकता : जैसे-जैसे तापवृद्धि तीव्र होती है, सभी देशों को अनुकूलन हेतु तैयार रहना होगा, चाहे वैश्विक समझौते सफल हों या नहीं।
    • नागरिकों को केंद्र में लाना : जलवायु नीति को दैनिक आजीविका से जोड़ना होगा, जिससे नागरिक हितधारक बनें, न कि बाद में विचार किए जाने वाले।
    • सामान्य परंतु भिन्न जिम्मेदारियों का पुनः प्रतिपादन (CBDR): विकसित देशों को ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी और पूर्वानुमेय वित्त एवं प्रौद्योगिकी समर्थन प्रदान करना होगा।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
प्रश्न:  वैश्विक जलवायु शासन की प्रमुख संरचनात्मक कमजोरियों और भारत की जलवायु नीति दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिए। जलवायु शासन को अधिक प्रभावी और जन-केंद्रित बनाने हेतु उपाय सुझाइए।

Source: TH

 

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