सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार से ‘नस्लीय अपमानजनक टिप्पणी’ को घृणा अपराध(Hate Crime) के रूप में मान्यता देने की याचिका पर विचार करने का अनुरोध 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें ‘नस्लीय अपमानजनक टिप्पणी’ को घृणा अपराध की एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता देने हेतु व्यापक दिशा-निर्देशों की मांग की गई थी।
    • न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि से याचिका पर विचार करने और इसे उपयुक्त प्राधिकरण को संदर्भित करने का अनुरोध किया।

घृणा अपराध क्या हैं?

  • घृणा अपराध वे अपराध हैं जो किसी व्यक्ति को उसकी विकलांगता, नस्ल या जातीयता, धर्म या विश्वास, यौन अभिविन्यास, लैंगिक पहचान आदि के प्रति शत्रुता या पूर्वाग्रह के कारण लक्षित करते हैं।
  • भारत में “घृणा अपराध” शब्द को कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है, किंतु ऐसे कृत्य भारतीय दंड संहिता (IPC) और अब भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दंडनीय हैं।

घृणा अपराधों का प्रभाव

  • सामाजिक मुद्दे: यह समुदायों के बीच विभाजन को गंभीर करता है और दीर्घकालिक सामाजिक एकता को बाधित करता है। बार-बार होने वाले घृणात्मक कथानक भीड़ हिंसा, दंगे और लक्षित हमलों में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • संवैधानिक मूल्यों का क्षरण: यह संविधान में निहित समानता, बंधुत्व और गरिमा के सिद्धांतों को चुनौती देता है।
  • यह धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करता है, जो भारत की संवैधानिक नैतिकता का एक प्रमुख स्तंभ है।
  • भय और हाशियाकरण: बार-बार घृणा घटनाओं का शिकार होने वाले समुदाय भय, बहिष्कार और अवसरों तक सीमित पहुँच का अनुभव करते हैं, जिससे सामाजिक सद्भावना को हानि पहुँचती है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समानता: सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है।
  • अनुच्छेद 19(2): भारतीय संविधान का यह प्रावधान अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जा सकने वाले युक्तिसंगत प्रतिबंधों से संबंधित है।
    • जिन परिस्थितियों में राज्य भाषण को प्रतिबंधित कर सकता है: राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए उकसाना।
  • अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार: गरिमा, सुरक्षा और संरक्षा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 25 – धर्म की स्वतंत्रता: अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म का स्वतंत्र रूप से पालन, आचरण एवं प्रचार सुनिश्चित करता है।

घृणा भाषण से निपटने में चुनौतियाँ

  • तेज़ डिजिटल प्रसार: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म घृणा भाषण को तीव्रता से फैलने और बिना तथ्य-जांच के बड़े दर्शकों तक पहुँचने में सक्षम बनाते हैं।
  • एन्क्रिप्टेड संदेश सेवाएँ: निगरानी और साक्ष्य संग्रहण को जटिल बनाती हैं।
  • प्रयोजन को सिद्ध करने में कठिनाई: कई घृणा भाषण अपराधों में प्रयोजन को सिद्ध करना आवश्यक होता है, जो स्थापित करना कठिन है।
  • भाषण और हिंसा के बीच सीधा संबंध स्थापित करना: कानूनी रूप से जटिल है।
  • कानूनी परिभाषा का अभाव: भारत में घृणा भाषण और अपराध की सटीक वैधानिक परिभाषा का अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक व्याख्या एवं राज्यों में असंगत प्रवर्तन होता है।

घृणा अपराधों से निपटने के लिए उठाए गए कदम

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) / भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: धारा 153A, धारा 295A आदि जैसी विशिष्ट धाराएँ समूहों (धर्म, नस्ल, भाषा) के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को आहत करने या सार्वजनिक भय/अव्यवस्था भड़काने को अपराध घोषित करती हैं।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3), 123(3A): चुनावों के दौरान घृणा फैलाने या धर्म, जाति, समुदाय का हवाला देने वाले राजनीतिक भाषणों को निषिद्ध करती हैं।
  • प्रवासी कल्याण संगठन बनाम भारत संघ (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने घृणा भाषण पर विशिष्ट कानून की कमी को स्वीकार किया और संसद को इस मुद्दे पर व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की।
  • अमिश देवगन बनाम भारत संघ (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) और सार्वजनिक व्यवस्था व सामुदायिक सद्भाव बनाए रखने हेतु घृणा भाषण पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता के बीच संतुलन पर विचार किया।

आगे की राह

  • भारत को घृणा भाषण और अपराध की स्पष्ट एवं व्यापक कानूनी परिभाषा अपनानी चाहिए ताकि राज्यों में एकरूप एवं वस्तुनिष्ठ प्रवर्तन सुनिश्चित हो सके।
  • डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के लिए सुदृढ़ जवाबदेही तंत्र आवश्यक है ताकि वे हानिकारक सामग्री को शीघ्रता से हटा सकें।
  • ऑनलाइन हानियों के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र, बेहतर डेटा संग्रहण और अनुसंधान के साथ मिलकर साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों को डिज़ाइन करने में सहायता कर सकता है और भारत की समानता, गरिमा एवं सामाजिक एकता के प्रति प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर सकता है।

स्रोत: TH

 

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