भारत की शहरी आय: वृद्धि, असमानताएँ और समावेशी समृद्धि की राह

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत की शहरी आय में ग्रामीण आय की तुलना में सभी वर्गों में तीव्रता से वृद्धि हुई है और यह राष्ट्रीय विकास का प्रमुख चालक बनकर उभरी है। शहरी क्षेत्रों ने श्रम को आत्मसात किया और एक उभरते मध्यम वर्ग को पोषित किया। हालांकि, यह विकास असमान रूप से वितरित है।

भारत की शहरी अर्थव्यवस्था के बारे में

  • यह आर्थिक विकास का मुख्य इंजन बन चुकी है, जो लगभग 60% GDP में योगदान करती है, जबकि इसमें केवल 35% जनसंख्या निवास करती है।
  • तीव्र शहरीकरण, संरचनात्मक परिवर्तन, और सेवा व विनिर्माण क्षेत्रों के विस्तार ने शहरों को उत्पादकता, नवाचार एवं उपभोग के केंद्र के रूप में सुदृढ़ किया है।

भारत की शहरी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ

  • तीव्र आय वृद्धि: 2017–18 से 2023–24 के बीच शहरी आय ग्रामीण आय की तुलना में अधिक तीव्रता से वृद्धि।
    • औपचारिक रोजगार, सेवा क्षेत्र और मध्यम वर्गीय उपभोग का विस्तार।
    • शहर वित्त, आईटी, विनिर्माण और व्यापार के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
  • शहरीकरण प्रवृत्तियाँ: 2030 तक शहरी जनसंख्या लगभग 600 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान (नीति आयोग)।
    • प्रवास और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि से प्रेरित।
  • रोज़गार में योगदान: शहरी क्षेत्र गैर-कृषि रोज़गार के अवसर उत्पन्न करते हैं।
    • हालांकि, अनौपचारिक रोज़गार का बड़ा हिस्सा अभी भी मौजूद है।

उभरती शहरी अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ

  • शहरी–ग्रामीण आय विभाजन: ग्रामीण आय विशेषकर निचले स्तर पर स्थिर बनी हुई है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) और आर्थिक सर्वेक्षण यह दर्शाते हैं कि शहरी-प्रेरित विकास ग्रामीण क्षेत्रों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँचा है।
    • प्रतिस्पर्धात्मकता संस्थान की 2025 की रिपोर्ट (भारत में आय असमानता और श्रम बाज़ार):
      • शीर्ष 10%: ₹44,000 (शहरी) बनाम ₹21,500 (ग्रामीण)
      • शीर्ष 1% आय: ₹90,000 (शहरी), ग्रामीण से लगभग 80% अधिक
      • निचला स्तर: ₹6,000 (शहरी) बनाम ₹3,000 (ग्रामीण)
  • शहरी असमानता: निचले 50% की शहरी आय लगभग 7% CAGR से बढ़ रही है, लेकिन शीर्ष 1% में आय का संकेन्द्रण बढ़ रहा है।
    • शहर संपत्ति उत्पन्न कर रहे हैं, किंतु शीर्ष स्तर पर आय का संकेन्द्रण बढ़ने से शहरी असमानता की चिंता बढ़ रही है।
    • शहरी विकास असमान और विकृत है, जिससे समावेशी विकास पर प्रश्न उठते हैं।
  • अवसंरचना और सेवा प्रदायगी चुनौतियाँ: आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के अनुसार ध्यान प्रायः स्मार्ट सिटी मिशन और मेट्रो रेल जैसी पूंजी-गहन परियोजनाओं पर केंद्रित होता है।
    • जल आपूर्ति, सीवरेज प्रणाली, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक परिवहन की पहुँच की उपेक्षा होती है।
    • सार्वजनिक प्रावधानों में कमी से अनौपचारिक समाधान उत्पन्न होते हैं, जो कम दक्ष और कम न्यायसंगत होते हैं।
  • शहरी श्रम बाज़ार की समस्याएँ:
    • बेरोज़गारी: शहरी बेरोज़गारी लगभग 6.8% (PLFS 2026), जो ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक है।
    • अनौपचारिकता: कार्यबल का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में है, जिसमें नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण का अभाव है।
    • लैंगिक असमानता: महिला LFPR 27.7%; पुरुष LFPR 76.2%; शहरी महिला बेरोज़गारी 9%।
      • शहरी श्रम बाज़ार उच्च उत्पादकता वाले हैं, किंतु विशेषकर महिलाओं के लिए बहिष्करणकारी हैं, जिनमें लैंगिक बाधाएँ और संरचनात्मक अवरोध मौजूद हैं।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ: बिहार, हिमाचल प्रदेश, गोवा, मेघालय जैसे राज्यों में ग्रामीण-शहरी अंतर बढ़ रहा है।
    • शहरी विकास राज्यों में असमान है, जो औद्योगिकीकरण, शासन और अवसंरचना में अंतर को दर्शाता है।

