पर्यावरण प्रदूषण: वर्गीकरण, कारण एवं इसके प्रकार

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पर्यावरण प्रदूषण

पर्यावरण प्रदूषण क्या है?

पर्यावरण प्रदूषण का तात्पर्य मानव गतिविधियों के कारण पर्यावरण में किसी भी अवांछित सामग्री के शामिल होने से है जो पर्यावरण और पारिस्थितिकी में अवांछनीय परिवर्तन का कारण बनता है। उदाहरण के लिए, स्वच्छ जल स्रोतों जैसे टैंकों, नदियों आदि में सीवेज के जल को मुक्त करना, जल प्रदूषण का एक उदाहरण है।

प्रदूषक क्या हैं?

पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न कारकों को प्रदूषक कहा जाता है। प्रदूषक रसायन, जैविक या भौतिक कारक हो सकते हैं जो दुर्घटनावश पर्यावरण में शामिल हो जाते हैं जो लोगों और अन्य जीवित प्राणियों के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हानिकारक होते हैं।

प्रदूषण का वर्गीकरण

स्थिरता के आधार परप्राथमिक प्रदूषक:
– वे उसी रूप में बने रहते हैं जिस रूप में उन्हें पर्यावरण में जोड़ा जाता है। डीडीटी, प्लास्टिक आदि।

द्वितीयक प्रदूषक:
– प्राथमिक प्रदूषकों के बीच परस्पर क्रिया द्वारा निर्मित, जैसे पेरोक्सीएसिटाइल नाइट्रेट (PAN), नाइट्रोजन ऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन की परस्पर क्रिया से बनते है।
प्रकृति में अस्तित्व के आधार परमात्रात्मक प्रदूषक:
– ये प्रदूषक प्रकृति में पाये जाते हैं तथा ये प्रदूषक तब और गंभीर हो जाते हैं जब उनकी सांद्रता एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाती है। उदाहरण के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड मात्रात्मक प्रदूषक हैं।

गुणात्मक प्रदूषक:
– ये मानव निर्मित होते हैं और प्रकृति में स्वतंत्र रूप से नहीं पाये जाते। उदाहरण के लिए, कवकनाशक, शाकनाशी, डीडीटी आदि गुणात्मक प्रदूषक हैं।
जैव-निम्नीकरणीयता के आधार परजैव-निम्नीकरणीय प्रदूषक:
– अपशिष्ट उत्पाद या प्रदूषक जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं से माइक्रोबियल क्रिया द्वारा विघटित/अवक्रमित होते हैं। जैसे सीवेज।

गैर-जैवनिम्नीकरणीय प्रदूषक:
– वे प्रदूषक जो प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं होते या धीरे-धीरे विघटित होते हैं, जैसे डीडीटी, एल्युमीनियम के डिब्बे।
उत्पत्ति के आधार परप्राकृतिक प्रदूषक:
– ये प्रदूषक प्राकृतिक प्रक्रियाओं के दौरान उत्सर्जित होते हैं, जैसे ज्वालामुखी विस्फोट, वनों की आग आदि। उदाहरण के लिए, ज्वालामुखी विस्फोट में सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है, जबकि जंगलों की आग में कार्बन मोनोऑक्साइड और धूल के कण निकलते उत्सर्जित होते हैं।

मानवजनित प्रदूषक:
– ये प्रदूषक मानवीय गतिविधियों के दौरान उत्सर्जित होते हैं, जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने दहन से CO2 उत्सर्जन। उदाहरण के लिए, औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाहनों से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड मानवजनित प्रदूषक हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव

  • प्रदूषण पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने वाले मूल कारकों को प्रभावित करते है। यह हमारे जीवन के लिये आवयश्क वायु, जल तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्र, जिस पर हम निर्भर है, को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
  • प्रदूषण मनुष्यों और अन्य जीवित प्राणियों के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यद्यपि यह सम्पूर्ण समाज के समग्र कल्याण को प्रभावित करते है लेकिन निर्धन, बच्चों, महिलाओं आदि जैसे कमजोर वर्गों पर इसका असमान रूप से प्रभाव अधिक होता है।
  • पर्यावरण प्रदूषण का अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव होता है। एक अध्ययन के अनुसार, जल प्रदूषण से मछली पकड़ने, कृषि, जल-सघन उद्योगों आदि क्षेत्रों में होने वाले नुकसान के कारण 2050 तक भारत की जीडीपी में लगभग 6% का नुकसान होगा।
  • पर्यावरण प्रदूषण के अन्य सामाजिक-आर्थिक प्रभावों में घटे कृषि उपज के कारण खाद्य असुरक्षा, जल संकट के कारण जबरन प्रवासन आदि शामिल हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के कारण

