विदेश मंत्री द्वारा 9वें हिंद महासागर सम्मेलन संबोधित 

पाठ्यक्रम: GS3/समुद्री सुरक्षा

संदर्भ

  • विदेश मंत्री ने 9वें हिंद महासागर सम्मेलन को संबोधित किया, जिसका विषय था “हिंद महासागर शासन हेतु सामूहिक संरक्षकता”।

विदेश मंत्री द्वारा हिंद महासागर देशों के लिए पाँच प्रमुख प्राथमिकताएँ

  • स्थिरता की आवश्यकता: हिंद महासागर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है जो अर्थव्यवस्थाओं, आजीविकाओं, संपर्क, संसाधनों और साझा सांस्कृतिक विरासत को पोषित करता है। उ
    • न्होंने चेतावनी दी कि इस परस्पर जुड़े तंत्र में किसी भी प्रकार का व्यवधान दूरगामी परिणाम ला सकता है, इसलिए स्थिरता और सावधानीपूर्वक संरक्षकता आवश्यक है।
  • ऐतिहासिक संबंध: क्षेत्र के देशों को ऐतिहासिक बाधाओं को दूर करने, क्षेत्रीय सहयोग को गहरा करने, मजबूत आर्थिक संबंधों, बेहतर संपर्क और पारंपरिक संबंधों के पुनर्जीवन पर बल देना चाहिए।
  • बदलता वैश्विक क्रम: विदेश मंत्री ने वैश्विक व्यवस्था की बदलती प्रकृति पर प्रकाश डाला, यह बताते हुए कि विश्व अधिक प्रतिस्पर्धी, अंतर्मुखी और विभाजित हो गया है, जिससे देशों को अधिक विश्वसनीय साझेदारियाँ एवं लचीलापन तलाशना पड़ रहा है।
  • चोक पॉइंट्स पर चिंता: उन्होंने “चोक पॉइंट्स” (भौतिक और वैचारिक दोनों) पर बढ़ती चिंताओं की ओर संकेत किया।
    • उन्होंने कहा कि नियंत्रित मानसिकता को दूर करना अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के कल्याण के लिए आवश्यक है।
  • बेहतर सहयोग: विदेश मंत्री ने हिंद महासागर देशों के बीच बेहतर सहयोग का आह्वान किया और इस क्षेत्र को “ग्लोबल साउथ का महासागर” बताया, जो साझा चुनौतियों का सामना कर रहा है।

हिंद महासागर सम्मेलन

  • इसकी शुरुआत 2016 में इंडिया फाउंडेशन ने क्षेत्र के थिंक टैंकों और संस्थानों के सहयोग से की थी, जिसमें 30 देशों ने भाग लिया।
  • विगत 8 वर्षों में यह सम्मेलन देशों के लिए परस्पर हितों के मुद्दों पर चर्चा और विचार-विमर्श का प्रमुख मंच बन गया है।
  • वर्षों में 55 देशों के 100 से अधिक मंत्रियों ने इस सम्मेलन को संबोधित किया है।
  • यह सम्मेलन क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं पर विचार करने का मंच प्रदान करता है, विशेषकर क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास (SAGAR) के संदर्भ में।

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) का महत्व

  • भूरणनीतिक महत्व: हिंद महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है, जो मध्य पूर्व, अफ्रीका, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ता है।
    • इसमें महत्वपूर्ण समुद्री चोक पॉइंट्स हैं: होरमुज़ जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब, मलक्का जलडमरूमध्य, लोम्बोक जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा और व्यापार प्रवाह का बड़ा हिस्सा संभालते हैं।
    • IOR पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु का कार्य करता है, जिससे यह भारत, चीन, अमेरिका और अन्य प्रमुख शक्तियों के बीच शक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय क्षेत्र बन जाता है।
  • आर्थिक महत्व: यह क्षेत्र वैश्विक कंटेनर यातायात का लगभग 50% और समुद्री तेल व्यापार का 80% वहन करता है।
    • यह ब्लू इकोनॉमी गतिविधियों का केंद्र है: शिपिंग, मत्स्य पालन, समुद्र-तल खनन और पर्यटन।
  • ऊर्जा सुरक्षा: IOR वैश्विक ऊर्जा प्रवाह की जीवनरेखा है। पश्चिम एशिया से तेल और गैस पूर्व एशिया तक इसके समुद्री मार्गों से पहुँचते हैं।
    • भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, जिससे IOR की स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • ब्लू इकोनॉमी की संभावनाएँ: मत्स्य पालन, समुद्र-तल खनिज, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यटन में अवसर उपलब्ध हैं, जिनके लिए सुरक्षित समुद्र आवश्यक है।

