पाठ्यक्रम: GS1/भारतीय विरासत और संस्कृति
संदर्भ
- भारत की विश्वगुरु (वैश्विक शिक्षक) बनने की आकांक्षा के लिए मौलिक भारतीय विचारों का सृजन और उनका ऐसा अनुकूलन आवश्यक है जो वैश्विक विमर्श को आकार दे सके।
भारत की विश्वगुरु (वैश्विक शिक्षक) बनने की आकांक्षा
- भारत की विश्वगुरु बनने की आकांक्षा उसकी सभ्यतागत भावना, दार्शनिक विरासत और उभरती वैश्विक भूमिका में गंभीरता से निहित है।
- ऐतिहासिक रूप से भारत अध्यात्म और विद्वता की भूमि रहा है तथा नालंदा, तक्षशिला एवं विक्रमशिला जैसे केंद्रों के माध्यम से सार्वभौमिक ज्ञान प्रणालियों का प्रकाशस्तंभ रहा है।
- आधुनिक संदर्भ में, विश्वगुरु शब्द भारत की उस महत्वाकांक्षा को दर्शाता है जिसमें शांति, स्थिरता और नैतिक शासन जैसे क्षेत्रों में वैश्विक विचारों का मार्गदर्शन करना शामिल है, जहाँ प्राचीन ज्ञान को आधुनिक नवाचार के साथ जोड़ा जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक आधार
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अनुसार, भारतीय सभ्यता ने फारस से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक एशिया की बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया।
- गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शन में भारत के योगदान ने वैश्विक ज्ञान प्रणालियों की नींव रखी।
- उपनिषद और भगवद गीता जैसे प्राचीन ग्रंथ सार्वभौमिक मूल्यों पर बल देते हैं, जैसे “वसुधैव कुटुम्बकम्” (संपूर्ण विश्व एक परिवार है), जो आज भारत की विश्वगुरु दृष्टि का नैतिक आधार बनते हैं।
- अन्य बौद्धिक विरासतें:
- आर्यभट और भास्कर ने गणित और खगोलशास्त्र में क्रांति की।
- चाणक्य का अर्थशास्त्र राज्य संचालन और आर्थिक शासन का संहिताकरण करता है।
- जे.सी. बोस, सी.वी. रमन और एस.एन. बोस ने वैश्विक विज्ञान को नया रूप दिया।
आधुनिक दृष्टि: ज्ञान अर्थव्यवस्था से ज्ञान सभ्यता तक
- भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाएँ ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था’ से ‘ज्ञान सभ्यता’ की ओर संक्रमण के रूप में देखी जाती हैं।
- यह नैतिक शिक्षा, विज्ञान और आध्यात्मिक संतुलन के एकीकरण पर बल देती है।
- भारत का विश्वगुरु मॉडल संवाद को बढ़ावा देता है, जहाँ नेतृत्व नैतिक अधिकार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से किया जाता है, न कि आर्थिक दबाव से।
- यह वेदांत, योग और बहुलवाद जैसी भारत की सभ्यतागत विरासतों को सॉफ्ट पावर उपकरण के रूप में उपयोग करता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भारत को वैश्विक शैक्षिक केंद्र में बदलने की परिकल्पना करती है, जिसमें विश्वविद्यालयों का अंतरराष्ट्रीयकरण, वैश्विक छात्रों को आकर्षित करना और योग, आयुर्वेद तथा संस्कृत अध्ययन जैसी स्वदेशी शिक्षा प्रणालियों का पुनरुद्धार शामिल है।
- यह बौद्धिक आधुनिकीकरण को सांस्कृतिक जड़ों के साथ जोड़कर विश्वगुरु मिशन के अनुरूप है।
प्रमुख चिंताएँ और संरचनात्मक चुनौतियाँ
- शिक्षा और अनुसंधान की कमी: भारत का R&D निवेश GDP का 1% से कम है (यूनेस्को विज्ञान रिपोर्ट, 2024), जो अमेरिका या चीन जैसे वैश्विक नेताओं से काफी कम है।
- वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में शीर्ष 200 में भारतीय विश्वविद्यालयों का सीमित प्रतिनिधित्व है।
- ब्रेन ड्रेन अभी भी महत्वपूर्ण है, जहाँ शीर्ष STEM प्रतिभाएँ विदेश चली जाती हैं।
- वैश्विक छवि और लोकतांत्रिक गिरावट: प्रेस स्वतंत्रता, धार्मिक ध्रुवीकरण और न्यायिक स्वतंत्रता पर चिंताएँ भारत की नैतिक ‘शिक्षक’ के रूप में विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती हैं।
- फ्रीडम हाउस और V-Dem संस्थान की रिपोर्टें भारत को ‘चुनावी अधिनायकवाद’ कहती हैं, जिससे इसकी सॉफ्ट पावर कथा कमजोर होती है।
- सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ: लगातार असमानता और ग्रामीण अविकास भारत के वैश्विक नेतृत्व के दावे को चुनौती देते हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2024 शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल संसाधनों तक असमान पहुँच को रेखांकित करता है।
- प्रौद्योगिकी और नवाचार की कमी: अंतरिक्ष और डिजिटल नीति में प्रगति के बावजूद, भारत AI नैतिकता, साइबर सुरक्षा और डेटा स्थानीयकरण चुनौतियों का सामना करता है।
- सतत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की कमी भारत की तकनीकी प्राधिकरण को सीमित करती है।
- विदेश नीति और रणनीतिक संतुलन: गुटनिरपेक्षता बनाए रखते हुए अमेरिका-नेतृत्व वाले और BRICS समूहों से जुड़ना दुविधाएँ उत्पन्न करता है।
- यूक्रेन, इज़राइल-गाज़ा और चीन पर भारत का सतर्क दृष्टिकोण इसकी नैतिक प्राधिकरण को कमजोर कर सकता है।
- सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर बनाम राजनीतिक संदेश: संस्कृति का अत्यधिक व्यावसायीकरण और अध्यात्म का राजनीतिकरण, जबकि योग कूटनीति एवं आयुर्वेद प्रचार प्रभाव बढ़ाते हैं।
- सांस्कृतिक शिक्षा और वैचारिक निर्यात के बीच की रेखा तेजी से अस्पष्ट हो रही है।
संबंधित प्रयास और कदम
- शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण: NEP 2020 भारत को विश्वगुरु बनाने की नींव रखता है। इसमें योग, आयुर्वेद और संस्कृत जैसी भारतीय ज्ञान प्रणालियों को सॉफ्ट पावर उपकरण के रूप में महत्व दिया गया है।
- विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- भारतीय विश्वविद्यालयों का विदेशों में विस्तार।
- अंतरराष्ट्रीय छात्र विनिमय और अनुसंधान सहयोग।
- भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) प्रभाग, शिक्षा मंत्रालय: यह दर्शन, विज्ञान और कला जैसी पारंपरिक भारतीय विधाओं को आधुनिक पाठ्यक्रम में एकीकृत करता है।
- “भारतीय ज्ञान परंपरा” अनुसंधान केंद्रों की स्थापना।
- योग और आयुर्वेद पर वैश्विक सम्मेलन।
- यूनेस्को के साथ विरासत ज्ञान पर साझेदारी।
- G20 अध्यक्षता और ग्लोबल साउथ नेतृत्व: भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान समानता, स्थिरता और समावेशी विकास की वकालत करते हुए नैतिक एवं बौद्धिक नेतृत्व की स्थिति बनाई।
- ‘विश्वगुरु कथा’ भारत की वैश्विक कूटनीति में निहित थी, जिसमें वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे प्राचीन सिद्धांतों को उजागर किया गया।
- सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक योग दिवस: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (190+ देशों में मनाया जाता है) और वैक्सीन मैत्री भारत की विश्वगुरु आकांक्षा के प्रमुख सॉफ्ट पावर उपकरण हैं।
- यह वैश्विक स्वास्थ्य और पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से भारत के योगदान को प्रदर्शित करता है।
- स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम: इसका लक्ष्य 2,00,000 अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करना है। यह छात्रवृत्तियाँ प्रदान करता है और भारतीय विश्वविद्यालयों को सस्ती, उच्च गुणवत्ता वाले विकल्प के रूप में बढ़ावा देता है।
- अफ्रीकी और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी भारत की विश्वगुरु कूटनीति के अनुरूप है।
- डिजिटल विश्वविद्यालय और वैश्विक ओपन एक्सेस: राष्ट्रीय डिजिटल विश्वविद्यालय परियोजना वैश्विक शिक्षार्थियों को भारतीय शिक्षा ऑनलाइन उपलब्ध कराती है।
- भारतीय दर्शन, नैतिकता और विज्ञान पर आधारित बहुभाषी पाठ्यक्रमों पर ध्यान।
- सांस्कृतिक पुनरुद्धार और सभ्यतागत कूटनीति: ‘देखो अपना देश’ जैसी पहलें सभ्यतागत निरंतरता को बढ़ावा देती हैं।
- ICCR और MEA के बीच सहयोग से भारतीय प्रदर्शन कलाओं, साहित्य एवं शिल्प का वैश्विक निर्यात।
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को ज्ञान निर्यात के रूप में: मिशन इनोवेशन 2.0, इसरो की शैक्षिक पहुँच और AI व डिजिटल शासन पर सहयोग भारत को ज्ञान प्राप्तकर्ता से ज्ञान निर्माता में बदलने का संकेत देते हैं।
वैश्विक नेतृत्व का वास्तविक मापदंड
- वे राष्ट्र जो वैश्विक विमर्श की भाषा को परिभाषित करते हैं, कल्पना की सीमाओं को आकार देते हैं।
- ब्रिटेन का प्रभुत्व उदार राजनीतिक अर्थव्यवस्था के निर्यात और नौसैनिक शक्ति पर आधारित था।
- संयुक्त राज्य अमेरिका ने यथार्थवाद और उदार संस्थागतवाद को आगे बढ़ाकर नेतृत्व किया।
- चीन ने तियानशिया और डिजिटल संप्रभुता जैसे अपने बौद्धिक निर्माणों को प्रस्तुत किया, ताकि पश्चिमी सार्वभौमिकताओं को चुनौती दी जा सके।
आगे की राह
- शैक्षिक पुनर्जागरण: R&D में GDP का ≥3% निवेश; वैश्विक सहयोग के साथ NEP 2020 के क्रियान्वयन में सुधार।
- समावेशी विकास: ग्रामीण डिजिटल साक्षरता, महिलाओं की भागीदारी और युवा उद्यमिता को प्राथमिकता देना।
- मूल्य-आधारित कूटनीति: विदेश नीति को गांधीवादी नैतिकता और बहुपक्षीय सहयोग में आधारित करना।
- सभ्यतागत आधुनिकता: भारत के प्राचीन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और स्थिरता के साथ संगत रूप में प्रस्तुत करना।
- संस्थागत विश्वसनीयता: भारत की ‘विश्वगुरु’ दृष्टि की वैधता बढ़ाने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करना।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न[प्रश्न] भारत की विश्वगुरु बनने की आकांक्षा को साकार करने में स्वदेशी भारतीय विचारों की भूमिका की जाँच कीजिए। भारत वैश्विक विचारों का उपभोक्ता होने से आगे बढ़कर किस प्रकार वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली ज्ञान का उत्पादक बन सकता है? |
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