भारत की समुद्री सुरक्षा

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; आंतरिक सुरक्षा

समाचार में  

  • हाल ही में रक्षा मंत्री ने वैश्विक समुद्री समुदाय से समुद्र में उत्पन्न हो रही जटिल और विकसित चुनौतियों का समाधान करने हेतु सहयोग का आह्वान किया। उन्होंने विशाखापट्टनम में मिलन 2026 अभ्यास का उद्घाटन करते हुए आपसी विश्वास, साझा उत्तरदायित्व और अंतर्राष्ट्रीय कानून के पालन पर बल दिया।

भारत की समुद्री सुरक्षा  

  • समुद्री सुरक्षा का तात्पर्य राष्ट्र की संप्रभुता को महासागरों और समुद्रों से उत्पन्न खतरों से सुरक्षित रखना है।
  • इसमें तटीय क्षेत्रों की रक्षा, उपलब्ध समुद्री संसाधनों जैसे मछली, अपतटीय तेल और गैस कुएँ, बंदरगाह सुविधाएँ आदि की सुरक्षा शामिल है।
  • इसका अर्थ यह भी है कि हमारे जहाज़ों की समुद्र में स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित हो और व्यापार को सुगम एवं सुरक्षित बनाया जाए।

महत्त्व

  • यह भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अधिकांश व्यापार एवं ऊर्जा आपूर्ति भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) से होकर गुजरती है।
  • भारत का तटवर्ती क्षेत्र—मुख्यभूमि, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप सहित—समुद्री डकैती, तस्करी, घुसपैठ, तथा बंदरगाहों एवं रक्षा प्रतिष्ठानों पर खतरे जैसी अनेक सुरक्षा चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है।
  • समुद्री क्षेत्र की रक्षा सुरक्षा, संसाधनों के संरक्षण और सतत व्यापार एवं आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।

चुनौतियाँ और मुद्दे

  • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: इंडो-पैसिफिक में बढ़ते तनाव, विशेषकर चीन के नौसैनिक विस्तार से सामरिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • समुद्री आतंकवाद और डकैती: गैर-राज्यीय तत्वों से खतरे, भारतीय महासागर में समुद्री डकैती और बंदरगाहों व अपतटीय परिसंपत्तियों पर संभावित आतंकी हमले गंभीर चिंता का विषय हैं।
  • आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान: समुद्री मार्गों की नाकेबंदी या साइबर हमलों की संवेदनशीलता भारत के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
  • अवैध गतिविधियाँ: तस्करी, साइबर खतरे, मानव तस्करी और अवैध मछली पकड़ना समुद्री शासन को कमजोर करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएँ: समुद्र स्तर में वृद्धि, चक्रवात और पर्यावरणीय क्षरण तटीय अवसंरचना एवं आजीविका को खतरे में डालते हैं।

भारत के कदम और पहलें

  • भारत का ‘महासागर’ दृष्टिकोण (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति): पूर्व की सागर नीति पर आधारित, यह सहयोगात्मक समुद्री सुरक्षा और समृद्धि के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • नौसैनिक आधुनिकीकरण: विमानवाहक पोत, पनडुब्बियाँ और उन्नत निगरानी प्रणालियों के साथ भारतीय नौसेना का विस्तार।
  • बहुपक्षीय सहयोग: मिलन जैसे अभ्यास विश्वभर की नौसेनाओं को एक साथ लाते हैं, जिससे पारस्परिक संचालन क्षमता और सामूहिक सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
  • मिलन 2026: विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश में आयोजित, इसमें 74 देशों के नौसेना प्रमुख और प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए, जिससे भारत की विश्वसनीय समुद्री साझेदार की भूमिका उजागर हुई।
  • सामरिक साझेदारी: भारत ने यूरोपीय संघ जैसे साझेदारों के साथ सुरक्षा और रक्षा समझौते किए हैं, जिससे समुद्री सुरक्षा एवं आतंकवाद-रोधी सहयोग को बढ़ावा मिला है।
  • सागरमाला और स्मार्ट पोर्ट्स: बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक्स में सुधार और सतत समुद्री विकास हेतु हरित प्रौद्योगिकियों का एकीकरण।
  • तटीय सुरक्षा उपाय: भारतीय तटरक्षक बल को सुदृढ़ करना, तटीय रडार श्रृंखलाएँ स्थापित करना और राज्य समुद्री पुलिस के साथ समन्वय।

निष्कर्ष और आगे की राह  

  • भारत की समुद्री सुरक्षा केवल तटरेखा की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इंडो-पैसिफिक में स्थिरता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है।
  • समुद्री डकैती और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जैसी चुनौतियों का समाधान नौसैनिक आधुनिकीकरण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सतत विकास के माध्यम से किया जा सकता है।
  • सुरक्षित समुद्री क्षेत्र भारत के एक प्रमुख वैश्विक अर्थतंत्र और सामरिक शक्ति के रूप में उदय के लिए अत्यंत आवश्यक है, साथ ही आर्थिक एवं पारिस्थितिकीय उत्तरदायित्वों के संतुलन के लिए भी।

स्रोत :PIB

 

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