भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट

पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य

संदर्भ

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने डिजिटल अभ्यस्तता और स्क्रीन-संबंधी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, विशेषकर बच्चों और किशोरों में, चिंताजनक वृद्धि को रेखांकित किया।

परिचय

  • बजट में मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने के उपायों की घोषणा की गई।
  • मुख्य बिंदुओं में उत्तर भारत में दूसरे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान (NIMHANS) की स्थापना का प्रस्ताव तथा रांची और तेज़पुर स्थित प्रमुख संस्थानों के उन्नयन का उल्लेख है, जिससे क्षेत्रीय पहुँच में सुधार हो सके।

भारत पर मानसिक स्वास्थ्य का भार

  • भारत विश्व के आत्महत्या, अवसाद और अभ्यस्तता के मामलों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है।
    • आत्महत्या 15-29 वर्ष आयु वर्ग के भारतीयों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच भारत में मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण आर्थिक हानि का अनुमान $1.03 ट्रिलियन है।
  • लगभग 70% से 92% मानसिक रोगियों को जागरूकता की कमी, कलंक और पेशेवरों की कमी के कारण उचित उपचार नहीं मिलता।
  • भारत में प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जबकि WHO कम से कम तीन की अनुशंसा करता है।
  • यद्यपि 2014-15 से स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि हुई है, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विशेष आवंटन ऐतिहासिक रूप से बहुत कम रहे हैं, कुल स्वास्थ्य बजट का लगभग 1%।

भारत में मनोरोग स्वास्थ्य देखभाल की चुनौतियाँ 

  • मनोचिकित्सालयों की खराब स्थिति: प्रायः क्रूरता, उपेक्षा, दुर्व्यवहार और निम्नस्तरीय जीवन स्थितियों से जुड़ी होती है।
    • यह प्रणालीगत उपेक्षा और अपर्याप्त जवाबदेही तंत्र को दर्शाता है।
  • अल्प वित्तपोषण: मानसिक स्वास्थ्य को कुल स्वास्थ्य बजट का लगभग 1% ही मिलता है, जिसमें अधिकांश संस्थागत देखभाल पर व्यय होता है, न कि सामुदायिक देखभाल पर।
  • प्रशिक्षित कर्मियों की कमी: भारत का मानसिक स्वास्थ्य कार्यबल अत्यंत सीमित है; प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक और 0.12 मनोवैज्ञानिक उपलब्ध हैं।
    • WHO के मानकों के अनुसार कम से कम तीन मनोचिकित्सक होने चाहिए।
  • असमान वितरण: कुछ ही मनोचिकित्सक जिला मुख्यालयों पर हैं, कस्बों/गाँवों में लगभग नहीं।
    • इससे शहरी-ग्रामीण मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में विभाजन उत्पन्न होता है।
  • सुलभता एवं आर्थिक बाधाएँ: ग्रामीण/आंतरिक क्षेत्रों में दवाएँ उपलब्ध नहीं।
    • उपचार हेतु यात्रा से मजदूरी की हानि होती है, जो गरीब परिवारों के लिए असहनीय है।
    • गंभीर मानसिक रोगी प्रायः आय अर्जित नहीं करते, जिससे आर्थिक भार और बढ़ता है।

भारत सरकार की प्रमुख पहलें 

  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017:
    • आत्महत्या के प्रयासों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया।
    • WHO दिशानिर्देशों को मानसिक रोगों की श्रेणीकरण में शामिल किया।
    • अग्रिम निर्देश  प्रावधान के अंतर्गत मानसिक रोगी अपने उपचार का मार्ग स्वयं तय कर सकते हैं।
    • इलेक्ट्रो-कन्वल्सिव थेरेपी (ECT) पर प्रतिबंध, विशेषकर नाबालिगों पर।
    • भारतीय समाज में कलंक से निपटने के उपायों को शामिल किया।
  • विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2017:
    • मानसिक रोग को विकलांगता के रूप में मान्यता दी और विकलांगों के अधिकारों एवं सुविधाओं को बढ़ाने का प्रयास किया।
  • सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य:
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मानसिक स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार के रूप में सुदृढ़ किया, जिससे सरकार कानूनी रूप से सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हुई।
  • आयुष्मान भारत: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल पैकेज में शामिल किया गया।
  • जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP): 767 जिलों में लागू, आत्महत्या रोकथाम, तनाव प्रबंधन और परामर्श जैसी सेवाएँ प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NTMHP): 2022 में शुरू, 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 53 टेली मानस सेल  के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच प्रदान करता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य क्षमता का विस्तार: मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं एवं शैक्षिक संसाधनों को सुदृढ़ करना।
  • बजट आवंटन: विगत पाँच वर्षों में भारत का मानसिक स्वास्थ्य आवंटन ₹683 करोड़ (2020-21) से बढ़कर लगभग ₹1,898 करोड़ (2024-25) हुआ है।

आवश्यक सुधारात्मक उपाय 

  • मानसिक स्वास्थ्य व्यय को कुल स्वास्थ्य व्यय का 5% तक बढ़ाना (WHO मानक)।
  • ग्रामीण पहुँच को सुदृढ़ करने हेतु मध्य-स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य प्रदाताओं को प्रशिक्षित और नियुक्त करना।
  • मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिक देखभाल और सार्वभौमिक बीमा योजनाओं में पूर्ण रूप से एकीकृत करना।
  • जिला-स्तरीय जवाबदेही के साथ निगरानी और मूल्यांकन प्रणाली स्थापित करना।
  • विशेषकर विद्यालयों एवं कार्यस्थलों में कलंक-निवारण और जागरूकता अभियान का विस्तार करना।
  • एकीकृत मानसिक स्वास्थ्य रणनीति सुनिश्चित करने हेतु मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय।

निष्कर्ष 

  • भारत का मानसिक स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र वित्तपोषण, कार्यबल और शासन में त्रिगुणीय कमी का सामना कर रहा है।
  • इन अंतरालों को समाप्त करने के लिए नीतिगत एकीकरण, विकेन्द्रीकृत सेवा वितरण और सामाजिक कलंक-निवारण आवश्यक है, जिससे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं एवं WHO दिशानिर्देशों के अनुरूप प्रगति हो सके।

Source: TH

 

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