भारत की शहरी अर्थव्यवस्था में समावेशी समृद्धि का मार्ग

समावेशी समृद्धि

समावेशी समृद्धि का तात्पर्य है सभी सामाजिक-आर्थिक समूहों में व्यापक आय वृद्धि, अवसरों, नौकरियों और सेवाओं तक समान पहुँच, तथा क्षेत्रीय, लैंगिक और वर्गीय असमानताओं में कमी।

समावेशी शहरी समृद्धि के स्तंभ

  • शहरी अवसंरचना सुदृढ़ीकरण:  मूलभूत सेवाओं (जल, सीवरेज, गतिशीलता) को प्राथमिकता देना, किफायती आवास (PMAY-Urban) का विस्तार करना, और अंतिम-मील कनेक्टिविटी में सुधार करना।
  • रोज़गार-केंद्रित विकास: MSMEs और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा देना, कौशल विकास (स्किल इंडिया मिशन) को सुदृढ़ करना, तथा अनौपचारिक से औपचारिक रोज़गार में संक्रमण को सुगम बनाना।
  • ग्रामीण–शहरी संबंधों को सुदृढ़ करना:  ग्रामीण गैर-कृषि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करना, द्वितीयक शहरों और विकास क्लस्टरों का विकास करना, तथा कनेक्टिविटी एवं डिजिटल अवसंरचना में सुधार करना।
  • लैंगिक-समावेशी शहरी नीतियाँ:  सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और परिवहन सुनिश्चित करना, किफायती बाल देखभाल एवं लचीली कार्य प्रणाली उपलब्ध कराना, तथा महिलाओं के लिए लक्षित कौशल विकास को बढ़ावा देना।
  • शहरी शासन सुदृढ़ीकरण:  नगरपालिकाओं का वित्तीय विकेंद्रीकरण करना, शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की क्षमता को बढ़ाना, और डेटा-आधारित शहरी नियोजन को लागू करना।

सरकारी पहलों एवं प्रयासों की भूमिका

  • स्मार्ट सिटी मिशन:  प्रौद्योगिकी के माध्यम से शहरी शासन को सुदृढ़ करता है, सेवा प्रदायगी, दक्षता और नागरिक सहभागिता में सुधार करता है। इसका उद्देश्य सतत एवं ‘रहने योग्य’ शहरों का निर्माण है।
  • अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT):  जल आपूर्ति, सीवरेज, हरित क्षेत्र और शहरी गतिशीलता जैसी मूलभूत अवसंरचना को लक्षित करता है, जिससे विशेषकर शहरी गरीबों के जीवन स्तर में सुधार हो।
  • PMAY-Urban (सभी के लिए आवास):  किफायती आवास उपलब्ध कराता है और झुग्गी पुनर्विकास को बढ़ावा देता है, जिससे शहरी आवास की कमी दूर हो तथा जीवन स्तर बेहतर बने।
  • DAY-NULM (राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन):  कौशल विकास, स्वरोज़गार और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) पर केंद्रित है, जिससे शहरी गरीबों को आजीविका के अवसर मिल सकें।
  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी):  स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और जनस्वास्थ्य में सुधार करता है, जिससे जीवन स्थितियाँ एवं उत्पादकता बेहतर होती है।
  • डिजिटल इंडिया मिशन:  ई-गवर्नेंस और डिजिटल पहुँच को बढ़ावा देता है, जिससे पारदर्शिता, सेवा प्रदायगी एवं समावेशन में सुधार होता है।
  • PM गति शक्ति एवं शहरी परिवहन परियोजनाएँ:  कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स दक्षता को बढ़ाती हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों एवं रोजगार सृजन को समर्थन मिलता है।

निष्कर्ष

  • भारत का शहरी रूपांतरण वास्तविक और महत्वपूर्ण है। किंतु इसकी सच्ची सफलता केवल विकास में नहीं, बल्कि इसके व्यापक प्रसार में निहित है।
  • यह सुनिश्चित करना कि समृद्धि क्षेत्रों, आय समूहों और लैंगिक वर्गों में समान रूप से फैले, भारत की विकास यात्रा के आगमी चरण को परिभाषित करेगा।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]भारत की शहरी अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय आय वृद्धि देखी है; तथापि, यह वृद्धि कई दृष्टियों से असमान और बहिष्करणकारी रही है। टिप्पणी कीजिए। समावेशी शहरी समृद्धि सुनिश्चित करने हेतु उपाय सुझाइए।

Source: BS

 

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