पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- विश्व अब किसी एक महाशक्ति द्वारा संचालित नहीं है, बल्कि यह तीव्रता से संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच पुनः उभरती द्विध्रुवीय गतिशीलता से आकार ले रही है। साथ ही यह अधिक बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है, जो गहन बहुपक्षवाद की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वैश्विक गतिशीलता के बारे में
- वैश्विक गतिशीलता शीत युद्ध की कठोर द्विध्रुवीयता से बदलकर एक बहुध्रुवीय व्यवस्था में परिवर्तित हो गई है, जिसकी विशेषता है:
- आर्थिक परस्पर निर्भरता
- रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता
- तकनीकी विघटन
| तुलनात्मक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य | |||
| अवधि | निर्धारक वैश्विक प्रवृत्तियाँ | शक्ति का केंद्र | वैश्विक प्रणाली |
| 1945–1991 | शीत युद्ध द्विध्रुवीयता | USA, USSR | वैचारिक मतभेद |
| 1991–2008 | एकध्रुवीय उदार व्यवस्था | USA & NATO | आर्थिक वैश्वीकरण |
| 2008–2020 | बहुध्रुवीयता का उदय | चीन, भारत, रूस | आर्थिक राष्ट्रवाद |
| 2020–Present | असंगठित परस्पर निर्भरता | BRICS+, EU, क्षेत्रीय गठबंधन | टेक्नोलॉजी-संचालित, AI-केंद्रित, बहुकेंद्रीय |
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य (2025)
- प्रतिस्पर्धी बहुध्रुवीयता: राज्य वैश्विक संस्थानों के बजाय मिनीलेटरल मंचों (जैसे QUAD, SCO) के माध्यम से स्वार्थ साधते हैं।
- रणनीतिक टेक्नो-नेशनलिज़्म: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और ऊर्जा प्रौद्योगिकियाँ भू-राजनीतिक प्रभाव निर्धारित करती हैं।
- पर्यावरणीय कूटनीति: जलवायु परिवर्तन और संसाधन की कमी वैश्विक सहयोग की रेखाओं को पुनर्परिभाषित करती है।
- शक्ति का सांस्कृतिक बहुलीकरण: प्रभाव पश्चिमी वैचारिक प्रभुत्व से हटकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की विविध सांस्कृतिक शासन प्रणालियों की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
- क्षेत्रीय शक्तियों का पुनः उदय: चीन, भारत, तुर्किये और ब्राज़ील अमेरिकी-केंद्रित प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं।
- रणनीतिक पुनर्संरेखण: ईरान-रूस सहयोग और अंतर-कोरियाई सहभागिता।
- संघर्ष का संकर रूप: साइबर युद्ध, AI और व्यापार प्रतिबंध पारंपरिक सैन्य आक्रामकता का स्थान ले रहे हैं।
- आर्थिक और ऊर्जा संक्रमण: हाइड्रोजन और AI प्रौद्योगिकियाँ भू-राजनीतिक प्रभाव को आकार दे रही हैं।
- खंडित बहुपक्षवाद: बहुध्रुवीय सहयोग क्षेत्रीय अशांति के साथ सह-अस्तित्व में है।
नई द्विध्रुवीयता का उदय: अमेरिका और चीन
- चीन और अमेरिका के बीच प्रणालीगत प्रतिद्वंद्विता: नई द्विध्रुवीयता वैचारिक नहीं बल्कि आर्थिक-प्रौद्योगिकीय है, जिसमें शक्ति नेटवर्क और डेटा-आधारित प्रभाव के माध्यम से वितरित होती है।
- समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंध ‘द्वि-कोर प्रणाली’ की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ अमेरिका और चीन विशेष रूप से प्रौद्योगिकी एवं व्यापार में वैश्विक निर्णय लेने पर प्रभुत्वशाली हैं।
- 21वीं सदी में चीन का आर्थिक विस्तार, तकनीकी क्षमता और BRI ने उसे अमेरिका का प्रणालीगत प्रतिद्वंद्वी बना दिया है।
- अमेरिका का पश्चिमी गोलार्ध में पुनः दावा: हाल ही में अमेरिका ने कैरिबियन में दशकों में सबसे बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया है, जो वेनेज़ुएला के विरुद्ध एक बड़ा उभार है।
- यह राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) जारी होने के बाद आया है, जिसने लैटिन अमेरिका और कैरिबियन को रणनीतिक प्राथमिकता घोषित किया।
- NSS का दावा है कि अमेरिका को क्षेत्र में बाहरी शक्तियों (मोनरो सिद्धांत) विशेषकर चीन के प्रभाव को रोकना चाहिए और पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी प्रभुत्व क्षेत्र के रूप में सुरक्षित करना चाहिए।
- अमेरिका (स्थापित शक्ति) और चीन (उभरती शक्ति) के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा प्रथम विश्व युद्ध-पूर्व ब्रिटेन एवं साम्राज्यवादी जर्मनी के बीच तनाव को प्रतिबिंबित करती है।
- आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षेत्रों में लंबा टकराव अपरिहार्य प्रतीत होता है क्योंकि दोनों शक्तियाँ वैश्विक प्रभुत्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।
विश्व क्यों बहुध्रुवीय और द्विध्रुवीय दोनों है?
- कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ: चीन, भारत और यूरोपीय संघ जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएँ बढ़ते आर्थिक, कूटनीतिक एवं सैन्य प्रभाव डाल रही हैं, जिससे बहुध्रुवीय संदर्भ बनता है।
- अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा: अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता कई प्रमुख भू-राजनीतिक अंतःक्रियाओं को संरचित करती है, जो बहुध्रुवीय तत्वों के बावजूद द्विध्रुवीय गतिशीलता को दर्शाती है।
- लचीले गठबंधन और मध्य शक्तियाँ: भारत, ब्राज़ील और अन्य देश प्रमुख ध्रुवों के साथ जुड़ते हुए रणनीतिक स्वायत्तता का अनुसरण करते हैं, स्वतः सहयोगी बनने के बजाय स्वतंत्र प्रभाव केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
- ध्रुवीयता के अंतर्व्याप्त रूप: समकालीन भू-राजनीति बहुध्रुवीयता, द्विध्रुवीयता और यहाँ तक कि गैर-ध्रुवीयता (जहाँ प्रभाव राज्यों और गैर-राज्य अभिनेताओं में फैल जाता है) के लक्षण प्रदर्शित करती है।
संकर/हाइब्रिड व्यवस्था के प्रेरक तत्व
- शक्ति का प्रसार और आर्थिक बदलाव: पश्चिमी आर्थिक प्रभुत्व का सापेक्ष पतन और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं का तीव्र विस्तार वैश्विक शक्ति का विकेंद्रीकरण कर रहा है, जो बहुध्रुवीयता की मुख्य विशेषता है।
- रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता: अमेरिका-चीन संबंध एक केंद्रीय धुरी के रूप में कार्य करता है, जिसके चारों ओर कई क्षेत्रीय और वैश्विक नीतियाँ घूमती हैं, जिससे द्विध्रुवीय गतिशीलता सुदृढ़ होती है।
- संस्थागत जटिलताएँ: संयुक्त राष्ट्र, G20, BRICS और क्षेत्रीय समूहों जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ एवं गठबंधन छोटे देशों को व्यापक बहुध्रुवीय अंतःक्रियाओं में एजेंसी प्रदान करते हैं।
- वैश्विक संकट: जलवायु परिवर्तन, महामारी और साइबर सुरक्षा जैसी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियाँ द्विपक्षीय प्रतिद्वंद्विता से परे विविध गठबंधनों की आवश्यकता को उजागर करती हैं, जिससे बहुध्रुवीय सहयोग की आवश्यकता सामने आती है।
विश्व व्यवस्था के निहितार्थ
- निर्णय लेने में अधिक जटिलता: वैश्विक मुद्दों पर निर्णय लेना अधिक जटिल हो गया है, जिसके लिए विविध हितों के बीच बातचीत की आवश्यकता होती है, न कि किसी एक शक्ति के प्रभुत्व की।
- प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग की संभावना: अन्य शक्तियाँ और संस्थाएँ सहयोग के मार्ग प्रदान करती हैं, जिससे प्रत्यक्ष टकराव का जोखिम कम हो सकता है, जबकि अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है।
- बहुस्तरीय शासन संरचनाएँ: वैश्विक शासन तीव्रता से ऐसे गठबंधनों को शामिल कर रहा है जो पारंपरिक शक्ति ध्रुवों और उभरते अभिनेताओं को पार करते हैं, क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को वैश्विक प्रतिबद्धताओं के साथ मिलाते हैं।
रूस की भूमिका: स्विंग महाशक्ति
- रूस सैन्य रूप से शक्तिशाली और भू-राजनीतिक रूप से आक्रामक बना हुआ है, यद्यपि आर्थिक रूप से कमजोर है।
- इसका विशाल परमाणु शस्त्रागार, संसाधन और भौगोलिक पहुँच इसे एक महत्वपूर्ण अभिनेता बनाते हैं।
- चीन के साथ रूस की घनिष्ठ साझेदारी पश्चिमी प्रभुत्व के प्रति साझा विरोध को दर्शाती है, लेकिन रूस चीन का कनिष्ठ साझेदार बनने से सावधान है।
