पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम तथा प्रमुख शक्तियों द्वारा व्यापार, ऊर्जा, वित्त और प्रौद्योगिकी का सामरिक उपयोग इस तथ्य को रेखांकित करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति की स्वायत्तता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है।
भारत की बाह्य निर्भरताओं से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग
- खाद्य निर्भरता:1960 के दशक में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका के PL-480 खाद्य सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत खाद्यान्न आयात पर अत्यधिक निर्भर था। 1965–67 के सूखे ने इस निर्भरता को उजागर किया और बाह्य निर्भरता से जुड़े राजनीतिक जोखिमों को स्पष्ट किया।
- इसके परिणामस्वरूप हरित क्रांति का शुभारंभ हुआ, जिससे भारत खाद्य-आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में सक्षम हुआ।
- रक्षा उपकरणों पर निर्भरता: भारत-चीन युद्ध (1962) ने रक्षा उपकरणों की गंभीर कमी को उजागर किया। इसके बाद भारत ने अपनी रक्षा सेनाओं के आधुनिकीकरण तथा रक्षा साझेदारियों के विविधीकरण की दिशा में कदम उठाए।
- ऊर्जा निर्भरता: खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई और प्रेषण एवं व्यापार में व्यवधान उत्पन्न हुआ। इससे 1991 में भारत के भुगतान संतुलन संकट में योगदान हुआ और ऊर्जा आयात पर निर्भरता से उत्पन्न संवेदनशीलता स्पष्ट हुई।
- विदेशी मुद्रा की बाधाएँ: भारत की बाह्य वित्तीय संवेदनशीलता का चरम 1991 के भारतीय आर्थिक संकट के रूप में सामने आया। इस संकट ने पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में व्यापक संरचनात्मक आर्थिक सुधारों को प्रेरित किया।
भारत की सामरिक स्वायत्तता के समक्ष समकालीन चुनौतियाँ
- ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम: भारत अपने कच्चे तेल की लगभग 85% आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है, जिसका अधिकांश भाग पश्चिम एशिया से आता है। इस क्षेत्र में अस्थिरता ऊर्जा आपूर्ति तथा आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
- प्रौद्योगिकीय निर्भरता: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा महत्वपूर्ण खनिजों जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच कुछ सीमित देशों में केंद्रित है।
- आर्थिक साधनों का हथियारीकरण:प्रमुख शक्तियाँ बढ़ते हुए स्तर पर प्रतिबंधों, वित्तीय प्रणालियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का उपयोग भू-राजनीतिक उपकरणों के रूप में कर रही हैं।
- प्रवासी भारतीयों से जुड़ी संवेदनशीलताएँ: विदेशों में बड़ी संख्या में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय पर मेजबान देशों की आव्रजन नीतियों या भू-राजनीतिक संघर्षों का प्रभाव पड़ सकता है।
- प्रभाव संचालन (Influence Operations): वैश्वीकृत सूचना तंत्र बाह्य शक्तियों को घरेलू नीति विमर्श और जनमत को प्रभावित करने की संभावनाएँ प्रदान करता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता का महत्व
- आर्थिक लचीलापन सुदृढ़ करना: ऊर्जा, खाद्य तथा विनिर्माण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता का निर्माण बाह्य आघातों के प्रति संवेदनशीलता को कम करता है।
- सामरिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: निर्भरता में कमी भारत को बाह्य दबावों से मुक्त होकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने में सक्षम बनाती है।
- आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा: व्यापार तथा आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण आर्थिक स्थिरता को बढ़ाता है।
- रक्षा तैयारी को सुदृढ़ करना: स्वदेशी रक्षा उत्पादन संकट के समय विश्वसनीय सैन्य क्षमताएँ सुनिश्चित करता है।
भारत द्वारा उठाए गए कदम
- विदेश नीति साझेदारियों का विविधीकरण: भारत ने प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने और भू-राजनीतिक निर्भरता को कम करने के लिए बहु-संरेखण (Multi-alignment) की रणनीति अपनाई है।
- इसमें क्वाड, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे समूहों के साथ सक्रिय सहभागिता शामिल है।
- ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत ने ऊर्जा आयात स्रोतों का विविधीकरण किया है तथा घरेलू ऊर्जा क्षमता का विस्तार किया है। प्रमुख पहलें इस प्रकार हैं—
- राष्ट्रीय सौर मिशन के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार।
- आपूर्ति व्यवधानों से निपटने हेतु रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण।
- पश्चिम एशिया के अतिरिक्त रूस, अमेरिका तथा नाइजीरिया और अंगोला जैसे अफ्रीकी देशों से तेल आयात का विविधीकरण।
- रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण: आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने घरेलू रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित किया है। प्रमुख पहलें—
- रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्धन नीति (DPEPP) के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा।
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) जैसी संस्थाओं के माध्यम से स्वदेशी क्षमताओं का विस्तार।
- रक्षा क्षेत्र में स्वचालित मार्ग से 74% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) तथा सरकारी अनुमोदन से 100% तक निवेश की अनुमति।
- प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखला की सुदृढ़ता: इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और औषधि जैसे क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन-संलग्न प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ।
- डिजिटल इंडिया पहल के अंतर्गत डिजिटल अवसंरचना का विस्तार।
आगे की राह
- भारत की आत्मनिर्भरता की नीति का उद्देश्य सामरिक कमजोरियों को कम करना होना चाहिए, साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ सक्रिय सहभागिता बनाए रखना भी आवश्यक है।
- घरेलू क्षमताओं को सुदृढ़ करने तथा सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखने से भारत महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के दौर में प्रभावी ढंग से मार्गदर्शन कर सकेगा और अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा।
स्रोत: IE
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