पाठ्यक्रम: GS2/शासन / सामाजिक न्याय
संदर्भ
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की कारागार सांख्यिकी 2024 रिपोर्ट ने दिल्ली की कारागार प्रणाली में गंभीर संरचनात्मक कमियों को उजागर किया है, जहाँ जेलों में देश का सर्वाधिक 194.6% अधिभोग दर दर्ज किया गया।
भारत में कारागारों में बढ़ती भीड़भाड़ के कारण
- न्यायिक विलंब: आपराधिक मामलों की भारी लंबित संख्या के कारण विचाराधीन कैदियों की लंबी अवधि तक कारावास।
- अपराधों का अति-आपराधिकरण: छोटे अपराधों के लिए भी कारावास का अत्यधिक प्रयोग, निवारक निरोधक कानून और बार-बार गिरफ्तारी से जेल जनसंख्या बढ़ती है।
- जमानत से जुड़ी चुनौतियाँ: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग वित्तीय कठिनाइयों के कारण जमानत प्राप्त नहीं कर पाते। जागरूकता की कमी एवं अपर्याप्त कानूनी सहायता से हिरासत लंबी होती है।
- अपर्याप्त कारागार अवसंरचना: बढ़ती कैदी जनसंख्या के अनुरूप कारागार अवसंरचना का विस्तार नहीं हुआ।

कारागारों में भीड़भाड़ से जुड़ी चिंताएँ
- मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ: अत्यधिक भीड़भाड़ से खराब जीवन स्थितियाँ, स्वच्छता की कमी और अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ उत्पन्न होती हैं।
- भीड़भाड़ वाले कारागारों में हिंसा, आत्महत्या और हिरासत में मृत्युओं की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
- सुधारात्मक न्याय पर प्रभाव: भारतीय कारागारों से अपेक्षा है कि वे केवल दंडात्मक स्थान न होकर सुधारात्मक संस्थान के रूप में कार्य करें।
- किंतु भीड़भाड़ और प्रशासनिक कमी सुधारात्मक उद्देश्य को कमजोर करती है।
कारागार सुधार समितियाँ
- न्यायमूर्ति ए.एन. मुल्ला समिति (1980–83): विचाराधीन कैदियों को दोषसिद्ध कैदियों से अलग रखने, कारागार स्थितियों, पोषण और स्वच्छता में सुधार की अनुशंसा।
- न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय समिति: कारागारों में भीड़ कम करने, शीघ्र सुनवाई और कानूनी सहायता सुधार, तथा कारागार प्रबंधन में तकनीक के उपयोग की अनुशंसा।
- कृष्ण अय्यर समिति: महिलाओं के लिए अलग कारागार सुविधाओं की वकालत, ताकि शोषण रोका जा सके।
न्यायिक हस्तक्षेप
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
- राजस्थान राज्य बनाम बलचंद: सर्वोच्च न्यायालय ने “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत स्थापित किया, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) को बल मिला।
कारागार सुधार हेतु उठाए गए कदम
- राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों ने जेलों में विधिक सेवा क्लीनिक स्थापित किए हैं, जो ज़रूरतमंदों को निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करते हैं।
- गृह मंत्रालय ने वर्ष 2023 में मॉडल कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएँ अधिनियम तैयार किया।
- इस अधिनियम में कैदियों के सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण के प्रावधान हैं।
- इसमें कैदी कल्याण कार्यक्रम और आफ्टर-केयर एवं पुनर्वास सेवाएँ भी संस्थागत देखभाल का अभिन्न हिस्सा हैं।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: बेहतर अभिलेख-प्रबंधन, निगरानी और पारदर्शिता हेतु डिजिटल कारागार प्रबंधन प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
- न्यायालयीय सुनवाई में विलंब कम करने हेतु वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का विस्तार किया जाना चाहिए।
- कैदियों का सामाजिक पुनःएकीकरण: कारागार प्रणाली को व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि रिहाई के बाद कैदियों की रोजगार क्षमता बढ़े।
- कानूनी सहायता सुदृढ़ करना: विशेषकर विचाराधीन कैदियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु कानूनी सहायता तंत्र को सुदृढ़ करना।
- कारावास के विकल्प: छोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा, प्रोबेशन और गैर-कारावासी दंड को प्रोत्साहित करना।
- भीड़भाड़ कम करने और पुनर्वास को समर्थन देने हेतु ओपन जेल मॉडल का राज्यों में विस्तार करना।
स्रोत: TOI
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