पाठ्यक्रम : GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- भारत के विदेश मंत्री ने व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग के 26वें सत्र के लिए मास्को का दौरा किया।
बारे में
- विदेश मंत्री रूस की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं, जो भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में आई तनाव की पृष्ठभूमि में हो रही है।
- यह यात्रा चीन के तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति के बीच बैठक की संभावना के बीच हो रही है।
- इसके अतिरिक्त, इस वर्ष के अंत में रूसी राष्ट्रपति की संभावित भारत यात्रा पर भी चर्चा चल रही है।
एजेंडा और प्रस्ताव
- उद्देश्य: व्यापार साझेदारी को सुदृढ़ करना और रूस से भारत के बढ़ते तेल आयात के कारण उत्पन्न 58.9 बिलियन डॉलर के व्यापार घाटे को कम करना।
- बाधाओं का समाधान: टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना।
- संपर्क को बढ़ावा: प्रमुख मार्गों, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी), उत्तरी समुद्री मार्ग, चेन्नई-व्लादिवोस्तोक गलियारे के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देना।
- व्यापार विविधीकरण: भुगतान तंत्र को सुव्यवस्थित करना, भारत-यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर शीघ्र हस्ताक्षर।
- व्यावसायिक सहभागिता: अधिक गहन B2B संपर्क; रूसी कंपनियों को मेक इन इंडिया के अवसरों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना।
- रणनीतिक लक्ष्य:
- 2030 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संशोधित व्यापार लक्ष्य।
- विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ बनाना।
भारत की प्रमुख चिंता
- व्यापार असंतुलन में वृद्धि: विगत चार वर्षों में, भारत-रूस वस्तुओं का व्यापार 2021 में 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 68 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, लेकिन व्यापार घाटा भी 6.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 58.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।
- व्यापार संतुलन और बाजार विविधीकरण: अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात गंतव्यों में से एक है, उच्च टैरिफ भारत के अमेरिका के साथ व्यापार घाटे में अधिक वृद्धि कर सकते हैं, जब तक कि भारत वैकल्पिक बाजार नहीं ढूंढता।
- ऊर्जा सुरक्षा दबाव: रूसी तेल खरीद पर अतिरिक्त 25% जुर्माना भारत की किफायती ऊर्जा आयात सुनिश्चित करने की रणनीति को सीधे प्रभावित करता है। यह भारत को गैर-रूसी तेल के लिए अधिक कीमत चुकाने के लिए सुदृढ़ कर सकता है, जिससे मुद्रास्फीति और चालू खाता शेष प्रभावित हो सकता है।
- रणनीतिक साझेदारियों में कूटनीतिक तनाव: टैरिफ भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को कमजोर करते हैं, विशेषकर निम्नलिखित क्षेत्रों में:
- क्वाड सहयोग (हिंद-प्रशांत)।
- रक्षा प्रौद्योगिकी और सह-उत्पादन।
- सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग।
- व्यापार युद्धों का जोखिम: भारत को जवाबी टैरिफ लगाने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिससे व्यापार युद्ध बढ़ने का खतरा है।
- यह भारत के खुद को एक विश्वसनीय वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में स्थापित करने के व्यापक लक्ष्य को बाधित कर सकता है।
- भारत-रूस सहयोग से भारत को अमेरिकी शुल्क बाधाओं का सामना करने में क्या लाभ मिल सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा और लागत लाभ: रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात भारत को अमेरिकी दंडों के बावजूद अपनी ऊर्जा टोकरी को स्थिर रखने में सहायता करता है।
- इससे आयात लागत कम होती है, मुद्रास्फीति नियंत्रित होती है और निर्यातकों को उच्च अमेरिकी टैरिफ के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है।
- बाज़ार विविधीकरण: रूस (और व्यापक यूरेशियन क्षेत्र) भारतीय निर्यात के लिए वैकल्पिक बाज़ार प्रदान करता है जिससे अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है।
- प्रस्तावित भारत-यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) मुक्त व्यापार समझौता (FTA) रूस, बेलारूस, आर्मेनिया, कज़ाकिस्तान और किर्गिस्तान के प्रमुख व्यापारिक केंद्र तक विशेष पहुँच उपलब्ध कराई जा सकती है।
- संपर्क और रसद लाभ: अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा और उत्तरी समुद्री मार्ग जैसी परियोजनाएँ यूरोप एवं मध्य एशिया को निर्यात के लिए परिवहन समय और लागत को कम कर सकती हैं।
- यह अमेरिकी शुल्कों के कारण होने वाली प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी की भरपाई करता है।
- राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान तंत्र: रुपया-रूबल निपटान प्रणालियों को सुदृढ़ करने से भारत अमेरिका द्वारा लगाए गए डॉलर-प्रधान व्यापार प्रतिबंधों से सुरक्षित रहता है।
- रक्षा और सामरिक तकनीकी सहयोग: रूस रक्षा प्रौद्योगिकी और परमाणु ऊर्जा सहयोग का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अमेरिका प्रतिबंध लगा सकता है।
- रूस के साथ मज़बूत संबंध यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए अमेरिका पर निर्भर न रहे।
- औद्योगिक एवं विनिर्माण अवसर: रूस का कच्चा माल निर्यात (ऊर्जा, उर्वरक, धातु) भारत के विनिर्माण आधार के साथ मिलकर “मेक इन इंडिया” के अंतर्गत संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा दे सकता है।
- इससे नई मूल्य श्रृंखलाएँ निर्मित होंगी जो टैरिफ के प्रति संवेदनशील पश्चिमी-प्रभुत्व वाले आपूर्ति नेटवर्क पर निर्भरता को कम करेंगी।
- भू-राजनीति में रणनीतिक संतुलन: रूस के साथ विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को गहरा करना अमेरिका को यह संकेत देता है कि भारत के पास व्यवहार्य विकल्प हैं।
- इससे अमेरिका से टैरिफ राहत प्राप्त करने में भारत की बातचीत की स्थिति बेहतर हो सकती है।
निष्कर्ष
- भारत-रूस साझेदारी, अमेरिका के टैरिफ और भू-राजनीतिक दबाव के समय भारत को ऊर्जा सुरक्षा, बाज़ार विविधीकरण एवं रणनीतिक स्वायत्तता प्रदान करती है।
- रूसी संबंधों का लाभ उठाकर, भारत 2030 तक रूस के साथ 100 अरब डॉलर के अपने दीर्घकालिक व्यापार लक्ष्य को प्राप्त करने के साथ-साथ अमेरिकी व्यापार प्रतिबंधों के प्रति अपनी संवेदनशीलता को कम कर सकता है।
Source: TH
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