भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)

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भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) भारतीय वित्तीय प्रणाली की एक महत्त्वपूर्ण आधारशिला है। यह भारत के प्रतिभूति बाजार में पारदर्शिता एवं सुव्यवस्थित विनियमन को सुनिश्चित करता है , इसके साथ ही यह देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों के विश्वास की रक्षा करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। NEXT IAS के इस लेख का उद्देश्य भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, इसके विकास, ढांचे, शक्तियों और कार्यों, संबंधित मुद्दों और अन्य संबंधित पहलुओं का विस्तार से अध्ययन करना है।

  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) भारत में प्रतिभूति बाजार (Securities Market) का प्रमुख नियामक है।
  • यह भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) के रूप में कार्य करता है।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • भारतीय पूँजी बाजार के प्रहरी (Watchdog) के रूप में कार्य करना।
  • प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले निवेशकों के हितों की रक्षा करना।
  • प्रतिभूति बाजार को बढ़ावा देना और विनियमित करना।
– सेबी का मुख्यालय मुंबई में स्थित है।
– इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं, जो अहमदाबाद, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में स्थित हैं।
  • SEBI के अस्तित्व में आने से पहले, पूंजी नियंत्रक (Controller of Capital Issues) भारतीय प्रतिभूति बाजार का नियामक प्राधिकरण था।
    • इसे पूंजी निर्गम (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 से अधिकार प्राप्त थे।
  • 1980 के दशक के अंत में LPG सुधारों के अंतर्गत भारतीय वित्तीय प्रणाली को बाहरी हस्तक्षेपों से बचाने के लिए एक सतर्क नियामक प्राधिकरण के रूप में एक स्वतंत्र निकाय की आवश्यकता महसूस की गई थी।
  • इसके अनुसार, अप्रैल 1988 में, भारत सरकार के एक कार्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को भारत में पूँजी बाजार के नियामक के रूप में गठित किया गया था।
    • इस प्रकार, प्रारम्भ में, यह एक गैर-सांविधिक निकाय के रूप में बिना वैधानिक शक्ति के कार्य करता था।
  • बाद में, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधिनियमन के साथ, यह एक स्वायत्त और वैधानिक निकाय बन गया।
  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड एक सुपरिभाषित पदानुक्रम के साथ एक कॉर्पोरेट संरचना के अनुसार कार्य करता है।
  • निदेशक मंडल पदानुक्रम के शीर्ष पर होते हैं, तथा संचालन की समग्र दिशा और प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होते हैं।
  • इसके निदेशक मंडल में 9 सदस्य शामिल होते हैं, जिनमें शामिल हैं:
    • भारत सरकार द्वारा मनोनीत एक अध्यक्ष।
    • कंपनी अधिनियम, 2013 (आमतौर पर, केंद्रीय वित्त मंत्रालय) के वित्त और प्रशासन से संबंधित केंद्रीय मंत्रालय के 2 सदस्य।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से 1 सदस्य।
    • भारत सरकार द्वारा नियुक्त 5 अन्य सदस्य।
      • इन 5 में से कम से कम 3 पूर्णकालिक सदस्य होंगे।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड एक अर्ध-विधायी और अर्ध-न्यायिक निकाय है जो विनियमों का एक प्रारुप तैयार कर सकता है, जाँच कर सकता है, निर्णय पारित कर सकता है और दंड लगा सकता है। प्रतिभूति बाजार में विभिन्न भागीदारों के संबंध में इसकी शक्तियों को निम्नानुसार देखा जा सकता है:

