पाठ्यक्रम: जीएस-2/अंतराष्ट्रीय सम्बन्ध; जीएस-3/रक्षा
सन्दर्भ
- भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारतीय सेना के लिए लगभग 60 जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों (ATGMs) की खरीद के लिए ₹292 करोड़ के सरकारी-से-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
जेवलिन क्या है?
- FGM-148 जेवलिन एक मानव-पोर्टेबल, फायर-एंड-फॉरगेट एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) है, जिसे अमेरिकी सेना के लिए लॉकहीड मार्टिन और RTX के जेवलिन संयुक्त उद्यम द्वारा विकसित और निर्मित किया गया है।
- इसे मुख्य रूप से टैंकों और अन्य बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है, लेकिन यह बंकरों, मजबूत किलेबंद स्थानों और इमारतों को भी निशाना बना सकती है।
- इसका इन्फ्रारेड सीकर प्रक्षेपण से पहले ही लक्ष्य को लॉक कर लेता है, जिससे निरंतर मार्गदर्शन की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
- इसकी प्रमुख विशेषता टॉप-अटैक क्षमता है। प्रक्षेपण के बाद मिसाइल लगभग 150 मीटर की ऊँचाई तक जाती है और फिर ऊपर से लक्ष्य पर हमला करती हुई नीचे आती है, जहाँ टैंक का कवच सामान्यतः कमजोर होता है।
- FGM-148F संस्करण की मारक क्षमता लगभग 4.75 किमी है। जेवलिन का पहली बार युद्ध में इस्तेमाल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व वाले इराक पर आक्रमण के दौरान हुआ था और 2022 में रूस के आक्रमण के बाद यूक्रेन द्वारा रूसी बख्तरबंद बलों के विरुद्ध इसके इस्तेमाल से इसे फिर से प्रमुखता मिली।
भारत को इसकी आवश्यकता क्यों है?
- भारतीय सेना ने ऐतिहासिक रूप से फ्रांसीसी मूल की मिलान-2T और सोवियत मूल की 9M113 Konkurs-M जैसी प्रणालियों का संचालन किया है, जो पुरानी पीढ़ी की ATGM हैं।
- डीआरडीओ द्वारा विकसित भारत की स्वदेशी NAG तीसरी पीढ़ी की, फायर-एंड-फॉरगेट ATGM है, जिसमें टॉप-अटैक क्षमता है। इसे NAMICA और ALH (एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर) जैसे प्लेटफॉर्म से तैनात किया जाता है।
- हालांकि, जेवलिन एक मानव-पोर्टेबल ATGM है, जो मुख्य रूप से प्लेटफॉर्म-आधारित NAG से अलग क्षमता प्रदान करती है और इसे सेना के एंटी-आर्मर शस्त्रागार में एक उपयोगी अतिरिक्त बनाती है।
भारत-अमेरिका रक्षा संबंध
- रक्षा संबंध लेन-देन आधारित संबंधों से आगे बढ़कर प्रमुख रक्षा साझेदारी (Major Defense Partnership) में परिवर्तित हुए हैं (2016)।
- निम्नलिखित तंत्रों द्वारा निर्देशित:
- 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद
- रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार पहल (DTTI) (2012)
- सैन्य सहयोग समूह (MCG)
- भारत को “प्रमुख रक्षा साझेदार” (Major Defense Partner) का दर्जा दिया गया तथा स्ट्रैटेजिक ट्रेड ऑथराइजेशन-1 (STA-1) का दर्जा (2018) प्रदान किया गया, जिससे उच्च-प्रौद्योगिकी के निर्यात में सुगमता हुई।
- भारत ने अमेरिका के साथ सभी चार प्रमुख बुनियादी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं:
- जनरल सिक्योरिटी ऑफ मिलिटरी इन्फॉर्मेशन एग्रीमेंट (GSOMIA) 2002 में और लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) 2016 में।
- COMCASA (2018) – सुरक्षित संचार और अंतर-संचालनीयता।
- बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट फॉर जियो-स्पेशियल कोऑपरेशन (BECA 2020) – सटीक लक्ष्य निर्धारण के लिए भू-स्थानिक खुफिया और उपग्रह डेटा।
- सैन्य अभ्यास: भारत के किसी भी देश के साथ होने वाले सबसे व्यापक सैन्य अभ्यासों में से एक।
- युद्ध अभ्यास: थल सेनाएँ।
- मालाबार: अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ नौसैनिक चतुष्पक्षीय अभ्यास।
- कोप इंडिया: वायु सैन्य अभ्यास।
- टाइगर ट्रायम्फ: तीनों सेनाओं का HADR अभ्यास।
- वज्र प्रहार: विशेष बलों का अभ्यास।
भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में चुनौतियाँ
- भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अपनी गुटनिरपेक्ष स्थिति बनाए रखना चाहता है, अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करते हुए रूस और फ्रांस के साथ रक्षा संबंध भी जारी रखता है।
- अमेरिकी नीति में अनिश्चितता: बदलते प्रशासन से प्रभावित अमेरिकी विदेश नीति की लेन-देन आधारित प्रकृति अनिश्चितता का तत्व जोड़ती है।
- भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी रक्षा रणनीति किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भर न हो।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर प्रतिबंध: अमेरिका संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकी साझा करने को लेकर सतर्क रहता है।
- स्वदेशी रक्षा क्षमताएँ: साझेदारी से उन्नत प्रौद्योगिकियाँ तो प्राप्त हुई हैं, लेकिन इससे भारत के स्वदेशी रक्षा विनिर्माण को पर्याप्त रूप से बढ़ावा नहीं मिला है।
- CAATSA और प्रतिबंधों संबंधी चिंताएँ: भारत द्वारा रूसी S-400 मिसाइल रक्षा प्रणालियों की खरीद से CAATSA कानून के तहत अमेरिकी प्रतिबंधों का जोखिम उत्पन्न होता है।
- नौकरशाही संबंधी बाधाएँ: जटिल खरीद प्रक्रियाएँ और नीतिगत असंगतियाँ रक्षा सहयोग को धीमा करती हैं।
आगे की राह
- साझेदारियों का विविधीकरण: भारत को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए अनेक रक्षा साझेदारों के साथ जुड़ाव जारी रखना चाहिए।
- आत्मनिर्भरता पर ध्यान: एक मजबूत घरेलू रक्षा उद्योग के निर्माण के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- संतुलित कूटनीति: अमेरिका के साथ संबंधों को गहरा करते हुए भारत को अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ भी मजबूत संबंध बनाए रखने चाहिए, ताकि संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित की जा सके।
स्रोत: TOI
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