  • मानव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि ने मानवजनित गतिविधियों को कई गुना बढ़ा दिया है। इनमें से अधिकाँश गतिविधियाँ, किसी न किसी तरह से पर्यावरण में कुछ अवांछित कारकों को जोड़ती हैं।
  • हाल के दिनों में तेजी से शहरीकरण के कारण निर्माण गतिविधियों में वृद्धि हुई है। निर्माण गतिविधियाँ विभिन्न तरीकों से पर्यावरण प्रदूषण को फैला रहें है, जैसे वायु में धूल के कण, अपशिष्ट पदार्थों का निर्माण आदि।
  • बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण परिवहन गतिविधियाँ में भी वृद्धि हुई हैं। यह अपने आप में प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है।
  • हाल ही में औद्योगीकरण पर बढ़ते फोकस के कारण औद्योगिक अपशिष्ट और उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है, और इसलिए पर्यावरण प्रदूषण हो रहा है।
  • कुछ कृषि गतिविधियाँ भी पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनती हैं। उदाहरण के लिए, उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से न केवल मिट्टी का प्रदूषण होता है बल्कि आस-पास के जल निकायों में भी रिसाव होता है।
  • पर्यावरण प्रदूषण के कई अन्य कारण हैं, जैसे जीवाश्म ईंधनों का दहन, रसायनों का बढ़ता उपयोग आदि।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार

प्रदूषकों के स्रोत और गंतव्य के आधार पर, प्रदूषण विभिन्न प्रकार के होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

वायु प्रदूषण

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वायु प्रदूषण किसी भी रासायनिक, भौतिक या जैविक एजेंट द्वारा आंतरिक या बाहरी वातावरण का संदूषण है जो वातावरण की प्राकृतिक विशेषताओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
  • WHO के आँकड़ों के अनुसार, दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी ऐसी वायु में साँस लेती है जिसमें उच्च स्तर के प्रदूषक होते हैं तथा WHO के दिशानिर्देशों की सीमा से अधिक होते हैं, जिससे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सबसे अधिक स्वास्थ्य जोखिम होता है।

कारण:

वायु प्रदूषण के कई कारण हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

1. मानव गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं:

  • मानव गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण में वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक उत्सर्जन, अपशिष्टो के दहन, बिजली उत्पादन, निर्माण और विध्वंस आदि शामिल है इन गतिविधियों से उत्सर्जित होने वाले प्रदूषकों में कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर, ओजोन और विषैले रसायन आदि शामिल हैं।

2. प्राकृतिक घटनाओं से होने वाले प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं:

  • ज्वालामुखी विस्फोट: ज्वालामुखी विस्फोटों से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं।
  • वनों की आग: वनों की आग से कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषक निकलते हैं।
  • धूल भरे तूफान: धूल भरे तूफान धूल, मिट्टी और अन्य कणों को वायु में मिश्रित कर देते हैं।
  • मरुस्थलीकरण: मरुस्थलीकरण से वायु में धूल और अन्य कणों की मात्रा बढ़ सकती है।

वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किये गये उपाय:

  • वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1981: यह अधिनियम वायु प्रदूषण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): यह कार्यक्रम भारत में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक व्यापक और दीर्घकालिक योजना है।
  • निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली (CAAQMS): यह प्रणाली देश भर में वायु गुणवत्ता की निगरानी करती है और वास्तविक समय में वायु गुणवत्ता डेटा प्रदान करती है।
  • सीएसआईआर-एनईईआरआई द्वारा विकसित ग्रीन क्रैकर्स: ये कम प्रदूषित पटाखे हैं जो पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हानिकारक हैं।
  • अरावली की महान हरी दीवार (Green Wall): यह एक विशाल वृक्षारोपण परियोजना है जिसका उद्देश्य अरावली पहाड़ियों को बहाल करना और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण को कम करना है।
  • दिल्ली जैसे कुछ राज्यों ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए स्मॉग टावर्स का निर्माण किया है।

जल प्रदूषण

जल प्रदूषण जल निकायों में अवांछित पदार्थों के स्राव को संदर्भित करता है जैसे कि झीलें, धाराएँ, नदियाँ और महासागर जैसे जल निकायों में अवांछित पदार्थों की इतनी मात्रा जो जल के लाभकारी उपयोग या पारिस्थितिक तंत्रों के प्राकृतिक कामकाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते है।

