पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, देश का व्यापार घाटा अगस्त 2024 के $21.7 बिलियन की तुलना में 54% से अधिक घटकर $9.9 बिलियन रह गया है, जिसका मुख्य कारण वस्तुओं के निर्यात में तीव्र वृद्धि है।
व्यापार घाटा क्या है?
- यदि कोई देश अन्य देशों से जितना आयात करता है, उससे कम निर्यात करता है, तो उसे व्यापार घाटा कहा जाता है।
- व्यापार घाटा घरेलू मुद्रा को कमजोर करता है।
सकारात्मक व्यापार प्रदर्शन के कारक
- निर्यात के लिए नीति समर्थन: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI), निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की वापसी योजना (RoDTEP), और पीएम गति शक्ति के अंतर्गत बेहतर लॉजिस्टिक्स अवसंरचना ने प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा दिया है।
- निर्यातकों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लचीलापन दिखाया, जैसे अगस्त में अमेरिका द्वारा लगाए गए 25–50% शुल्क।
- सेवाओं क्षेत्र में सुदृढ़ प्रदर्शन: आईटी, बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट, फिनटेक और प्रोफेशनल सेवाएं वैश्विक मांग में प्रमुख बनी हुई हैं।
- लगभग $16.7 बिलियन का शुद्ध सेवा अधिशेष माल व्यापार घाटे की भरपाई के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा बना, जिससे भारत के बाह्य क्षेत्र में सेवाओं की स्थिरता की भूमिका सुदृढ़ हुई।
- आयात में कमी: कच्चे तेल और वस्तुओं की कीमतों में गिरावट से आयात बिल कम हुआ।
- इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की सरकारी पहलें धीरे-धीरे आयात पर निर्भरता को कम कर रही हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- बाह्य क्षेत्र की स्थिरता में सुधार: व्यापार घाटे के आधे होने से भारत की चालू खाता स्थिति मजबूत होती है और विदेशी मुद्रा के अत्यधिक बहिर्गमन की चिंताओं को कम करती है।
- विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिरता को बढ़ावा: व्यापार असंतुलन में कमी रुपये पर दबाव को कम करती है, विदेशी मुद्रा भंडार को समर्थन देती है और निवेशकों के विश्वास को बढ़ाती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि: शुल्क और वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत का निर्यात बढ़ाना इसके उत्पादों एवं सेवाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है।
- आर्थिक विकास में योगदान: सुदृढ़ निर्यात गति GDP वृद्धि, रोजगार सृजन और औद्योगिक विस्तार को प्रोत्साहन देती है।
आगे की चुनौतियाँ
- वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताएँ: धीमी वैश्विक वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और संरक्षणवादी उपाय निर्यात मांग को प्रभावित कर सकते हैं।
- कुछ बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता: अमेरिका और यूरोपीय संघ भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा हैं, जिससे भारत भू-राजनीतिक एवं नीति जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
- सेवाओं के आयात में वृद्धि: जबकि सेवाओं का निर्यात सुदृढ़ है, इस क्षेत्र में बढ़ते आयात धीरे-धीरे शुद्ध अधिशेष को कम कर सकते हैं।
- प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन की आवश्यकता: भारतीय निर्यात अभी भी निम्न से मध्यम मूल्य संवर्धित क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जिससे दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता सीमित होती है।
आगे की राह
- निर्यात बाजारों का विविधीकरण: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका एवं दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और बहुपक्षीय समूहों के माध्यम से जुड़ाव को सुदृढ़ करें।
- उच्च मूल्य वाले निर्यात को बढ़ावा: इलेक्ट्रॉनिक्स, हरित प्रौद्योगिकियों, फार्मास्यूटिकल्स और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निर्यात को प्रोत्साहित करें।
- सेवाओं के निर्यात को सुदृढ़ करना: आईटी और प्रोफेशनल सेवाओं में नेतृत्व बनाए रखने के लिए कौशल विकास, डिजिटल अवसंरचना एवं नियामक सुधारों में निवेश करें।
- आयात का रणनीतिक प्रबंधन: अर्धचालक, दुर्लभ पृथ्वी तत्व, स्वच्छ ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता निर्माण को बढ़ावा दें ताकि कमजोरियों को कम किया जा सके।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बदलावों का लाभ उठाना: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपनाई गई “चीन+1” रणनीति के परिप्रेक्ष्य में भारत को एक विश्वसनीय विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करें।
Source: TH