पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
संदर्भ
- रक्षा मंत्रालय ने छठी सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (PIL) अधिसूचित की है, जिसमें 405 वस्तुएँ शामिल हैं। इन वस्तुओं में अनुमानित 3,070 करोड़ रुपये की व्यावसायिक संभावनाएँ हैं।
परिचय
- यह सूची रक्षा उत्पादन विभाग (DDP) द्वारा अधिसूचित की गई है। इसमें प्रमुख रक्षा प्लेटफॉर्मों के लिए लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स (LRU), उप-प्रणालियाँ, उप-संयोजन, स्पेयर पार्ट्स, घटक तथा कच्चा माल शामिल हैं।
- इनमें एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, चेतक और चीता हेलीकॉप्टर; Su-30MKI, जगुआर और MiG-29 जैसे लड़ाकू विमान; लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) तथा AL-31FP इंजन से संबंधित वस्तुएँ शामिल हैं।
- छठी सूची आत्मनिर्भर भारत पहल के अंतर्गत रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- इससे घरेलू रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने, निवेश एवं नवाचार को बढ़ावा देने तथा आयात पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलने की अपेक्षा है।
- सूची में शामिल सभी वस्तुओं का निर्धारित समय-सीमा के भीतर स्वदेशीकरण किया जाना आवश्यक है। एक बार इनके सफलतापूर्वक देश में विकसित हो जाने के बाद, इनकी खरीद केवल भारतीय उद्योग से की जाएगी।
भारत में रक्षा उत्पादन
- भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। यह विगत वित्त वर्ष की तुलना में 15.6% की वृद्धि को दर्शाता है।
- क्षेत्रवार योगदान: रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने कुल उत्पादन में लगभग 76% का योगदान दिया, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान 24% रहा।
- रक्षा बजट में वृद्धि: रक्षा बजट 2013-14 में 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 6.81 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
- भारत वित्त वर्ष 2025-26 तक 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात कर रहा है।
- स्वदेशी रक्षा उत्पादन में वृद्धि: अब लगभग 65% रक्षा उपकरणों का विनिर्माण देश में ही किया जा रहा है। यह पहले विद्यमान 65-70% आयात निर्भरता की तुलना में एक महत्वपूर्ण बदलाव है।
- भारत ने 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिससे वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में उसकी स्थिति सुदृढ़ होगी।
रक्षा स्वदेशीकरण सुधारों की आवश्यकता
- रणनीतिक स्वायत्तता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा: विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होती है, विशेषकर संकट और भू-राजनीतिक तनाव के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलती है।
- क्षमता संबंधी कमियों को दूर करना: भारत को अपनी सीमाओं तथा हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सेना, नौसेना और वायु सेना के पुराने प्लेटफॉर्मों को बदलने के लिए आधुनिकीकरण आवश्यक है।
- आयात बिल में कमी एवं आर्थिक दक्षता को बढ़ावा: भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में शामिल है। स्वदेशी उत्पादन दीर्घकाल में लागत कम करता है, विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को घटाता है तथा घरेलू रक्षा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता है।
- घरेलू रक्षा औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करना: स्वदेशीकरण रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs), MSMEs तथा निजी उद्योग में नवाचार और विकास को प्रोत्साहित करता है।
- त्वरित खरीद एवं परिचालन तत्परता: घरेलू विनिर्माण से खरीद प्रक्रिया की अवधि कम होती है और उपकरणों की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- बेहतर अनुकूलन एवं अनुकूलनीयता: स्वदेशी प्लेटफॉर्मों को भारतीय परिस्थितियों—जैसे हिमालयी उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र, रेगिस्तान और समुद्री क्षेत्र—के अनुरूप तैयार किया जा सकता है। इससे बदलते सुरक्षा खतरों के अनुरूप निरंतर उन्नयन संभव होता है।
- प्रौद्योगिकी संप्रभुता: स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास डिजाइन, उत्पादन और भविष्य के उन्नयन में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इससे प्रतिबंधों, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान अथवा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से इनकार के कारण उत्पन्न संवेदनशीलता भी कम होती है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- भारत अभी भी कई उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों और महत्वपूर्ण घटकों के लिए आयात पर निर्भर है।
- रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर व्यय अभी भी तुलनात्मक रूप से सीमित है।
