पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
चर्चा में क्यों?
- हाल ही में, भारत के प्रधानमंत्री ने प्रश्नपत्र लीक मामलों में शामिल दोषियों के शीघ्र विचारण तथा कठोर दंड सुनिश्चित करने के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTCs) स्थापित करने की घोषणा की।
फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTCs)
- फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स विशेष न्यायालय हैं, जिन्हें लंबे समय से लंबित मामलों, विशेषकर जघन्य अपराधों तथा संवेदनशील वर्गों के विरुद्ध अपराधों के शीघ्र विचारण एवं निपटान के लिए स्थापित किया जाता है।
- इनसे नियमित अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों का भारी बोझ कम करने तथा शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है।
फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स से संबंधित कानून एवं विनियम
- भारत में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTCs) को संचालित करने वाला कोई एकल कानून नहीं है।
- विशिष्ट वर्गों के लिए समर्पित न्यायालय स्थापित करने की पहल चौदहवें वित्त आयोग (2015–2020) की सिफारिशों से हुई, जिसने हत्या, अपहरण, रंगदारी जैसे जघन्य अपराधों तथा पाँच वर्ष से अधिक समय से लंबित संपत्ति विवादों के शीघ्र निपटान हेतु 1,800 त्वरित न्यायालय स्थापित करने की अनुशंसा की थी।
- आयोग ने महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग व्यक्तियों तथा असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों जैसे संवेदनशील वर्गों से संबंधित मामलों के लिए भी इन न्यायालयों की सिफारिश की।
संशोधन
- वर्ष 2019 में, आपराधिक कानूनों में संशोधन तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs) स्थापित करने हेतु एक केंद्र प्रायोजित योजना प्रारंभ की।
- निर्भया निधि से आंशिक रूप से वित्तपोषित ये विशेष न्यायालय विशेष रूप से बलात्कार के मामलों तथा यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के अंतर्गत आने वाले मामलों के समयबद्ध विचारण के लिए समर्पित हैं।
फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए समय-सीमा
- भारत में वादकारियों को किसी निश्चित समय-सीमा के भीतर मुकदमे के निपटान का वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
- हालांकि, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अनुसार आपराधिक मुकदमों का आदर्श रूप से दो वर्ष के भीतर तथा यौन अपराधों से संबंधित मामलों का दो माह के भीतर निपटारा किया जाना चाहिए।
- फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs) की केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत प्रत्येक न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह प्रति तिमाही 41–42 मामलों अथवा प्रति वर्ष कम-से-कम 165 मामलों का निपटान करे।
न्यायिक टिप्पणियाँ
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स अथवा स्पेशल कोर्ट्स को अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का पालन करना होगा।
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार (1952) मामले में न्यायालय ने कहा कि केवल शीघ्र विचारण के उद्देश्य से मामलों को विशेष न्यायालयों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए अपराध की प्रकृति या पीड़ितों की संवेदनशीलता जैसे युक्तिसंगत एवं वस्तुनिष्ठ आधार होने चाहिए।
- हालांकि, बाद के मामलों में न्यायालयों ने सत्यम घोटाला तथा 2G स्पेक्ट्रम मामला जैसे अत्यधिक सार्वजनिक महत्त्व के मामलों में शीघ्र विचारण हेतु विशेष न्यायालयों की अनुमति दी।
- पी.रामचन्द्र राव बनाम कर्नाटक राज्य (2002) मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सात-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि सभी आपराधिक मुकदमों के निपटान के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती।
- न्यायालय ने कहा कि केवल विलंब के आधार पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित करना न्यायिक विधिनिर्माण होगा, जो न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
प्रगति
- जनवरी 2026 तक 21 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 862 नियमित फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTCs) कार्यरत थे।
- इनके साथ 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 774 फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs), जिनमें 398 विशिष्ट पॉक्सो (POCSO) कोर्ट्स शामिल हैं, कार्यरत थे।
- इन स्पेशल कोर्ट्स की निपटान दर लगभग 96% है, अर्थात् मामलों का या तो विचारण हुआ अथवा उनका निस्तारण किया गया।
- वर्ष 2024 में FTSCs में 88,902 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 85,595 मामलों का निपटान किया गया।
- औसतन, एक FTSC प्रति माह लगभग 9.5 मामलों का निपटान करता है, जो समान अधिकारिता वाले एक नियमित विचारण न्यायालय द्वारा प्रति माह निपटाए जाने वाले 3.3 मामलों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है।
मुद्दे एवं चुनौतियाँ
- उच्च निपटान दर के बावजूद, मुकदमों की बड़ी संख्या के कारण लंबित मामलों की समस्या बनी हुई है।
- 2023 के अंत तक FTSCs में 2.4 लाख से अधिक मामले लंबित थे।
- न्यायिक विलंब के प्रमुख कारणों में अपर्याप्त आधारभूत संरचना, जटिल मामले, कमजोर जाँच, अपर्याप्त न्यायालयिक विज्ञान (फोरेंसिक) सहायता, न्यायाधीशों की कमी तथा प्रक्रियागत अक्षमताएँ शामिल हैं।
- विधि विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त आधारभूत संरचना एवं न्यायिक क्षमता के बिना केवल फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स न्यायिक लंबित मामलों की समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
- यद्यपि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामलों में FTCs सफल रहे हैं, किंतु पॉक्सो (POCSO) तथा अन्य आपराधिक मामलों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों एवं विशिष्ट न्यायाधीशों की अनुपलब्धता के कारण उनकी प्रभावशीलता सीमित रही है।
निष्कर्ष एवं आगे की राह
- फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTCs) प्राथमिकता वाले मामलों में शीघ्र न्याय प्रदान करने तथा न्यायिक लंबित मामलों को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, जिससे “विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करना है” के सिद्धांत को सार्थक बनाया जा सकता है।
- इनकी सफलता के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना, पर्याप्त न्यायिक मानव संसाधन, गुणवत्तापूर्ण जाँच, सुदृढ़ न्यायालयिक विज्ञान (फोरेंसिक) सहायता, प्रौद्योगिकी का समेकन तथा प्रक्रियागत दक्षता आवश्यक है।
- यह सुनिश्चित करने के लिए कि शीघ्र न्याय, निष्पक्षता की कीमत पर न हो, न्यायिक एवं संस्थागत सुधारों का एक व्यापक कार्यक्रम आवश्यक है, जिससे समयबद्ध एवं निष्पक्ष न्याय के संवैधानिक वादे को पूरा किया जा सके।
स्रोत: IE
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