सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विद्यालयों में अनिवार्य प्रवेश बरकरार 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विद्यार्थियों के अनिवार्य प्रवेश को राष्ट्रीय मिशन बताते हुए बरकरार रखा।

निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ

  • पड़ोस के विद्यालय, जिनमें निजी अप्रतिबद्ध संस्थान भी शामिल हैं, राज्य सरकार द्वारा आवंटित विद्यार्थियों को बिना विलंब प्रवेश देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।
  • कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को प्रवेश न देना संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत उनके शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
    • न्यायालय ने बल दिया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत ऐसे विद्यार्थियों के लिए 25% आरक्षण समाज की सामाजिक संरचना को परिवर्तित करने और समानता को बढ़ावा देने की क्षमता रखता है।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि एक बार राज्य चयनित विद्यार्थियों की सूची अग्रेषित कर देता है तो विद्यालयों के पास प्रवेश देने से इनकार करने का कोई विकल्प नहीं होता।
  • न्यायालय ने चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार की बाधा शिक्षा के अधिकार को एक खोखला वादा बना देगी।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम

  • विकासक्रम: भारतीय संविधान में शिक्षा एक समवर्ती विषय है और इस पर केंद्र एवं राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
    • शिक्षा का अधिकार (RTE) प्रारंभ में अनुच्छेद 45 के अंतर्गत राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) में था, बाद में इसे मौलिक अधिकार बनाया गया।
    • 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के माध्यम से इसे गैर-न्यायिक DPSP से भाग III में स्थानांतरित कर अनुच्छेद 21A के अंतर्गत मौलिक अधिकार बनाया गया, जिससे यह प्रवर्तनीय अधिकार बन गया।
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) संसद द्वारा 2009 में अधिनियमित किया गया।
  • 2010 में अधिनियम लागू होने पर भारत उन 135 देशों में शामिल हुआ जिन्होंने शिक्षा को प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार बनाया।
  • मुख्य प्रावधान: अधिनियम 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है और प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम मानक निर्दिष्ट करता है।
    • सभी सरकारी विद्यालयों को सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करनी होगी।
    • सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों को प्राप्त वित्तीय सहायता के अनुपात में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करनी होगी, न्यूनतम 25% तक।
    • सभी निजी विद्यालयों को 25% सीटें बच्चों के लिए आरक्षित करनी होंगी (राज्य द्वारा प्रतिपूर्ति की जाएगी, सार्वजनिक-निजी भागीदारी योजना के अंतर्गत)।
      • निजी विद्यालयों में बच्चों का प्रवेश आर्थिक स्थिति या जाति आधारित आरक्षण के आधार पर होता है।
    • अधिनियम यह भी प्रावधान करता है कि किसी भी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने तक रोका, निष्कासित या बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
    • विद्यालय छोड़ चुके बच्चों को विशेष प्रशिक्षण देने का भी प्रावधान है ताकि वे समान आयु के विद्यार्थियों के स्तर तक पहुँच सकें।

निर्णय का महत्व

  • सार्वभौमिक पहुँच: संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है।
  • सामाजिक समानता: वंचित समूहों के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से समावेशन को बढ़ावा देता है, जाति, लिंग और आर्थिक असमानताओं को कम करता है।
  • मानव पूंजी विकास: शिक्षित कार्यबल का निर्माण करता है, जो आर्थिक वृद्धि और जनसांख्यिकीय लाभ को समर्थन देता है।
  • सशक्तिकरण: शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत समान विद्यालय प्रणाली की दृष्टि को सुदृढ़ करता है, जैसा कि कोठारी आयोग ने प्रस्तावित किया था।
  • राष्ट्र निर्माण एवं वैश्विक लक्ष्य: समावेशी विकास को समर्थन देता है और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) के अनुरूप है।

 स्रोत: AIR

 

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