जब हानिकारक रसायन या सूक्ष्मजीव किसी धारा, नदी, झील, समुद्र, जलभृत या अन्य जल निकाय को दूषित करते हैं, तो जल की गुणवत्ता खराब हो जाती है और यह मनुष्यों और पर्यावरण दोनों के लिये विषाक्त हो जाता है।

  • जल प्रदूषण के परिणामस्वरूप घुलित ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर गिर जाता है तो जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) बढ़ जाती है परिणामस्वरूप जलीय प्रजातियाँ नष्ट होने लगती है।

कारण:

  • कृषि जल प्रदूषण के प्राथमिक स्रोतों में से एक है। खेतों और पशुधन कार्यों से निकलने वाला पशु अपशिष्ट, कीटनाशक, उर्वरक पोषक तत्वों एवं रोगजनकों जैसे बैक्टीरिया और वायरस को हमारे जलमार्गों में बहा दिया जाता हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट जल, बिना उपचार या पुन: उपयोग के पर्यावरण में पुन: प्रवाहित कर दिया जाता है।
  • अनुमानित 10 लाख टन तेल का लगभग आधा हिस्सा समुद्री वातावरण में दुर्घटनावश फैला दिया जाता है।
  • यूरेनियम खनन, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और अस्पतालों द्वारा रेडियोधर्मी पदार्थ जो शोध और चिकित्सा के लिए रेडियोधर्मी सामग्री का उपयोग करते हैं। इन अपशिष्ट को खुले वातावरण में छोड़ दिया जाता हैं जो हजारों वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं। इन रेडियोधर्मी पदार्थ का निपटान भी एक बड़ी चुनौती है।

जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये किये गए उपाय:

  1. जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये अंतरराष्ट्रीय उपाय:
  • समुद्री प्रदूषण को कम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
  • समुद्र में अपशिष्टों के निपटान पर कन्वेंशन या लंदन कन्वेंशन (1972)
  • अपशिष्टों और अन्य पदार्थों के डंपिंग द्वारा समुद्री प्रदूषण की रोकथाम पर 1972 कन्वेंशन, जिसे “एलसी 72” या “लंदन कन्वेंशन” के रूप में भी जाना जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र समुद्र कानून संधि (UNCLOS)

जल प्रदूषण से निपटने के लिये भारत में किये गए उपाय

  • जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
  • नदियों को पुनर्जीवित करने की पहल, जैसे गंगा कार्य योजना, यमुना कार्य योजना इत्यादि।
  • भूजल के प्रदूषण और अत्यधिक दोहन से निपटने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की गई पहल।

ध्वनि प्रदूषण

  • ध्वनि प्रदूषण को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा ऐसी ध्वनि के रूप में परिभाषित किया गया है जो 65 डेसिबल (dB) से अधिक तेज है।
  • संक्षेप में, ध्वनि 75 dB से ऊपर हानिकारक और 120 dB से ऊपर गंभीर रूप से हानिकारक है। इसलिए दिन के समय में ध्वनि स्तर को 65 dB से नीचे रखने की सलाह दी जाती है।
  • रात्रि के समय के लिए उपयुक्त परिवेशी ध्वनि स्तर 30 dB है; इस से ऊपर के ध्वनि स्तरों के साथ आरामदायक नींद नहीं मिल सकती।
  • विश्वभर में ध्वनि प्रदूषण की वर्तमान स्थिति को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट ‘फ्रंटियर्स 2022: नॉइज, ब्लेज़ेस एंड मिसमैचेस’ के माध्यम से देखा जा सकता है, जो दुनिया के सबसे शोर वाले शहरों को सूचीबद्ध करती है।
क्रमांक शहरदेशध्वनि प्रदूषण
1ढाकाबांग्लादेश119 dB
2मुरादाबादभारत114 dB
3इस्लामाबादपाकिस्तान105 dB
4राजशाहीबांग्लादेश103 dB
5हो ची मिंह शहरवियतनाम103 dB

ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सुझाये गए उपाय:

  • स्रोत पर ध्वनि को कम रखना
  • ध्वनिक ज़ोनिंग
  • निर्माण स्थलों पर ध्वनिरोधी
  • वृक्षारोपण
  • सख्त वैधानिक उपाय

मृदा प्रदूषण

  • विषैले पदार्थों की असामान्य रूप से उच्च सांद्रता वाली मिट्टी के प्रदूषण को मृदा प्रदूषण कहा जाता है।
  • यह एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता है, क्योंकि इसमें कई स्वास्थ्य जोखिम शामिल हैं। उदाहरण के लिए, उच्च बेंजीन सांद्रता वाली मिट्टी के संपर्क में आने से ल्यूकेमिया के विकास का खतरा बढ़ जाता है।

