सहायता-प्राप्त मृत्यु

पाठ्यक्रम: जीएस-4/नैतिकता; जीएस-2/शासन

सन्दर्भ

  • पोप लियो XIV ने सहायता-प्राप्त मृत्यु को “झूठी करुणा” कहा है, जो इस दृष्टिकोण को मजबूत करता है कि कैथोलिक चर्च के अनुसार गर्भाधान से लेकर प्राकृतिक मृत्यु तक जीवन पवित्र है।

प्रमुख अवधारणाएँ

  • निष्क्रिय इच्छामृत्यु: जीवन रक्षक प्रणाली को रोकना या हटा देना।
  • सक्रिय इच्छामृत्यु: डॉक्टर द्वारा जानबूझकर घातक पदार्थ देना।
  • सहायता-प्राप्त आत्महत्या: डॉक्टर द्वारा उपलब्ध कराए गए घातक पदार्थ को रोगी द्वारा स्वयं लेना।

इसके विरुद्ध तर्क 

  • जीवन की पवित्रता: जीवन एक उपहार है, व्यक्तिगत संपत्ति नहीं। इसे समाप्त करना मानव गरिमा को कमजोर करता है।
  • करुणा की पुनर्परिभाषा: सच्ची करुणा का अर्थ पीड़ित को समाप्त करना नहीं, बल्कि उपशामक देखभाल के माध्यम से बीमार व्यक्ति के साथ बने रहना है।
  • असुरक्षा: बुजुर्ग, दिव्यांग और गरीब रोगी स्वयं को परिवार या स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ समझ सकते हैं।
  • चिकित्सकीय नैतिकता: यह हिप्पोक्रेटिक सिद्धांत “हानि न पहुँचाओ” के विपरीत है और डॉक्टरों में विश्वास को कमजोर करता है।

इसके पक्ष में तर्क

  • स्वायत्तता: व्यक्तियों को अपनी मृत्यु का तरीका तय करने का अधिकार होना चाहिए, विशेष रूप से अपरिवर्तनीय पीड़ा की स्थिति में।
  • गरिमा: अनुच्छेद 21 जीवन जीने में गरिमा के साथ-साथ, विस्तारतः गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को भी समाहित करता है। उदाहरण के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने कॉमन कॉज (2018) मामले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी।
  • पीड़ा से राहत: अंतिम अवस्था की बीमारी अक्सर ऐसी पीड़ा उत्पन्न करती है जिसे उपशामक देखभाल पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती।
  • संसाधनों का उपयोग: लंबे समय तक चलने वाला निष्फल उपचार परिवारों और सीमित आईसीयू क्षमता पर बोझ डालता है।

भारत का दृष्टिकोण

  • अरुणा शानबाग (2011): सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय की निगरानी के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
  • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): निष्क्रिय इच्छामृत्यु और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों (लिविंग विल) को कानूनी मान्यता दी गई।
  • वर्ष 2023 में संशोधन: प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया। अब चिकित्सा बोर्ड निर्धारित समय-सीमा के भीतर निर्णय लेते हैं और लिविंग विल के लिए केवल नोटरी या राजपत्रित अधिकारी का सत्यापन आवश्यक है।
  • सक्रिय इच्छामृत्यु: यह अभी भी अवैध है और भारतीय न्याय संहिता के तहत गैर-इरादतन हत्या संबंधी प्रावधान लागू हो सकते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017: यह आत्महत्या के प्रयासों में गंभीर तनाव की धारणा करता है और व्यवहार में उन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर करता है।
  • उपशामक देखभाल(Palliative care): राष्ट्रीय उपशामक देखभाल कार्यक्रम (2012) मौजूद है, लेकिन इसकी पहुँच अभी भी बहुत सीमित है। केरल का सामुदायिक मॉडल उल्लेखनीय अपवाद है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • कमजोर उपशामक देखभाल अवसंरचना: जब अच्छी चिकित्सा देखभाल उपलब्ध नहीं हो, तब मृत्यु का विकल्प चुनना स्वतंत्र विकल्प नहीं माना जा सकता।
  • कार्यान्वयन संबंधी कमियाँ: बहुत कम लिविंग विल बनाई जाती हैं और अस्पतालों में चिकित्सा बोर्ड की प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्टता का अभाव है।
  • दुरुपयोग का जोखिम: संपत्ति विवाद और परिवार का दबाव सहमति को प्रभावित कर सकते हैं, विशेष रूप से कम स्वास्थ्य साक्षरता और अधिक व्यक्तिगत स्वास्थ्य व्यय की स्थिति में।
  • निर्णय लेने की क्षमता का निर्धारण: अवसाद मृत्यु की इच्छा जैसा प्रतीत हो सकता है, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य की जाँच आवश्यक है।
  • नैतिक बहुलवाद: भारत की धार्मिक विविधता जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर एक समान दृष्टिकोण को विवादास्पद बनाती है।
  • डॉक्टर की दुविधा: कानूनी दायित्व के भय से रक्षात्मक चिकित्सा को बढ़ावा मिलता है और या तो अत्यधिक उपचार या अपर्याप्त उपचार की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

आगे की राह

  • पहले उपशामक देखभाल को मजबूत करना: इसे आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में एकीकृत किया जाए तथा डॉक्टरों और नर्सों को प्रशिक्षित किया जाए।
  • स्पष्ट कानून: जीवन के अंतिम चरण से संबंधित निर्णयों पर एक समर्पित कानून, जैसा कि विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट (2012) और 196वीं रिपोर्ट (2006) में अनुशंसित किया गया था, केवल न्यायिक दिशानिर्देशों पर निर्भरता को समाप्त करेगा।
  • सुरक्षा उपाय: इनमें कई स्वतंत्र चिकित्सकीय राय, मनोरोग मूल्यांकन, निर्णय पर पुनर्विचार के लिए निर्धारित अवधि तथा न्यायिक या बोर्ड की निगरानी शामिल होनी चाहिए।
  • जागरूकता: डिजिटल रजिस्ट्रियों के माध्यम से लिविंग विल को बढ़ावा दिया जाए, जैसे उन्हें आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत स्वास्थ्य अभिलेखों से जोड़ा जाना।
  • नैतिकता समितियाँ: पारदर्शी निर्णयों के लिए अस्पतालों में स्थायी जैव-नैतिकता समितियाँ स्थापित की जानी चाहिए।
  • अंतरराष्ट्रीय अनुभव से सीख: पात्रता के विस्तार के संबंध में बेल्जियम और नीदरलैंड के अनुभव तथा कड़े विनियमन के संबंध में स्विट्जरलैंड और ओरेगन के मॉडलों का अध्ययन किया जाना चाहिए।

स्रोत: HT

 

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