- जेट इंजन, सेमीकंडक्टर, साइबर युद्ध तथा उन्नत सेंसर जैसे क्षेत्रों में तकनीकी अंतर विद्यमान हैं।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी को अभी भी नियामकीय एवं खरीद संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- रक्षा निर्यात में वैश्विक प्रतिस्पर्धा हासिल करने के लिए निरंतर निवेश और प्रभावी गुणवत्ता आश्वासन तंत्र आवश्यक हैं।
रक्षा अधिग्रहण एवं स्वदेशीकरण सुधार
- भारतीय-IDDM पर केंद्रित DAP 2020: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP), 2020 में ‘Buy (भारतीय-स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित)’ श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, ताकि प्रमुख रक्षा खरीद भारतीय स्रोतों से की जा सके।
- सरलीकृत ‘Make’ प्रक्रिया: यह भारतीय उद्योग को रक्षा उत्पादों के डिजाइन, विकास और विनिर्माण के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होती है।
- Make-I के अंतर्गत सरकार विकास लागत का 70% तक वित्तपोषण करती है तथा कुछ परियोजनाएँ MSMEs के लिए आरक्षित रखती है।
- Make-II श्रेणी उद्योग द्वारा वित्तपोषित है। इसमें पात्रता संबंधी नियमों में छूट, न्यूनतम कागजी कार्रवाई तथा उद्योग या व्यक्तियों से प्रस्ताव स्वीकार करने की व्यवस्था है।
- अब तक सेना, नौसेना और वायु सेना की 62 परियोजनाओं को ‘सैद्धांतिक अनुमोदन ’ प्राप्त हो चुका है।
- रक्षा क्षेत्र में उदारीकृत FDI: नई रक्षा औद्योगिक लाइसेंस वाली परियोजनाओं के लिए स्वचालित मार्ग से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा 74% तक बढ़ाई गई है। उन्नत प्रौद्योगिकी तक पहुंच से संबंधित मामलों में सरकारी अनुमोदन के माध्यम से यह सीमा 100% तक हो सकती है।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे: उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारा (UPDIC) और तमिलनाडु रक्षा औद्योगिक गलियारा (TNDIC) इस परिवर्तन के प्रमुख आधार हैं।
- वर्ष 2025 में इन गलियारों ने 9,145 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित किया, जिसके लिए 289 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए।
- रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना (DTIS): रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना (DTIS) का उद्देश्य एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में आठ ग्रीनफील्ड परीक्षण एवं प्रमाणन सुविधाएँ स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करके स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना है।
- मानवरहित हवाई प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और संचार जैसे क्षेत्रों में सात परीक्षण सुविधाओं को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है।
- नवाचार को बढ़ावा: iDEX एवं TDF
- रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (iDEX) को 2018 में शुरू किया गया था। यह स्टार्टअप, MSMEs, शिक्षाविदों और नवप्रवर्तकों को रक्षा एवं एयरोस्पेस के लिए प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु अनुदान और वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- प्रौद्योगिकी विकास निधि (TDF) योजना भी उद्योगों, विशेषकर स्टार्टअप और MSMEs, को रक्षा प्रौद्योगिकियों में नवाचार, अनुसंधान एवं विकास के लिए 10 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल: इसे 2017 में भारतीय कंपनियों और वैश्विक मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) के बीच दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित करने के लिए शुरू किया गया था।
- इन साझेदारियों का मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा भारत में विनिर्माण अवसंरचना की स्थापना करना है।
- स्वदेशीकरण पोर्टल: SRIJAN पोर्टल, जिसे 2020 में शुरू किया गया था, पहले आयात की जाने वाली रक्षा वस्तुओं की सूची उपलब्ध कराता है तथा उद्योगों को उन्हें देश में विकसित करने के लिए आमंत्रित करता है।
- रक्षा क्षेत्र में कारोबार सुगमता: औद्योगिक लाइसेंस की आवश्यकता वाले रक्षा उत्पादों को युक्तिसंगत बनाया गया है और अधिकांश पुर्जों एवं घटकों के लिए अब लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है।
- औद्योगिक लाइसेंस की वैधता अवधि 3 वर्ष से बढ़ाकर 15 वर्ष कर दी गई है तथा इसमें अतिरिक्त 3 वर्ष के विस्तार की संभावना है। इससे निवेश की दीर्घकालिक योजना बनाना आसान हुआ है।
आगे की राह
- भारत को उभरती हुई रक्षा प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को और मजबूत करना चाहिए।
- DRDO, निजी उद्योगों, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के बीच अधिक व्यापक सहयोग आवश्यक है।
- रक्षा औद्योगिक गलियारों और विनिर्माण क्लस्टरों का और विस्तार किया जाना चाहिए।
- उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए कुशल कार्यबल तैयार करने हेतु विशेषीकृत कौशल विकास एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।
स्रोत: IE
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