  • स्टॉक एक्सचेंजों, म्यूचुअल फंडों, प्रतिभूति बाजार से जुड़े अन्य व्यक्तियों, मध्यस्थों और प्रतिभूति बाजार में स्व-नियामक संगठनों की सूचना माँगना, निरीक्षण करना, जांच और लेखा परीक्षा करना;
  • प्रतिभूतियों में आंतरिक व्यापार को प्रतिबंधित करना।
  • स्व-नियामक संगठनों को बढ़ावा देना और विनियमित करना;
  • प्रतिभूति बाजारों से संबंधित कपटपूर्ण और अनुचित व्यापार प्रथाओं को प्रतिबंधित करना;
  • शेयरों के पर्याप्त अधिग्रहण और कंपनियों के अधिग्रहण को विनियमित करना;
  • निवेशकों की शिक्षा और प्रतिभूति बाजार के मध्यस्थों के प्रशिक्षण को बढ़ावा देना।
  • स्टॉक ब्रोकरों, सब-ब्रोकरों, शेयर ट्रांसफर एजेंटों, किसी निर्गम के बैंकरों, ट्रस्ट डीड के ट्रस्टियों, किसी निर्गम के रजिस्ट्रारों, मर्चेंट बैंकरों, अंडरराइटरों, पोर्टफोलियो मैनेजरों, निवेश सलाहकारों और ऐसे अन्य मध्यस्थों के कामकाज को पंजीकृत करना और विनियमित करना जो प्रतिभूति बाजारों से किसी भी तरह से जुड़े हों।
  • म्यूचुअल फंड सहित उद्यम पूंजी कोष और सामूहिक निवेश योजनाओं के कामकाज को पंजीकृत करना और विनियमित करना।
  • भारतीय पूँजी बाजार के लिए प्रहरी के रूप में, यह निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए निर्गमकर्ता कंपनियों (Issuer Companies) द्वारा जनता से पूँजी जुटाने के लिए शर्तों को निर्धारित करता है।
    • निवेशकों द्वारा सूचित निवेश निर्णय लेने के साथ-साथ निर्गमकर्ता की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निर्गमकर्ताओं के लिए निर्धारित व्यापक प्रकटीकरण।
  • यह बाजार की व्यष्टि एवं समष्टि संरचनाओं में परिवर्तन लाकर प्रतिभूति बाजारों को व्यापक और गहरा बनाने के लिए उपाय प्रदान करता है।
    • SEBI द्वारा किए गए कुछ प्रमुख बाजार विकास उपायों में शामिल हैं – एक पारदर्शी स्क्रीन-आधारित ऑनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक मोड (डीमैट) पर स्थानांतरण, मजबूत जोखिम प्रबंधन ढांचा आदि।
  • यह पंजीकृत मध्यस्थों का निरीक्षण और जांच करके अपने मानदंडों के अनुपालन को सुनिश्चित करता है।
  • इसे सूचना और रिकॉर्ड माँगने, सम्मन जारी करने, निरीक्षण करने और प्रतिभूति बाजारों से जुड़ी संस्थाओं की जांच करने के लिए दीवानी न्यायालयों की शक्ति प्रदान की गई है।
  • इसे मानदंडों के उल्लंघन के लिए संस्थाओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का भी अधिकार है।
  • यह निवेशकों की शिकायतों के निवारण की सुविधा प्रदान करता है।
  • अपने इस विश्वास को बनाए रखने के लिए कि एक जागरूक निवेशक एक संरक्षित निवेशक है, यह निवेशकों की शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा देता है।
  • यह विवाद निवारण (स्टॉक एक्सचेंजों में मध्यस्थता) और निवेशकों को क्षतिपूर्ति करने के लिए तंत्र प्रदान करता है।

अपनी स्थापना के बाद से, इसने भारत में एक सुव्यवस्थित प्रतिभूति बाजार सुनिश्चित करने के साथ-साथ इसके विकास को भी गति दी है। इसकी कुछ प्रमुख उपलब्धियों को निम्नानुसार देखा जा सकता है:

  • शेयरों का डीमैटीरियलाइजेशन
  • समाधान चक्रों (Cycles) को छोटा करना
  • देशव्यापी इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग की शुरुआत
  • जोखिम प्रबंधन प्रणालियों का प्रारम्भ
  • समाशोधन निगमों (Clearing Corporations) की स्थापना
  • म्यूचुअल फंड उद्योग का पोषण।
  • बाजार आचरण के विनियमन (Regulation of Market Conduct) पर अत्यधिक फोकस, जबकि विवेकशील विनियमन (Prudential Regulation) पर कम।
  • अमेरिका और ब्रिटेन में अपने समकक्षों की तुलना में, इसे कहीं अधिक विधायी और प्रवर्तन शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
    • कभी-कभी सेबी के द्वारा संदेह के आधार पर भी आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर प्रतिबंध लगायें जाते हैं, जिससे कभी-कभी गंभीर आर्थिक क्षति भी होती है।
  • बाजार के साथ पूर्व परामर्श एवं विनियमों की समीक्षा प्रणाली को काफी हद तक अनुपस्थित देखा गया है। परिणामस्वरूप, नियामक का डर व्यापक होता है।
  • नियमों के साथ-साथ विनियमों का प्रवर्तन अपर्याप्त है, विशेषकर आंतरिक व्यापार जैसे क्षेत्रों में।