IOR में समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करने की आवश्यकता

  • इंडो-पैसिफिक अवधारणा: इंडो-पैसिफिक भारतीय एवं प्रशांत महासागरों को एक रणनीतिक क्षेत्र में जोड़ता है और नए वैश्विक समुद्री क्रम के निर्माण में IOR की केंद्रीयता को रेखांकित करता है।
  • वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव: IOR पर नियंत्रण से प्रभावित हो सकते हैं:
    • व्यापार प्रवाह (विशेषकर तेल और गैस),
    • रणनीतिक समुद्री चोक पॉइंट्स (जैसे होरमुज़, मलक्का, बाब-अल-मंदेब),
    • सैन्य तैनाती और अड्डों की लॉजिस्टिक्स।
  • खंडित समुद्री शासन: कई तटीय राज्यों में निगरानी, कानून प्रवर्तन और मानवीय/आपदा प्रतिक्रिया (HADR) की क्षमता का अभाव है।
  • विविध विषम खतरे: अवैध, अनियमित और अपंजीकृत (IUU) मत्स्य पालन, तस्करी, समुद्री डकैती का पुनरुत्थान और वाणिज्यिक जहाजों पर हमले सुरक्षा को जटिल बनाते हैं।
  • IOR में चीनी नौसैनिक शक्ति का विस्तार: क्षेत्र में चीनी नौसैनिक जहाजों की तैनाती संख्या और अवधि दोनों में बढ़ी है।
    • चीनी अनुसंधान और सर्वेक्षण जहाज संवेदनशील समुद्री और महासागरीय डेटा एकत्र करने हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर तैनात किए जा रहे हैं।

सरकारी पहल

  • सागरमाला कार्यक्रम: भारत के समुद्रतट और नौगम्य जलमार्गों का लाभ उठाने पर केंद्रित।
    • बंदरगाह अवसंरचना, तटीय विकास और संपर्क को समर्थन।
    • परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता: तटीय घाट, रेल/सड़क संपर्क, मत्स्य बंदरगाह, क्रूज़ टर्मिनल।
  • मैरिटाइम इंडिया विज़न 2030 (MIV 2030): 2030 तक भारत को शीर्ष 10 जहाज निर्माण राष्ट्र बनाने और विश्वस्तरीय, कुशल एवं सतत समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित करने का लक्ष्य।
  • सागरमंथन संवाद: वार्षिक समुद्री रणनीतिक संवाद, जिससे भारत को वैश्विक समुद्री वार्ताओं का केंद्र बनाया जा सके।
  • मैरिटाइम विकास कोष: ₹25,000 करोड़ का कोष, दीर्घकालिक वित्तपोषण हेतु, बंदरगाह और शिपिंग अवसंरचना का आधुनिकीकरण और निजी निवेश को प्रोत्साहन।
  • MAHASAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास हेतु पारस्परिक एवं समग्र प्रगति): IOR में भारत की रणनीतिक पुनर्ब्रांडिंग को दर्शाता है।
  • नौसैनिक आधुनिकीकरण और स्वदेशी विकास: भारत नौसैनिक क्षमताओं का आधुनिकीकरण कर रहा है।
    • स्वदेशी युद्धपोतों का कमीशनिंग (जैसे INS विक्रांत, INS विशाखापत्तनम)।
    • समुद्री क्षेत्र जागरूकता और शक्ति प्रदर्शन को बढ़ावा।
    • इससे IOR में भारत की सैन्य स्थिति और समुद्री प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
  • भारत की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय कूटनीति: भारत क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर चीनी अवसंरचना परियोजनाओं के दीर्घकालिक प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ा रहा है।
    • इन परिसंपत्तियों के चीन द्वारा सैन्य उपयोग से आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले जोखिमों पर बल दिया जा रहा है।

निष्कर्ष

  • भारत की समुद्री सुरक्षा पहलें सैन्य क्षमता, अवसंरचना तत्परता, क्षेत्रीय साझेदारी और विधिक-संस्थागत ढाँचों का मिश्रण हैं।
  • एक्ट ईस्ट नीति, इंडो-पैसिफिक विज़न और ब्लू इकोनॉमी रणनीति जैसी पहलें IOR में भारत की केंद्रीय भूमिका को सुदृढ़ करती हैं।

Source: MEA

 

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