- यह द्वंद्व रूस को एक स्विंग शक्ति के रूप में स्थापित करता है, जो अमेरिका और चीन के बीच संतुलन को झुका सकती है।
- हालाँकि, यूक्रेन युद्ध रूस की रणनीतिक चालबाज़ी को सीमित करता है, भले ही वह अपने पोस्ट-सोवियत क्षेत्र में प्रभाव पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा हो।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय कूटनीति
- भारत की विदेश नीति ‘विश्वगुरु’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ सिद्धांतों के अंतर्गत बल देती है:
- गुटनिरपेक्षता 2.0: प्रमुख शक्तियों से बिना औपचारिक गठबंधन के जुड़ना।
- संतुलन रणनीति: अमेरिका के साथ प्रौद्योगिकी और रक्षा में साझेदारी करना, जबकि रूस (ऊर्जा, हथियार) के साथ संबंध बनाए रखना एवं BRICS तथा SCO के माध्यम से चीन से जुड़ना।
- भारत और इंडो-पैसिफिक रणनीति: भारत की इंडो-पैसिफिक ढाँचे में केंद्रीयता उसके भौगोलिक और रणनीतिक महत्व को दर्शाती है:
- ‘मुक्त, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक’ को बढ़ावा देना, जो अमेरिकी वक्तव्य से मेल खाता है।
- QUAD गठबंधन (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) में भारत की भागीदारी इंडो-पैसिफिक सुरक्षा पर पश्चिमी लोकतंत्रों के साथ संरेखण को दर्शाती है।
- G20 2023 में लॉन्च किए गए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर (IMEC) के माध्यम से चीन के BRI का सामना करना।
- अमेरिका के साथ नौसैनिक क्षमताओं और लॉजिस्टिक्स समझौतों (LEMOA, COMCASA, BECA) को सुदृढ़ करना।
- आर्थिक और तकनीकी आयाम
- राजनीतिक तनावों के बावजूद चीन भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से एक बना हुआ है।
- भारत को अमेरिकी प्रौद्योगिकी साझेदारियों से लाभ मिलता है, जैसे महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल (iCET)।
- नवीकरणीय ऊर्जा, AI और डिजिटल अवसंरचना में अमेरिका से बढ़ते निवेश प्राप्त करना।
- भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में, विशेषकर सेमीकंडक्टर और विनिर्माण में, चीन को प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य रखता है।
- साथ ही, भारत BRICS+ देशों के साथ दक्षिण-दक्षिण सहयोग की खोज करता है ताकि रणनीतिक स्थान सुरक्षित रहे।
- ग्लोबल साउथ नेतृत्व: भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है, संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की वकालत करता है।
- यह बहुध्रुवीय विश्व में अपनी वैधता को सुदृढ़ करता है, जिससे वह अमेरिकी प्रभुत्व और चीन के आक्रामक उदय दोनों से अलग पहचान बनाता है।
निष्कर्ष: द्विध्रुवीय बहुध्रुवीयता
- 2020 के दशक के उत्तरार्ध में उभरती विश्व व्यवस्था न तो पूरी तरह बहुध्रुवीय है और न ही सख्ती से द्विध्रुवीय।
- विश्व प्रतिस्पर्धा, पुनर्संरेखण और सीमित प्रभुत्व से परिभाषित एक युग में प्रवेश कर रही है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] वर्तमान वैश्विक व्यवस्था किन-किन तरीकों से बहुध्रुवीय और द्विध्रुवीय विशेषताओं को प्रतिबिंबित करती है, तथा भारत जैसे देशों को इस बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में कैसे मार्गदर्शन करना चाहिए? |
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द्विध्रुवीय विशेषताओं वाला एक बहुध्रुवीय विश्व