निवेशकों में जागरूकता को बढ़ावा देने और निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 125 के तहत IEPF की स्थापना की गई है।

  • इसके द्वारा SCORES (स्कोर्स) पोर्टल की स्थापना किया गया, जो एक वेब-आधारित केंद्रीकृत शिकायत निवारण प्रणाली है।
  • यह निवेशकों को कहीं से भी अपनी शिकायतें दर्ज करने और उनका अनुसरण करने तथा ऐसी शिकायतों के निवारण की स्थिति को ट्रैक करने में सक्षम बनाता है।
  • इसके अंतर्गत निवेशक शिक्षा और वित्तीय साक्षरता के लिए कई पहलें प्रारम्भ की गई है, जिनके द्वारा बाजारों और अर्थव्यवस्था के बेहतर संचालन के साथ-साथ निवेशकों के हितों की सुरक्षा की जाती है।
  • इस दिशा में किए गए कुछ प्रमुख कार्यों में शामिल हैं – प्रतिभूति बाजार जागरूकता अभियान, वित्तीय साक्षरता एवं परामर्श केंद्र आदि।
  • वर्तमान फोकस को बाजार आचरण के विनियमन (Regulation of Market Conduct) से विवेकपूर्ण विनियमन (Prudential Regulation ) पर स्थानांतरित करने के लिए दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है।
    • इस संबंध में, इसका उद्देश्य वित्तीय बाजार में नीतिगत लक्ष्यों को निर्धारित किया जाना चाहिए।
  • बाजार विनियमों को सशक्त करने के लिए निरंतर निगरानी और बाजार इंटेलिजेंस में सुधार पर जोर दिया जाना चाहिए।
  • प्रदान किए गए वित्त संसाधनों को सफलता के मानकों के रूप में उपयोग करने के स्थान पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को गहन समीक्षा और शोध की आवश्यकता है जिससे भारतीय प्रतिभूति बाजार को और बेहतर किया जा सकता है।
  • अपने मानव संसाधनों को मजबूत एवं सर्वोत्तम प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए लेटरल एंट्री पर विचार किया जाना चाहिए।
  • भारतीय वित्तीय बाज़ार अभी भी विभाजित हैं, किसी वित्तीय उत्पाद पर अधिकार क्षेत्र ओवरलैप होने पर एक नियामक को दूसरे की विफलता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इस संदर्भ में, एक एकीकृत वित्तीय नियामक, ओवरलैप और बहिष्कृत दोनों सीमाओं को हटाने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

निष्कर्ष रूप में, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) भारतीय प्रतिभूति बाजार की स्थिरता और विकास के लिए बाजार नियामक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भारतीय प्रतिभूति बाजार में निवेशकों की रक्षा एवं निष्पक्षता को बढ़ावा देकर एक विकासित, जीवंत और भरोसेमंद वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र को सुनिश्चित करता है जो भारत की आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है। चूंकि बाजार वैश्विक रूप से अधिक जटिल और परस्पर जुड़े हुए हैं, एक नियामक के रूप में इसकी भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसके कामकाज को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) क्या है?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है जो भारत में प्रतिभूति बाजार के प्रमुख नियामक के रूप में कार्य करता है।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की क्या भूमिका है?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की प्राथमिक भूमिकाओं में शामिल हैं – भारतीय पूँजी बाजार के प्रहरी के रूप में कार्य करना, प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना एवं भारत में प्रतिभूति बाजार को बढ़ावा देना और विनियमित करना।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम कब पारित हुआ था?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम 30 जनवरी, 1992 को पारित किया गया था। हालाँकि, इसे 4 अप्रैल, 1992 को अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम ने सेबी को एक स्वायत्त और वैधानिक निकाय बना दिया।

भारत में प्रतिभूति बाज़ारों का नियमन कौन करता है?

भारत में प्रतिभूति बाजारों का प्राथमिक नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड है।

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