कारण:

  • वर्तमान मृदा क्षरण के प्रमुख कारणों में कार्बनिक कार्बन का ह्रास, कटाव, बढ़ी हुई लवणता, अम्लीकरण, संघनन और रासायनिक प्रदूषण शामिल हैं।

मृदा प्रदूषण से निपटने के लिए सुझाये गए उपाय:

  • व्यवसाय, कृषि, पशु प्रजनन और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में पर्यावरण के अनुकूल विधियों को बढ़ावा देना।
  • उचित शहरी नियोजन के माध्यम से अपशिष्ट जल के कुशल परिवहन और उपचार को सुनिश्चित करना।
  • ऊपरी मृदा संरक्षण, भूदृश्य पुनर्स्थापन और खनन अपशिष्ट प्रबंधन में वृद्धि करना।

रेडियोधर्मी प्रदूषण

  • जब रेडियोधर्मी तत्व आकस्मिक रूप से पर्यावरण या वातावरण में उपस्थित होते हैं और रेडियोधर्मी क्षय के कारण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जोखिम उत्पन्न करते हैं तो इसे रेडियोधर्मी प्रदूषण कहा जाता है।
  • रेडियोधर्मी सामग्री पर्यावरण में अल्फा या बीटा कणों, गामा किरणों या न्यूट्रॉन जैसे संभावित रूप से हानिकारक आयनकारी विकिरण के द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुँचाती है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारण:

  • परमाणु ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों से परमाणु दुर्घटनाएँ
  • सामूहिक विनाश के हथियारों (WMD) के रूप में परमाणु हथियारों का प्रयोग
  • स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों में रेडियो समस्थानों का प्रयोग
  • खनन
  • रेडियोधर्मी रसायनों का रिसाव
  • कॉस्मिक किरणें और अन्य प्राकृतिक स्रोत
  • परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन और निपटान

प्रकाश प्रदूषण

  • प्रकाश प्रदूषण अनुचित, अवांछित और अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश की उपस्थिति है।
  • अत्यधिक प्रकाश प्रदूषण का पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसके साथ ही खगोलीय अनुसंधान में बाधा पहुँचती है, परिणामस्वरूप पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित होता है।
  • प्रकाश प्रदूषण की विशिष्ट श्रेणियों में प्रकाश अव्यवस्था, प्रकाश अतिचार, अति-रोशनी, चकाचौंध और आकाश की चमक शामिल हैं।
  • इन चुनौतियों से निपटने के लिए एलईडी लाइट्स का उपयोग करना तथा इसके साथ ही सजावटी लाइटिंग का उपयोग कम करना आदि शामिल हैं।

नाइट्रोजन प्रदूषण

  • नाइट्रोजन प्रदूषण अमोनिया और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे नाइट्रोजन यौगिकों की अधिकता के कारण होता है। कभी-कभी कृत्रिम उर्वरकों का प्रयोग भी इस प्रदूषण का कारण बनता है।
  • एक अन्य संभावित कारण बड़ी मात्रा में पशु खाद और घोल को विघटित करना भी है, जो प्राय: गहन पशुधन इकाइयों में उपस्थित होते है।
  • इसका हमारी जलवायु, पारिस्थितिकी तंत्र और स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है।

नाइट्रोजन प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सुझाये गए उपाय:

  • जलवायु और प्रकृति-अनुकूल कृषि के तरीकों को अपनाना चाहिए तथा इसके साथ ही सिंथेटिक उर्वरकों के प्रयोग से बचना चाहिए।
  • भविष्य में किसानों को कम नाइट्रोजन वाले उर्वरको को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तथा इसके साथ ही जैविक और कृषि-पारिस्थितिकी किसानों का समर्थन करना चाहिए।

इस प्रकार, विभिन्न मानवजनित तथा प्राकृतिक गतिविधियों के कारण होने वाले विभिन्न प्रकार के प्रदूषण पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। भारत और दुनिया को विकास एजेंडे के हिस्से के रूप में “हरित दृष्टिकोण” अपनाना चाहिए। अब समय आ गया है कि मूलभूत आवश्यकताओं की सूची में “स्वच्छ पर्यावरण” – “रोटी-कपड़ा-मकान” भी जोड़ दिया जाएँ।

स्रोत:

एनआरडीसी

WHO

राष्ट्रीय भूगोल

एनसीईआरटी

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