पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता सहित भारत के कई शहरों में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) सिलेंडरों की आपूर्ति में व्यवधान की खबरें सामने आ रही हैं।
एलपीजी के बारे में
- तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) एक अत्यधिक ज्वलनशील, ऊर्जा-समृद्ध तथा स्वच्छ रूप से जलने वाला ईंधन है, जो मुख्यतः प्रोपेन और ब्यूटेन से मिलकर बनता है।
- यह कच्चे तेल के परिशोधन (refining) या प्राकृतिक गैस के प्रसंस्करण (processing) के दौरान प्राप्त होती है और इसे घरेलू खाना पकाने, हीटिंग तथा वाहनों में उपयोग के लिए स्टील सिलेंडरों में दाब के तहत तरल रूप में संग्रहित किया जाता है।
- इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) जैसी तेल विपणन कंपनियाँ भारत की कुल एलपीजी आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन करती हैं।
आपूर्ति में व्यवधान क्यों?
- भू-राजनीतिक जोखिम: भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। इन आयातों में से लगभग 90 प्रतिशत होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के माध्यम से आते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका और इज़राइल के ईरान के साथ संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से आपूर्ति प्रभावित हुई है।

- अवसंरचनात्मक कमजोरी : भारत की एलपीजी आपूर्ति प्रणाली मुख्यतः निरंतर परिचालन प्रवाह (continuous operational flow) के आधार पर विकसित की गई है, न कि बड़े पैमाने पर भंडारण के लिए। दीर्घकालिक भंडारण के लिए वर्तमान में देश में केवल दो भूमिगत एलपीजी भंडारण गुफाएँ (storage caverns) हैं—
- मंगलुरु
- विशाखापट्टनम
- इनकी कुल भंडारण क्षमता लगभग 1.4 लाख टन है, जो राष्ट्रीय खपत की तुलना में सीमित है।
- घरेलू मांग में वृद्धि : अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार भारत का एलपीजी आयात 2011-12 से 2024-25 के बीच तीन गुना बढ़कर लगभग 20 मिलियन टन हो गया है।इस वृद्धि का एक प्रमुख कारण प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) है, जिसके अंतर्गत 2017 से अब तक लगभग 10 करोड़ एलपीजी कनेक्शन प्रदान किए गए हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 33 करोड़ घरेलू एलपीजी कनेक्शन हैं।
एलपीजी की कमी के प्रभाव
- घरेलू क्षेत्र पर प्रभाव: भारत में एलपीजी की कुल खपत का लगभग 87 प्रतिशत घरेलू क्षेत्र में उपयोग होता है, मुख्यतः रसोई में भोजन पकाने के लिए।
- औद्योगिक प्रभाव
- कई उद्योग—जैसे
- वस्त्र उद्योग
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
- औषधि उद्योग
- कृषि उपकरण निर्माण
- अपने बॉयलरों में हीटिंग, स्टेरिलाइजेशन और रंगाई जैसी प्रक्रियाओं के लिए एलपीजी का उपयोग करते हैं।
- इसके अतिरिक्त रेस्तरां, होटल और कैटरिंग सेवाएँ भी वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- आपूर्ति शृंखला और परिवहन लागत : सामान्यतः खाड़ी बंदरगाहों से भारत तक की यात्रा लगभग चार दिन में पूरी हो जाती है। किन्तु यदि जहाज संघर्ष क्षेत्र से बचने के लिए अफ्रीका के चारों ओर से मार्ग बदलते हैं, तो यह यात्रा लगभग 25 दिनों तक बढ़ सकती है। ऐसे मार्ग परिवर्तन से भाड़ा शुल्क और बीमा प्रीमियम बढ़ जाते हैं, जिससे एलपीजी आयात की कुल लागत में वृद्धि होती है।
- व्यापक आर्थिक प्रभाव : भारत विश्व में एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में लगभग 9 अरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है, जिससे देश के बाह्य संतुलन पर दबाव बढ़ता है।
सरकारी प्रतिक्रिया
- सरकार ने उभरती कमी को प्रबंधित करने और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) लागू कर घरेलू उपभोक्ताओं, अस्पतालों और आवश्यक सेवाओं के लिए एलपीजी आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई है।
- कुछ क्षेत्रों में वाणिज्यिक वितरण पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।
- रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
- राज्य सरकारों को एलपीजी आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा और सुचारु संचालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
- इसके साथ ही भारत अपनी ऊर्जा खरीद को विविधीकृत करने का प्रयास कर रहा है और किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करने के लिए विश्व के 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है।
आगे की राह
- उभरती एलपीजी कमी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से भरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक चुनौती को उजागर करती है।
- यद्यपि भारत ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से एलपीजी की पहुँच में उल्लेखनीय विस्तार किया है, फिर भी देश वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
- इस संदर्भ में निम्न उपाय महत्वपूर्ण होंगे—
- रणनीतिक एलपीजी भंडारण क्षमता को सुदृढ़ करना
- ऊर्जा आयात स्रोतों का विविधीकरण करना
- वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देना
- ये कदम भारत के करोड़ों घरों और व्यवसायों के लिए स्थिर, सुरक्षित और सतत ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Source: TH